नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है। इसके साथ ही दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के ठीक एक साल बाद आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल 14 फरवरी को रामलीला मैदान में एक बार फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। आप नेता आशुतोष ने कहा कि अरविंद केजरीवाल 14 फरवरी को रामलीला मैदान में दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।

अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली का किला फतह कर लिया है। विपक्षियों ने केजरीवाल को जीत की बधाई देनी भी शुरू कर दी है। आम आदमी पार्टी की इस जीत के पीछे कई वजह हैं। अरविंद केजरीवाल का दिल्ली के आम लोगों की नब्ज को पकड़ना और भाजपा का 'आप' के खिलाफ नकारात्मक प्रचार करना भी इसमें अहम वजह रहीं। आइए आपको बताते हैं दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की सफलता की दस वजह।

आम आदमी की नब्ज पकड़ने में रहे कामयाब

अरविंद केजरीवाल अभी तक आम आदमी की नब्ज पकड़ने में कामयाब रहे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान महिला सुरक्षा, बिजली, पानी, रोजगार आदि मुद्दों पर आम आदमी पार्टी टिकी रही। इससे दिल्ली का आम आदमी दिल से केजरीवाल के साथ जुड़ा दिखाई दिया। फिर केजरीवाल की शख्सियत कुछ ऐसी है कि आम इंसान उनसे बहुत जल्द जुड़ जाता है, इसका नतीजा दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजों में देखने को भी मिल रहा है।

अन्य पार्टियों का भी मिला समर्थन

आम आदमी पार्टी का मुकाबला दिल्ली विधानसभा चुनाव में ऐसी पार्टी से था, जिसने लोकसभा चुनाव में अन्य पार्टियों का लगभग सफाया कर दिया था। ऐसे में स्थानीय पार्टियां नरेंद्र मोदी की काट ढूंढ रही थीं। जब अन्य पार्टियों को लगा कि आम आदमी पार्टी नरेंद्र मोदी को कड़ी टक्कर दे सकती है, तो उन्होंने केजरीवाल को समर्थन देना शुरू कर दिया। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कांग्रेस के विरोध के बावजूद आम आदमी पार्टी का समर्थन किया। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी खुलकर आम आदमी पार्टी का समर्थन किया। हालांकि इससे आम आदमी पार्टी के वोट शेयर में असर पड़ा होगा ऐसा जाना नहीं पड़ता, लेकिन इससे केरीवाल का हौसला काफी बढ़ गया।

'आप' के खेमे में आया कांग्रेस का वोटर

कांग्रेस की हालत दिल्ली विधानसभा चुनाव में शुरुआत से काफी पतली नजर आ रही थी। चुनाव प्रचार के दौरान भी कांग्रेस में वो दम दिखाई नहीं दिया। पार्टी के बड़े नेताओं ने खानापूर्ति के लिए प्रचार किया। ऐसे में कांग्रेस का वोटर एक विकल्प ढूंढता नजर आ रहा था, जो उसे आम आदमी पार्टी में नजर आया। भाजपा का भी मानना है कि कांग्रेस का वोट शेयर आम आदमी पार्टी के खाते में जाने से उनको भारी नुकसान हुआ।

भाजपा ने आप को गंभीरता से नहीं लिया

अतिआत्मविश्वास भी दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा को ले डूबा। भाजपा को लगा कि 49 दिनों में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के कारण दिल्ली की जनता ने अब अरविंद केजरीवाल को नकार दिया है। इधर लोकसभा चुनावों के बाद झारखंड और जम्मू-कश्मीर में मिली सफलता के बाद भाजपा को मोदी लहर पर कुछ ज्यादा ही विश्वास हो गया था। लेकिन दिल्ली में मोदी लहर बिल्कुल भी दिखाई नहीं दी। शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस बात को भांप गए थे, इसीलिए उन्होंने दिल्ली में उस जोर-शोर से प्रचार नहीं किया, जितना उन्होंने जम्मू-कश्मीर और झारखंड में किया था।

नहीं की जाति, धर्म की राजनीति

भारत में चुनाव जाति और धर्म के आधार पर भी लड़े जाते हैं। पार्टियों भी टिकट देने समय यह देखती हैं कि किस नेता को किस जाति का कितना समर्थन प्राप्त है। चुनावों में आमतौर पर जाति और धर्म का यह कार्ड काफी फायदेमंद साबित होता है। लेकिन आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में जाति और धर्म की राजनीति नहीं की। जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने जब 'आप' को समर्थन देने का ऐलान किया, तो आम आदमी पार्टी ने तुरंत इसके लिए मना कर दिया। 'आप' नेता संजय सिंह ने कहा कि हम धर्म की राजनीति में विश्वास नहीं करते हैं। हमें जनता का साथ चाहिए, जो हमें मिल गया है। यही वजह रही कि आम आदमी पार्टी को हर जाति के लोगों का समर्थन और वोट मिला।

केजरी ने मानी अपनी गलती

केजरीवाल एक इमानदार शख्स हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। इसीलिए उन्होंने सिर्फ 49 दिनों में मुख्यमंत्री पद छोड़ने की जो गलती की थी, उसे स्वीकार किया। केजरीवाल ने कहा कि हां मुझसे गलती हुई है, लेकिन मैंने कोई जुर्म नहीं किया है, कोई भ्रष्टाचार नहीं किया। केजरीवाल का गलती मानना उनकी विनम्रता था, जिसका दिल्ली की जनता ने सम्मान किया। शायद दिल्लीवालों ने केजरीवाल को बहुमत देकर उन्हें माफी भी दे दी है।

मोदी पर प्रहार नहीं किया, गिनाए विकास के मुद्दे

चुनाव प्रचार के दौरान जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा के सभी नेता अरविंद केजरीवाल को बुरा-भला कहते नजर आए। वहीं अरविंद केजरीवाल ने विपक्षियों के खिलाफ कोई बयानबाजी नहीं की। भाजपा नेताओं ने तो केजरीवाल को भगोड़ा और चोर तक कह दिया था। लेकिन केजरीवाल सिर्फ विकास की बात करते नजर आए। दिल्ली की समस्याओं को गिनाते हुए दिखे।

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लोकसभा चुनाव के बाद सिर्फ दिल्ली पर फोकस किया

पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी के हौसले बहुत बुलंद हो गए थे। यही वजह थी कि केजरीवाल ने लोकसभा चुनाव में कूदने का मन बनाया। लेकिन लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। पूरे देश में सिर्फ पंजाब से 4 सीटे आम आदमी पार्टी निकाल पाई। इसके बाद आम आदमी पार्टी ने सिर्फ दिल्ली पर फोकस करने का फैसला किया। इसका 'आप' को फायदा भी हुआ।

भाजपा की नेगेटिव कैंपेनिंग का भी मिला फायदा

भाजपा ने आम आदमी पार्टी के खिलाफ प्रचार के दौरान खूब नेगेटिव कैंपेनिंग की। चुनाव से ऐन पहले 'आवाम' नाम की एनजीओ सामने आई, जिसने 'आप' पर फंड में हेराफेरी के गंभीर आरोप लगाए। आम आदमी पार्टी ने 'आवाम' के पीछे भाजपा का हाथ बताया। केजरीवाल ने कहा कि उनके पास पार्टी को मिलने वाले चंदे के एक-एक रुपये का हिसाब है। लेकिन भाजपा केजरीवाल को चोर करार देती रही। भाजपा की इस नेगेटिव कैंपेनिंग का भी आम आदमी पार्टी को फायदा ही हुआ।

बागियों का जाना भी रहा शुभ

शाजिया इल्मी और विनोद कुमार बिन्नी जैसे कुछ नेता आम आदमी पार्टी छोड़ कर चले गए। इन्होंने अरविंद केजरीवाल पर तानाशाह होने का इल्जाम लगाया। लेकिन आम आदमी पार्टी के लिए इनका जाना भी शुभ ही रहा। आम आदमी पार्टी में रहते हुए शाजिया विधानसभा और लोकसभा चुनाव हार गई थीं। शायद यही वजह थी कि भाजपा ने उन्हें टिकट भी नहीं दिया। इधर बिन्नी पटपड़गंज सीट से 'आप' के मनीष सिसोदिया के सामने चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन उन्हें भी जनता ने नकार दिया।

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Posted By: T emp