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    SCO की बैठक में चीन की BRI के खिलाफ अकेले खड़ा रहा भारत, रूस और पाकिस्तान हुए एक साथ

    By Jagran NewsEdited By: Shashank Mishra
    Updated: Wed, 05 Jul 2023 10:21 PM (IST)

    मंगलवार को शंघाई सहयोग संगठन की शिखर सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त घोषणा पत्र। रूस पाकिस्तान के अलावा सभी मध्य एशियाई देशों ने भी किया समर्थन। भारत की सक्रियता से जारी हुआ आतंकवाद व कट्टरपन पर अलग से घोषणा पत्र। चीन की बीआरआइ परियोजना का कजाख्स्तान किर्गिजस्तान पाकिस्तान रूस ताजिकिस्तान व उज्बेकिस्तान ने समर्थन किया है और साथ मिल कर इसे लागू करने की बात कही है।

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    शीर्ष नेताओं की बैठक के बाद देर शाम को जब एससीओ ने संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया।

    नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में भारत में एक बार फिर जता दिया है कि जब मुद्दों व अपनी राष्ट्रीय हित की बात आती है तो वह किसी भी बाहरी देश के दबाव में नहीं आता। मंगलवार को पीएम नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में एससीओ के शीर्ष नेताओं की बैठक में भारत ने चीन की तरफ से दूसरे देशों को सड़क, रेल, समुद्र मार्ग से जोड़ने के लिए शुरू की गई बेल्ट एंड रोड इनिसिटिव (बीआरआइ) का समर्थन करने से साफ मना कर दिया।

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    भारत ने BRI से खुद को रखा अलग

    शीर्ष नेताओं की बैठक के बाद देर शाम को जब एससीओ ने संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया तो उसमें बताया गया कि चीन की बीआरआइ कार्यक्रम का रूस, पाकिस्तान, काजिकस्तान, किर्गिजस्तान, उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान ने समर्थन किया है। यानी आठ सदस्यीय इस संगठन में सिर्फ भारत ही ऐसा देश रहा जिसने बीआरआइ से अपने आपको अलग कर दिया है। भारत की अध्यक्षता में पहली एससीओ की बैठक हुई है।

    सूत्रों के मुताबिक एससीओ की तरफ से सदस्य देशों के लिए वर्ष 2030 तक का आर्थिक एजेंडा बनाने के प्रस्ताव को भी भारत का समर्थन नहीं मिला है। संयुक्त घोषणा पत्र के मुताबिक शीर्ष नेताओं ने माना है कि एससीओ के जिन सदस्यों ने आर्थिक विकास रणनीति 2030 को स्वीकार किया है उनके लिए इसे लागू करना जरूरी है। इससे साफ है कि एससीओ के सभी सदस्य देश उक्त आर्थिक विकास रणनीति का समर्थन नहीं किया है।

    इस बारे में कोई अलग से बयान नहीं दिया गया है इसिलए पता नहीं कि किन देशों ने इसका समर्थन नहीं किया है लेकिन जानकारों का कहना है कि बीआरआइ की तरह इस रणनीति का समर्थन नहीं करने वाला एकमात्र देश भारत ही है।

    इस रणनीति में भी चीन के प्रभुत्व वाले कई मुद्दे हैं जिसको लेकर भारत सहमत नहीं है। जहां तक बीआरआइ का सवाल है तो भारत चीन की कनेक्टिविटी परियोजनाओं का विरोध करने वाला सबसे पहला देश है। इस पर चीन की तरफ से आयोजित सबसे पहले सम्मेलन में सिर्फ भारत ही शामिल नहीं हुआ था।

    पीएम मोदी ने  वर्चुअल तरीके से दिया भाषण

    भारत को मुख्य तौर पर बीआरआइ की तहत पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से हो कर बनाये जा रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक कारीडोर को लेकर आपत्ति है। कश्मीर का यह हिस्सा भारत का अभिभाज्य अंग है जिस पर पाकिस्तान ने अवैधानिक तरीके कब्जा कर रखा है। वर्चुअल तरीके से हुई एससीओ शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने भी अपने भाषण में कहा था कि, “कनेक्टिविटी प्रगति के लिए जरूरी है लेकिन एससीओ के सदस्य देशों की संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना भी बहुत जरूरी है।''

    संयुक्त घोषणा पत्र में दूसरे देशों की संप्रभुता या उनकी भौगोलिक अखंडता से जुड़े मुद्दों का जिक्र नहीं है। मई, 2020 में चीन के सैनिकों ने भारत के पूर्वी लद्दाख स्थित वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का उल्लंघन किया था। इसकी वजह से दोनो देशों के बीच सैन्य तनाव बना हुआ है।

    संयुक्त घोषणा पत्र में कहा गया है कि, “चीन की बीआरआइ परियोजना का कजाख्स्तान, किर्गिजस्तान, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान व उज्बेकिस्तान ने समर्थन किया है और साथ मिल कर इसे लागू करने की बात कही है।

    यूरेशियन आर्थिक क्षेत्र और बीआरआइ को जोड़ने पर भी बात हुई है।'' साफ है कि चीन की इस विशाल कनेक्टिविटी परियोजना का समर्थन भारत के अलावा दूसरे सभी एससीओ देश समर्थन कर रहे हैं। वैसे भारतीय प्रधानमंत्री ने इस बैठक में ईरान स्थित अपनी चाबहार पोर्ट और इस पोर्ट को मध्य एशिया से जोड़ने का प्रस्ताव किया है।