नई दिल्‍ली (ऑनलाइन डेस्‍क)। इजरायल और संयुक्‍त अरब अमीरात (Israel-UAE Peace Agreement) में जो शांति समझौता हुआ है उसमें अमेरिका की अहम भूमिका रही है। इस समझौते को वैश्विक मंच पर ऐतिहासिक बताया जा रहा है। कहा ये भी जा रहा है कि इससे भविष्‍य में एक नई राह निकलेगी, जो इस समूचे इलाके के साथ-साथ अरब जगत के लिए भी नया सवेरा लेकर आएगी। भारत और पाकिस्‍तान के लिए इस समझौते के क्‍या मतलब है और इसका क्‍या असर भविष्‍य की राजनीति पर पड़ेगा, इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए दैनिक जागरण ने पश्चिम एशिया की राजनीति पर करीब से निगाह रखने वाले जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी स्थित सेंटर फॉर वेस्‍ट एशियन स्‍टडीज के प्रोफेसर एके पाशा से बात की।

प्रोफेसर पाशा इस समझौते को खास तो मानते हैं, लेकिन ऐतिहासिक नहीं मानते हैं। ऐसा इसलिए है, क्‍योंकि उनकी राय में इससे पहले इजरायल ने जो चार (1979, 1983 1994, 1993) समझौते किए थे उनको भी एतिहासिक बताया गया था, लेकिन उन समझौतों के बाद भी इस पूरे क्षेत्र में शांति जैसी कोई चीज दिखाई नहीं दी। ये सभी समझौते इस क्षेत्र के अलग-अलग देशों के साथ हुए थे। उनकी राय में इस समझौते को ईरान की बढ़ती ताकत के मद्देनजर किया गया है। यूएई और इजरायल दोनों ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम के विरोध में हैं। दोनों ही देश नहीं चाहते हैं कि वो अपनी सैन्‍य क्षमता में इजाफा करे, जिससे इस पूरे क्षेत्र में अस्थिरता का खतरा बढ़ जाए। ऐसे में ईरान के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए इजरायल का साथ जरूरी है।

इजरायल वर्तमान में अमेरिका का ही प्रतिनिधित्‍व भी करता है। इस समझौते में अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के दामाद जेयर्ड कुशनर की अहम भूमिका रही है। प्रोफेसर पाशा मानते हैं कि वर्तमान में यूएई और सऊदी अरब दोनों ही पाकिस्‍तान से नाराज है, लेकिन इस समझौते के बाद भविष्‍य में पाकिस्‍तान भी इजरायल से समझौता कर सकता है। भारत की जहां तक बात है तो इजरायल और संयुक्‍त अरब अमीरात दोनों ही भारत के बेहद करीबी देश हैं। ऐसे में भविष्‍य में इस्‍लामिक देशों के संगठन ओआईसी में कश्‍मीर का मुद्दा हमेशा के लिए खत्‍म हो सकता है।

इस समझौते के एक बिंदु वेस्‍ट बैंक पर इजरायल के दावे के सवाल पर प्रोफेसर पाशा ने कहा कि इजरायल की तरफ से फिलहाल इसको सस्‍पेंड करने की बात कही गई है। वेस्‍ट बैंक पर दावा छोड़ने की बात नहीं कही गई है। उनकी निगाह में इस समझौते एक सकारात्‍मक पहलू ये है कि अरब जगत में ये बात धीरे-धीरे जगह कर रही है कि इजरायल को हराना मुश्किल है, लिहाजा उसके साथ मिलकर चलने में ही फायदा है। उनके मुताबिक, ये दोनों ही देश बीते करीब पांच वर्षों से काफी करीब आए हैं। कई क्षेत्रों में ये दोनों साथ मिलकर चल रहे हैं। हालांकि, इसके केंद्र में ईरान से उत्‍पन्‍न खतरा ही है। उन्‍होंने बताया कि बीते कई दश्‍कों में इजरायल के खिलाफ यूएई ने अपनी सेना का इस्‍तेमाल नहीं किया है। पाशा का ये भी कहना है कि इन दोनों देशों के बीच कभी लड़ाई नहीं हुई है इसलिए इसको शांति समझौता कहना भी गलत होगा।

प्रोफेसर पाशा ने कहा कि इस समझौते का एक व्‍यापक असर जल्‍द ही दिखाई देगा। इसका जिक्र गुरुवार को दोनों देशों के बीच हुए समझौते के दौरान कुशनर ने भी किया था। इसमें बहरीन, सऊदी अरब, मोरक्‍को और ओमान से भी इसी तरह का समझौता किया जा सकता है। पाशा की राय में अब ये सभी देश इस बात को जान चुके हैं कि अब अमेरिका न तो उनकी सुरक्षा, न उनकी वित्‍तीय परेशानियों को बर्दाश्‍त करने के मूंड में नहीं है। ऐसे में इजरायल को अमेरिका के जूनियर पार्टनर की तरह से शामिल किया जा रहा है। ये सभी कुछ ईरान से होने वाले खतरे के मद्देनजर किया जा रहा है। ये देश इस बात से भी वाकिफ हैं कि अमेरिका की गैर मौजूदगी में इजरायल से ईरान के खिलाफ उन्‍हें ये मदद मिल सकती है।

उनका ये भी कहना है कि मौजूदा समय में ईरान से पूरा अरब जगत डरा हुआ है। ऐसे में उन्‍हें अमेरिका पर भी कम विश्‍वास है। इस समझौते के बाद ईरान को इजरायल की फौज के उसके घर के बाहर तक आने का डर रहेगा। ये कहीं न कहीं अरब जगत के दूसरे देशों के लिए सुरक्षा की गारंटी भी होगा। उनके मुताबिक, खाड़ी के देश अमेरिका को लेकर पहले बंटे हुए थे, लेकिन अब ये भी इजरायल के पक्ष में हो जाएंगे। उनकी निगाह में इसके दो तरह से प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। पहला, या तो इस क्षेत्र में अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव के बाद एक युद्ध छिड़ सकता है या फिर ईरान हथियार डालकर अमेरिका के साथ समझौता करने पर राजी हो सकता है। दूसरे प्रभाव की संभावना अधिक इसलिए भी, क्‍योंकि अमेरिका की तरफ से भी ये बात कही जा चुकी है।

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