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नई दिल्ली, शशि कुमार (शशिकांत)। 'पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं'- हिंदी का एक चर्चित मुहावरा है। यह मुहावरा बीसवीं सदी की हिंदी कविता के एक बड़े काव्यान्दोलन- छायावाद के कवि सुमित्रानंदन पंत पर लागू होता है। पंत जी के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने महज सात साल की उम्र से ही कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। तब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे। 

 बाल्यावस्था में लिखी गई था काव्य संग्रह वीणा
उनका 'वीणा' काव्य-संग्रह उनके बाल्यावस्था (सन 1907 से सन 1918 के बीच) में लिखी गईं कविताओं का संकलन है, जो 1927 में प्रकाशित हुआ। साहित्य के सन्दर्भ में यह वह समय था जब खड़ी बोली में हिंदी कविता अपने शैशवावस्था में थी। हिंदी कविता पर द्विवेदीयुगीन कविता की इतिवृत्तात्मकता, उपदेशात्मकता एवं वक्रता का प्रभाव था।      

प्रणाली से मुक्त होने के लिए छटपटा रही थी कविता 
इस बंधी-बंधाई प्रणाली से मुक्त होने के लिए हिंदी कविता छटपटा रही थी। काव्य के क्षेत्र में पौराणिक युग की किसी घटना या चरित्र के बाह्य वर्णन से भिन्न अनुभूतिपरक वेदना के आधार पर रचनात्मक अभिव्यक्ति को तरजीह देने को लेकर बहस शुरू हो गई थी। 

आकर्षक वातावरण में पले-बढे कवि सुमित्रानंदन 
इसी समय में प्रकृति के मनोरम और आकर्षक वातावरण में पले-बढे कवि सुमित्रानंदन पंत अपनी आरंभिक काव्य-कृति 'वीणा' लेकर उपस्थित हुए। बेशक, पंत जी के उन्मुक्त कवि-मन की इस आत्माभिव्यक्ति ने खड़ी बोली हिंदी को अपनी काव्य रचना के लिए स्वीकार किया। दरअसल खड़ी बोली हिंदी में अपने भावोदगार को व्यक्त करने का पंत जी का यह फैसला कई मायने में ऐतिहासिक था। आनेवाले समय में उनकी इसी बुनियाद पर बीसवीं सदी की हिंदी कविता का एक बड़ा काव्यान्दोलन (छायावाद) खड़ा होनेवाला था। 

पंत जी को विरासत के तौर पर मिली काव्य परंपरा
पंत जी को विरासत के तौर पर भारतेंदु और द्विवेदी युग की वह काव्य परंपरा मिली थी जो कि खड़ी बोली का एक स्वरूप तैयार कर चुकी थी। यह छायावाद एवं पंत जी की ही देन है कि खड़ी बोली में कोमल भावों को प्रस्तुत करने की चुनौती को स्वीकार किया गया। आगे चलकर अज्ञेय पंत जी के प्रयासों की तारीफ करते हुए लिखते हैं, 'अपने नए कथ्य के अनुरूप नयी भाषा की तलाश छायावादी कवियों के सामने एक ऐतिहासिक चुनौती थी और इस चुनौती का सामना पंत जी सहित सभी छायावादी कवियों ने साहस के साथ किया।

    

इस राह पर चलने वाले अकेले  रचनाकार नहीं थे पंत
हालांकि, पंत जी इस राह पर चलनेवाले अकेले रचनाकार नहीं थे लेकिन चारों छायावादी कवियों में सबसे पहले रचनाकार ज़रूर थे। जयशंकर प्रसाद चारों छायावादी कवियों में उम्र में सबसे बड़े थे। सन 1998 में नौ वर्ष की उम्र में 'कलाधर' के नाम से व्रजभाषा में सवैया लिखकर उन्होंने काव्य रचना के क्षेत्र में पदार्पण किया था। लेकिन आख़िरकार उन्होंने भी खड़ी बोली हिंदी को ही अपनी काव्य रचना का माध्यम बनाने का फैसला किया। खड़ी बोली में उनकी पहली रचना 'खोलो द्वार' शीर्षक से 1914  में 'इंदु' में प्रकाशित हुई। निराला जी ने सन 1920 के आसपास लिखना शुरू किया। उनकी पहली रचना 'जन्मभूमि' पर लिखा गया एक गीत था, जो उन्होंने खड़ी बोली हिंदी में लिखा था। महादेवी वर्मा तीनों से उम्र छोटी थीं। 

हालांकि, पंत जी की तरह सात वर्ष की छोटी उम्र से ही वह कविता लिखने लगी थीं और सन 1925 तक जब उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की, वे एक सफल कवयित्री के रूप में चर्चित हो चुकी थीं। सन 2928  में पंत जी के तीसरे काव्य- संग्रह पल्लव का प्रकाशन होता है। पंत जी इसमें एक लम्बी भूमिका लिखते हैं। डॉ  नगेंद्र 'पल्लव' की भूमिका को हिंदी के छायावाद का ऐतिहासिक घोषणापत्र कहकर इसके महत्त्व को और बढ़ा देते हैं। डॉ। नगेंद्र लिखते हैं, पल्लव की भूमिका में पंत जी ने भाषा, अलंकार, छंद, शब्द और भाव के सामरस्य पर विचार व्यक्त किया है। जिससे यह स्पष्ट होता है कि कवि भाषा के प्रयोग में कितना जागरूक है। 

दरअसल पल्लव की भूमिका में पंत जी ने काव्य-भाषा की प्रासंगिकता और महत्त्व पर विचार करते हुए ब्रजभाषा और अवधी बनाम खड़ी बोली हिंदी को लेकर चल रहे विवाद पर हस्तक्षेप किया है। 'पल्लव'की भूमिका में पंत जी लिखते हैं, 'हमें भाषा नहीं राष्ट्रभाषा की आवश्यकता है। पुस्तकों की नहीं, मनुष्यों की भाषा, जिसमें हम हंसते रोते, खेलते-कूदते, लड़ते, गले मिलते, सांस लेते और रहते हैं, जो हमारे देश की मानसिक दशा का मुख दिखलाने के लिए आदर्श हो सके, जो कलानिल के ऊंच-नीच, ऋतु- कुंचित, कोमल-कठोर, घात-प्रतिघात की ताल पर विशाल समुद्र की शत-शत स्पष्ट स्वरूपों में तरंगित-कल्लोलित हो, आलोड़ितविलोड़ित हो, हंसती-गरजती, चढ़तीगिरती, संकुचित-प्रसारित होती, हमारे हर्ष-रुदन, विजय-पराभव, चीत्कारकिलकार, संधि-संग्राम, को प्रतिध्वनित कर सके, उसमें स्वर भर सके।   

खड़ी बोली को साहित्यिक रचना की भाषा नहीं बनाना चाहते थे पंत
स्पष्ट है कि पंत जी आम जनता की भाषा खड़ी बोली हिंदी को साहित्यिक रचना की भाषा के रूप में स्थापित ही नहीं करना चाहते बल्कि उसे राष्ट्रभाषा बनाए जाने का आग्रह भी करते हैं। हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक 'छायावाद' में इस काव्यान्दोलन को परिभाषित करते हुए लिखा है, छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो एक और पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था और दूसरी और विदेशी पराधीनता से इस लिहाज से देखें तो हमें भाषा नहीं राष्ट्रभाषा की आवश्यकता है, पंत जी के इस आग्रह का राजनीतिक महत्व था।

 उस समय राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन चरम पर था। देशवासियों को भाषाई स्तर पर एक सूत्र में बांधने के लिए एक सर्वमान्य भाषा की तलाश को लेकर राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ी हुई थी। श्री केशवचंद्र सेन ने सन 1873 में ही अपने पत्र 'सुलभ समाचार' में लिखा, 'यदि भाषा एक न होने पर भारतवर्ष में एकता न हो तो उसका उपाय क्या है? समस्त भारतवर्ष में एक भाषा का प्रयोग करना इसका उपाय है। इस समय भारत में जितनी भी भाषाएं प्रचलित हैं, उनमें हिंदी भाषा प्राय सर्वत्र प्रचलित है। इस हिंदी भाषा को यदि भारतवर्ष की एक मात्र भाषा बनाया जाए तो अनायास ही (यह एकता) शीघ्र ही सम्पन्न हो सकती है।

लेखक शशि कुमार (शशिकांत) मोतीलाल नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। 

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Posted By: Ayushi Tyagi

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