IIT गुवाहाटी को मिली बड़ी उपलब्धि, खोजी सूर्य प्रकाश से मेथनाल ईंधन बनाने की तकनीक
आईआईटी गुवाहाटी ने सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड से मेथनाल ईंधन बनाने की तकनीक विकसित की है। यह उपलब्धि स्वच्छ ईंधन और पर्यावरण संरक ...और पढ़ें

IIT गुवाहाटी को मिली बड़ी उपलब्धि (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली : अब भारत ईंधन से प्रदूषण नहीं फैलाएगा, बल्कि सबसे बड़े प्रदूषकों में से एक कार्बन डाइआक्साइड से ही सूर्य प्रकाश की मदद से मेथनाल ईंधन बनाएगा।
आइआइटी गुवाहाटी ने सूर्य प्रकाश की मदद से मेथनाल बनाने की तकनीक खोज ली है। यह स्वच्छ ईंधन और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धि है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने फोटोकैटेलिटिक मेटेरियल (उत्प्रेरक) विकसित किया है, जो सूरज की रोशनी का उपयोग करके कार्बन डाइआक्साइड को मेथनाल में बदल सकता है।
इससे पेट्रोलियम आधारित ईंधनों पर निर्भरता कम होगी जो कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन का स्त्रोत है। इससे पर्यावरण को और नुकसान पहुंचाए बिना बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकेगा, वहीं पेट्रोलियम पदार्थों के आयात कम होने से विदेशी मुद्रा भी बचेगी।
यह अध्ययन जर्नल आफ मटेरियल्स साइंस में प्रकाशित हुआ है। थर्मल पावर प्लांट, सीमेंट निर्माण इकाइयों, स्टील उत्पादन केंद्रों और पेट्रोकेमिकल रिफाइनरियों जैसे उद्योगों में इस नई तकनीक का उपयोग किया जा सकेगा।
आइआइटी गुवाहाटी के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर महुया डे ने बताया कि पेट्रोलियम आधारित ईंधनों पर निर्भरता कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन का बड़ा कारण है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। सौर ऊर्जा का उपयोग कर कार्बन डाइआक्साइड को हरित ईंधन में बदलना इस दिशा में आशाजनक तकनीक है। इससे पर्यावरणीय समस्याओं को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
दुनियाभर के शोधकर्ता इस चुनौती का समाधान करने के लिए पहले से ही ग्रेफाइटिक कार्बन नाइट्राइड का उपयोग कर रहे हैं, जो कम लागत वाला गैर-जहरीला पदार्थ है। हालांकि, तीव्र ऊर्जा हानि और कम ईंधन उत्पादन के कारण अब तक कोई समाधान विकसित नहीं हो सका।
आइआइटी गुवाहाटी की टीम ने इस चुनौती का समाधान निकालते हुए ग्रेफाइटिक कार्बन नाइट्राइड को फ्यू-लेयर ग्रेफीन के साथ मिलाया। ग्रेफीन बेहतर विद्युत चालकता के लिए जाना जाता है। यह अल्ट्रा-पतला कार्बन मेटेरियल उत्प्रेरक के भीतर ऊर्जा हानि कम करने में मदद करता है।
शोध में पता चला कि ग्रेफीन की मौजूदगी से कैटेलिस्ट लंबे समय तक सक्रिय रहता है। इससे सूरज की रोशनी के बेहतर अवशोषण होता है। परीक्षण किए गए विभिन्न संयोजनों में 15 प्रतिशत ग्रेफीन वाला कैटेलिस्ट सबसे अधिक प्रभावी साबित हुआ। इसमें अच्छी स्थिरता भी पाई गई, जो व्यावहारिक उपयोग के लिए बेहद जरूरी है। अगला कदम इस तकनीक को व्यावहारिक स्तर पर क्रियान्वित करना है। टीम एक दीर्घकालिक फोटोकेटालिटिक प्रणाली विकसित करने की योजना भी बना रही है, जो औद्योगिक कार्बन डाइआक्साइड को स्वच्छ ईंधनों में बदल सके। (समाचार एजेंसी आइएएनएस के इनपुट के साथ)

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