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    Dengue Vaccine: भारत को जल्द मिलेगी डेंगू की वैक्सीन, कितनी होगी असरदार? जानिए पूरी डिटेल

    Updated: Sun, 13 Jul 2025 08:22 PM (IST)

    भारत अपनी पहली स्वदेशी डेंगू वैक्सीन बनाने के करीब है। आईसीएमआर और पैनेसिया बायोटेक द्वारा विकसित डेंगीआल वैक्सीन के तीसरे चरण का क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है जिसमें 10500 प्रतिभागियों के नामांकन की उम्मीद है। पहले और दूसरे चरण के परीक्षणों में सुरक्षा को लेकर कोई चिंता नहीं दिखी। नामांकित प्रतिभागियों पर दो साल तक नजर रखी जाएगी। डेंगू से सर्वाधिक प्रभावित देशों में भारत भी शामिल है।

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    पहली स्वदेशी डेंगू वैक्सीन बनाने के और करीब भारत।

    पीटीआई, नई दिल्ली। भारत अपनी पहली स्वदेशी डेंगू वैक्सीन बनाने के और करीब पहुंच गया है। पहले और दूसरे चरण की सफलता के बाद भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और पैनेसिया बायोटेक द्वारा 'डेंगीआल' वैक्सीन के तीसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल किया जा रहा है।

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    अब तक लगभग आठ हजार प्रतिभागियों ने नामांकन कराया है। अभी भारत में डेंगू के लिए कोई एंटीवायरल उपचार या लाइसेंस प्राप्त वैक्सीन नहीं है।

    कब तक पूरा होगा क्लिनिकल ट्रायल?

    आईसीएमआर के विज्ञानियों के अनुसार, 'डेंगीआल' के तीसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल में लगभग 10,500 प्रतिभागियों का नामांकन देश के 20 केंद्रों पर अक्टूबर तक पूरा होने की उम्मीद है। भारत की स्वदेशी टेट्रावैलेंट एक डोज वाली डेंगू वैक्सीन 'डेंगीआल' को पैनेसिया बायोटेक ने विकसित किया है।

    तीसरे चरण का परीक्षण पिछले साल अगस्त में शुरू हुआ था। इस परीक्षण में पहले प्रतिभागी को पिछले वर्ष पंडित भगवत दयाल शर्मा स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (पीजीआईएमएस), रोहतक में टीका लगाया गया था। इस चरण के क्लीनिकल ट्रायल के तहत अब तक पुणे, चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और भुवनेश्वर सहित विभिन्न केंद्रों में आठ हजार प्रतिभागियों को वैक्सीन या प्लेसीबो की खुराक दी गई।

    क्या होता है प्लेसीबो?

    प्लेसीबो ऐसा पदार्थ है जो देखने में दवा जैसा लगता है, लेकिन उसमें कोई सक्रिय घटक नहीं होता है। प्लेसिबो से शरीर पर कोई प्रभाव नहीं होता। इसका इस्तेमाल यह पता लगाने के लिए किया जाता है कि दवा का कितना और कैसा मानसिक असर पड़ता है।

    इस परीक्षण आईसीएमआर- नेशनल इंस्टीट्यूट आफ ट्रांसलेशनल वायरोलाजी एवं एड्स अनुसंधान संस्थान-पुणे, राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान (एनआईई)-चेन्नई और राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान-पुणे द्वारा किया जा रहा है। एनआईई के निदेशक डॉ. मनोज मुरहेकर ने कहा कि पहले और दूसरे चरण के परीक्षण के परिणामों में एक-खुराक वाली इस वैक्सीन को लेकर सुरक्षा चिंता का कोई कारण नहीं दिखा।

    प्रतिभागियों पर दो साल तक रखी जाएगी नजर

    • डॉ. मनोज मुरहेकर ने कहा कि तीसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल में नामांकित प्रतिभागियों पर दो साल तक नजर रखी जाएगी। इस परीक्षण में इस डेंगू टीके के असर का मूल्यांकन किया जाएगा। सभी चार सीरोटाइप के लिए प्रभावी वैक्सीन का विकास जटिल है।
    • डॉ. मुरहेकर ने बताया कि डेंगू वायरस के चार सीरोटाइप होते हैं, जिनमें एक-दूसरे के प्रति कम 'क्रास-प्रोटेक्शन' होता है, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति बार-बार संक्रमण का अनुभव कर सकते हैं।
    • भारत में डेंगू वायरस के सभी चार सीरोटाइप कई क्षेत्रों में संक्रमण फैला सकते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा था कि टेट्रावैलेंट डेंगू वैक्सीन स्ट्रेन (टीवी003/टीवी005) को मूल रूप से अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ (एनआईएच), अमेरिका द्वारा विकसित किया गया था।
    • इसने क्लीनिकल ट्रायल में आशाजनक परिणाम दिखाए। पैनेसिया बायोटेक स्ट्रेन प्राप्त करने वाली तीन भारतीय कंपनियों में से एक है। भारतीय टीका फार्मूलेशन के चरण-1 और 2 के क्लीनिकल परीक्षण 2018-19 में पूरे हुए थे और इसके आशाजनक परिणाम मिले।

    डेंगू से सर्वाधिक प्रभावित 30 देशों में शामिल है भारत

    भारत डेंगू से सर्वाधिक प्रभावित 30 देशों में शामिल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार पिछले दो दशकों में डेंगू के वैश्विक मामलों में लगातार वृद्धि हुई है। 2023 के अंत तक 129 से अधिक देशों में डेंगू अपने पैर पसार चुका है। भारत में, लगभग 75-80 प्रतिशत संक्रमण बिना लक्षण के होते हैं।

    20-25 प्रतिशत मामलों में जहां लक्षण दिखते हैं, बच्चों को अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु का जोखिम काफी अधिक होता है। इस साल मार्च तक डेंगू के लगभग 12,043 मामले सामने आए। 2024 में 2.3 लाख मामले और 297 लोगों की मौत हुई।

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