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    महिला प्रधानों के काम में दखल नहीं दे पाएंगे पति, कमेटी ने दिए कई अहम सुझाव; पढ़ें पूरी रिपोर्ट

    Updated: Wed, 26 Feb 2025 10:00 PM (IST)

    पंचायतीराज मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के छह जुलाई 2023 के आदेश के पालन में 19 नवंबर 2023 को भारत सरकार के पूर्व खान सचिव सुशील कुमार की अध्यक्षता में सलाहकार समिति गठित की थी। समिति ने भी लगभग डेढ़ वर्ष के अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट पेश की है। इस अव्यवस्था को रोकने के लिए कानूनी प्रविधान की भी कमी महसूस की गई है।

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    सरपंच पति जैसी कुप्रथा महिला नेतृत्व को सशक्त होने से रोक रही है (फोटो: पीटीआई/फाइल)

    जितेंद्र शर्मा, नई दिल्ली। यह दशकों तक रही अनदेखी का ही परिणाम है कि 73वें संविधान (संशोधन) 1992 के माध्यम से पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं को पर्याप्त भागीदारी के अवसर दिए जाने के बाद भी प्रधान पति या सरपंच पति जैसी कुप्रथा महिला नेतृत्व को सशक्त होने से रोक रही है।

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    सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पंचायतीराज मंत्रालय द्वारा बनाई गई सलाहकार समिति ने भी लगभग डेढ़ वर्ष के अध्ययन में यह पाया कि पितृसत्तात्मक सोच, सीमित कानून और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएं पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी और नेतृत्व में बाधा बन रही हैं।

    कमेटी ने सुझावों के साथ दी रिपोर्ट

    अब समिति ने इस प्रथा को समाप्त करने के लिए महिला पंचायत प्रतिनिधि के काम में हस्तक्षेप करने वाले उनके पति या अन्य पुरुष रिश्तेदारों को दंडित किए जाने सहित कई सुझाव शामिल करते हुए अपनी रिपोर्ट सौंप दी है।

    पंचायतीराज मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के छह जुलाई, 2023 के आदेश के पालन में 19 नवंबर 2023 को भारत सरकार के पूर्व खान सचिव सुशील कुमार की अध्यक्षता में सलाहकार समिति गठित की थी। समिति ने 14 राज्यों में शोध और क्षेत्रीय दौरे कर निष्कर्षों पर अपनी रिपोर्ट तैयार कर मंत्रालय को सौंप दी है।

    पंचायतों में 46 फीसदी महिलाएं

    इसमें बताया गया है कि 73वें संशोधन से पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों का आरक्षण अनिवार्य किया गया, लेकिन 21 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों ने इसका विस्तार करते हुए आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत कर दिया है। इसके कारण 2.63 लाख पंचायतों के 32.29 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों में 15.03 लाख यानी लगभग 46.6 प्रतिशत महिलाएं हैं।

    यह भागीदारी आंकड़ों में भले ही मजबूत दिखाई देती है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। सच यह है कि सामान्यत: महिला पंचायत प्रतिनिधि स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पा रही हैं। उनके कामकाज में उनके पति या अन्य पुरुष रिश्तेदारों का मजबूत हस्तक्षेप है।

    पितृसत्तात्मक सोच समेत कई कारण

    इसके पीछे के कारणों को भी समिति ने स्पष्ट किया है। जैसे कि महिलाओं में जागरुकता की कमी, अनुभव, ज्ञान, कौशल, नेतृत्व गुणवत्ता की कमी, शिक्षा का निम्न स्तर और संपर्क की कमी आदि हैं।

    इसके अलावा जाति-वर्ग के आधार पर सामाजिक प्रतिरोध, पितृसत्तात्मक सोच, संबंधित क्षेत्रीय विभागों से सहयोगी की कमी, राजनीतिक दलों का प्रभुत्व और सीटों का रोटेशन जैसे कारक भी इससे प्रभावित कर रहे हैं। इस अव्यवस्था को रोकने के लिए कानूनी प्रविधान की भी कमी महसूस की गई है।

    समिति के प्रमुख सुझाव:

    • प्रॉक्सी नेतृत्व के बारे में गोपनीय शिकायतों के लिए हेल्पलाइन और महिला निगरानी समिति की प्रणाली बनाई जाए। सत्यापित मामलों में मुखबिर को पुरस्कार दिया जाए।
    • प्रॉक्सी नेतृत्व के सत्यापित मामलों के लिए अनुकरणीय दंड लागू किया जाना चाहिए, जिससे पुरुष रिश्तेदारों के हस्तक्षेप को रोका जा सके।
    • महिला लोकपाल की नियुक्ति, ग्राम सभा में महिला प्रधानों का सार्वजनिक शपथ ग्रहण, महिला पंचायत नेताओं का संघ बनाया जाए।
    • जेंडर रिसोर्स सेंटर स्थापित कर महिला पंचायत प्रतिनिधियों को नेतृत्व प्रशिक्षण, कानूनी सलाह और सहायता नेटवर्क विकसित किया जाए।
    • स्थानीय भाषाओं में रीयल टाइम कानूनी और शासन का मार्गदर्शन उपलब्ध कराने के लिए एआइ संचालित उत्तरों को एकीकृत किया जाए।
    • महिला पंचायत प्रतिनिधियों का व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर उससे अधिकारियों को जोड़ा जाए।
    • पंचायतीराज मंत्रालय का पंचायत निर्णय पोर्टल भी निर्वाचित प्रधानों की भागदारी को ट्रैक कर एक मंच की भूमिका निभाए।
    • विधायक और सांसद निर्वाचित महिला प्रधानों के मेंटर बनकर उन्हें प्रोत्साहित करें। जिला और ब्लाक स्तर पर महिला निगरानी परिषद गठित करें।
    • निर्वाचित महिला नेताओं के क्षेत्रीय व जिला स्तरीय नेटवर्क, महिला संघ आदि बनाए जाने चाहिए।

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