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'भारत की बनी रहे सबसे बड़े लोकतंत्र की छवि...', जस्टिस सूर्यकांत ने बताया इन सिद्धांतों के प्रति सचेत है न्यायपालिका

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका अपनी जिम्मेदारियों एवं अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत है और पृथक्करण व कानून के शासन के सिद्धांतों को ध्यान में रखती है।इंडियन काउंसिल फॉर लीगल जस्टिस द्वारा आयोजित लोकतांत्रिक विकास में सतत न्यायशास्त्र पर सेमिनार में जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह न्यायपालिका एवं न्यायिक तंत्र ही है जो आमजन की चिंताओं से लगातार एवं व्यापक रूप से जुड़े रहते हैं।

By Agency Edited By: Sonu Gupta Published: Wed, 15 May 2024 11:46 PM (IST)Updated: Wed, 15 May 2024 11:46 PM (IST)
कर्तव्यों व शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांतों के प्रति सचेत है न्यायपालिका : जस्टिस सूर्यकांत। फोटोः www.sci.gov.in।

पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत ने बुधवार को कहा कि न्यायपालिका अपनी जिम्मेदारियों एवं अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत है और पृथक्करण व कानून के शासन के सिद्धांतों को ध्यान में रखती है। उन्होंने कहा कि उत्साही न्यायपालिका भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली की पहचान है जहां हम कानून के शासन व सुशासन में विश्वास करते हैं और यह सुनिश्चित करना हमारा कर्तव्य है कि यह प्रतिबद्धता दिन प्रतिदिन बनी रहे।

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भारत में है न्यायिक सक्रियता- जस्टिस सूर्यकांत

इंडियन काउंसिल फॉर लीगल जस्टिस द्वारा आयोजित 'लोकतांत्रिक विकास में सतत न्यायशास्त्र' पर सेमिनार में जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह न्यायपालिका एवं न्यायिक तंत्र ही है जो आमजन की चिंताओं से लगातार एवं व्यापक रूप से जुड़े रहते हैं। उन्होंने कहा कि मैं भारत में विधायिका की भूमिका को भी कमतर या अनदेखा नहीं करना चाहता। भारत उन लोकतांत्रिक देशों में से एक है जहां न्यायिक सक्रियता के अलावा हमने विधायी तंत्र का भी सुखद अनुभव किया है।

जब हम न्यायपालिका की भूमिका के बारे में बात करते हैं तो हम शक्तियों के पृथक्करण और कानून के शासन के सिद्धांतों को भी ध्यान में रखते हैं। हम सभी वास्तव में मानते हैं कि न्यायपालिका अपनी जिम्मेदारी एवं कर्तव्यों के प्रति सचेत है। ये बेहद आधारभूत सिद्धांत हैं जो न सिर्फ शक्ति के केंद्रीकरण को रोकते हैं, बल्कि लगातार यह सुनिश्चित करते हैं कि वैश्विक मंच पर भारत की छवि एक सफल एवं सबसे बड़े लोकतंत्र की बनी रहे।- जस्टिस सूर्यकांत

पिछले सात दशकों में देश ने किया है उल्लेखनीय विकास

उन्होंने कहा कि पिछले सात दशकों में देश ने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं नैतिक क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास किया है और लिखित कानून दिन प्रतिदिन के आधार पर इन सभी बदलावों को प्रतिबिंबित नहीं भी करते हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि इसलिए सवाल नागरिकों के अधिकारों का उठता है। उनकी सुरक्षा कैसे की जाए और मूल्यों व लोकतांत्रिक अधिकारों को जीवंत कैसे रखा जाए? विधायी कानूनों को लगातार संशोधित, निर्मित या वापस नहीं लिया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट पर क्या बोले शीर्ष अदालत के न्यायाधीश

उन्होंने कहा कि यहां आधुनिक दौर की चुनौतियों से निपटने में न्यायपालिका की भूमिका शुरू होती है। शीर्ष अदालत के न्यायाधीश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर देखिए, कैसे मौलिक अधिकारों को मानवाधिकारों में तब्दील कर दिया गया और मानवाधिकारों को मौलिक अधिकारों के रूप में देखा गया। नए तरह की इस व्याख्या ने वास्तव में मानवाधिकारों की गहरी अवधारणा को सामने रखा है जिसे मानवाधिकारों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न फैसलों में स्थान दिया गया है।

न्यायपालिका आपातकालीन अस्पताल के रूप में करती है काम

उन्होंने कहा कि संविधान के प्रविधानों के तहत नया कानून बनने में समय लगता है और ऐसी स्थिति में न्यायपालिका आपातकालीन अस्पताल के रूप में काम करती है और प्रतिदिन चौबीसों घंटे उपलब्ध रहती है। सेमिनार को दिल्ली हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन, पूर्व प्रधान न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार ने भी संबोधित किया।

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