अभिव्यक्ति की आजादी vs सड़क छाप..., इमरान प्रतापगढ़ी की याचिका और SC में सिब्बल-सरकार आमने-सामने
कांग्रेस सांसद और शायर इमरान प्रतापगढ़ी (Imran Pratapgarhi) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक बार फिर गुजरात पुलिस को फटकार लगाई। दरअसल गुजरात पुलिस ने सांसद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है जिसको रद करने के लिए प्रतापगढ़ी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि FIR दर्ज करने से पहले पुलिस को कुछ संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि देश ने 75 साल पहले संविधान को अंगीकार किया था। इतने वर्ष बीत जाने के बाद कम से कम अब तो पुलिस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को समझना चाहिए।
किस बात पर भड़का सुप्रीम कोर्ट?
कोर्ट ने कांग्रेस सांसद और पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष इमरान प्रतापगढ़ी की उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया जिसमें उन्होंने कथित तौर पर भड़काऊ गाना शेयर करने के लिए अपने खिलाफ दर्ज एफआइआर को रद करने की मांग की थी।
जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को संरक्षित करने के महत्व को रेखांकित किया।
जस्टिस ओका ने कहा, जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात आती है तो इसे संरक्षित किया जाना चाहिए। FIR दर्ज करने से पहले पुलिस को कुछ संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। उन्हें कम से कम संविधान के अनुच्छेद को अवश्य पढ़ना और समझना चाहिए। संविधान अंगीकार किए जाने के 75 साल बाद कम से कम अब तो पुलिस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को समझना चाहिए।
'ऐ खून के प्यासे बात सुनो' कविता पर सवाल
गौरतलब है कि गुजरात के जामनगर में आयोजित सामूहिक विवाह समारोह में प्रतापगढ़ी ने शिरकत की थी। इस दौरान कथित तौर पर भड़काऊ गीत शेयर करने के लिए तीन जनवरी को उनके खिलाफ एफआइआर दर्ज की गई थी।
ये कविता विशेष समुदाय के खिलाफ कैसे?
जस्टिस ओका ने कहा कि यह दरअसल एक कविता थी जिसमें अहिंसा को बढ़ावा देने की बात कही गई है। इसके अनुवाद में कुछ समस्या लगती है। यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। यह कविता अप्रत्यक्ष रूप से यह कहती है कि भले ही कोई हिंसा में लिप्त हो, हम हिंसा में लिप्त नहीं होंगे। यही संदेश कविता देती है। यह किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नहीं है।
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'सड़क छाप' कविता से तुलना
गुजरात पुलिस की ओर से पेश सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह ''सड़क छाप'' कविता थी और इसे फैज अहमद फैज जैसे प्रसिद्ध कवि एवं लेखक से संबंधित नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा, ''सांसद के वीडियो संदेश की वजह से ही समस्या पैदा हुई।'' सांसद की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि इमरान प्रतापगढ़ी ने नहीं, बल्कि उनकी टीम ने यह वीडियो संदेश साझा किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने 21 जनवरी को कथित तौर पर एक उत्तेजक गीत का संपादित वीडियो पोस्ट करने के मामले में प्रतापगढ़ी के खिलाफ कार्यवाही पर रोक लगा दी थी और उनकी अपील पर गुजरात सरकार और शिकायतकर्ता किशनभाई दीपकभाई नंदा को नोटिस जारी किया था।
इमरान प्रतापगढ़ी बनाम गुजरात राज्य
कांग्रेस नेता ने गुजरात उच्च न्यायालय के 17 जनवरी के आदेश को चुनौती दी, जिसने उनके खिलाफ दायर एफआईआर को रद्द करने की उनकी याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जांच बहुत प्रारंभिक चरण में थी। प्रतापगढ़ी पर 3 जनवरी को गुजरात के जामनगर में एक सामूहिक विवाह समारोह के दौरान कथित उत्तेजक गीत के लिए मामला दर्ज किया गया था।
इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ केस की पूरी टाइमलाइन
- इमरान प्रतापगढ़ी पर आरोप है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर एक भड़काऊ गीत पोस्ट किया था।
- राष्ट्रीय एकता को विखंडित और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला था।
- यह मामला गुजरात के जामनगर में दर्ज किया गया था।
- इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 196 और 197 के तहत FIR की गई थी।
- इमरान प्रतापगढ़ी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी जिसमें उन्होंने इस मामले को रद करने की मांग की थी।
- सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की और फैसला सुरक्षित रख लिया।
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