महोबा (अभिषेक द्विवेदी )। खजुराहो शिल्प के लिए दुनियाभर में विख्यात है तो बुंदेली धरा के छोटे से गांव गौरहारी की भी अपनी एक अलग , एक अलग पहचान है। इसकी गौरा पत्थर कला बेमिसाल है। देश-विदेश तक इसके चाहने वाले हैं। यहां गौरा पत्थर से बनी भगवान बुद्ध की लाल प्रतिमा चीन को धर्म से जोड़ती है तो बर्तन बंगाल को उसकी परंपरा से। हालांकि, आपदा की मार से बुंदेलखंड में उपजे विषम हालात का असर पत्थर कला पर भी पड़ा है। इससे जुड़े कई लोग पलायन कर गए, मगर इस कला की जड़ें खोखली नहीं हुई हैं। आज भी चंद ही सही, हुनरमंद कुछ परिवार पत्थरों की कलात्मकता और इसकी मांग को बनाए रखे हैं। परंपरागत औजारों के इतर आधुनिक उपकरणों का प्रयोग कर पत्थर कला को नया कलेवर दे रहे हैं।

मुनाफे का दौर 

महोबा जिले के गौरहारी गांव में गौरा पत्थरों को तराश कलाकृतियों में ढालने वाले आधा दर्जन परिवार बचे हैं। इस कला के संरक्षण में कालीदीन और उनके परिवार का सबसे ज्यादा योगदान है। कालीदीन व ब्रजकिशोर बताते हैं कि पहले छेनी, हथौड़ी, रेती आदि औजारों से काम होता था। समय अधिक लगने के साथ मुनाफा कम था। कार्बन मशीन, ग्राइंडर, इलेक्टिक डिल व कटर आदि का प्रयोग शुरू किया तो कम समय में अधिक और अपेक्षाकृत सफाई वाली नक्काशी का माल तैयार होता है। पहले दो व्यक्ति दिनभर की मेहनत से चार इंच की पत्थर की 25 कटोरी तैयार करते थे। प्रति कटोरी 86 रुपये के खर्च पर 164 रुपये कमाई होती थी। आधुनिकतम उपकरणों से एक व्यक्ति अब दिनभर में 50 कटोरी तैयार करता है। लागत 41 रुपये आती है, मुनाफा 208 रुपये हो रहा है।

कला को सम्मान

कालीदीन को वर्ष 2004, 2005, 2006, 2007 में हस्तशिल्प राज्य पुरस्कार, वर्ष 2006 में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय से, वर्ष 2016 में आयुक्त एवं निदेशक उद्योग से सम्मान मिला। उनके पिता मिच्चू मिस्त्री को वर्ष 1981 व 1983 में हस्तशिल्प पुरस्कार मिला था। पत्नी रामप्यारी, पुत्र वीरेंद्र कुमार, रवींद्र व महेश कुमार दो साल पूर्व मुख्यमंत्री के हाथों सम्मानित हो चुके हैं।एक जिला एक उत्पाद योजना के तहत महोबा से गौरा पत्थरों के उत्पादों का प्रस्ताव भेजा गया है जो स्वीकृत हो गया है। अब शासन की योजना के अनुसार इस उद्योग को बढ़ाया जाएगा। 

गौरा पत्थर की खासियत

पहले हर घर में गौरा पत्थरों के बने बर्तनों का उपयोग होता था। पश्चिम बंगाल में चाहे अमीर हो या गरीब, विवाह में इन पत्थरों के बने पांच बर्तन जरूर दिए जाते हैं। दिल्ली और आगरा के माध्यम से बुद्ध प्रतिमा चीन तक जाती है। कोलकाता, दिल्ली, आगरा, मुंबई, बेंगलुरु, कटनी, जयपुर आदि प्रमुख बाजार हैं। इसे आसानी से काटा, छीला और घिस कर आकार दिया जा सकता है। यह हरा, लाल, पीला, नीला, बादामी, सफेद, कत्थई, काला, बैगनी अधिकांश रंगों में पाया जाता है। इससे बर्तन, मूर्तियां, घरेलू सजावटी सामान व जरूरत की अन्य वस्तुएं बनाई जाती हैं।

पिछले माह राष्‍ट्रपति भी कर चुके हैं सराहना 
पिछले माह राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी इस पत्‍थर और इस कला का सराहना की थी। आपको बता दें कि पिछले माह राष्‍ट्रपति लखनऊ गए थे। कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए लखनऊ में आयोजित ओडीओपी (एक जिला एक उत्पाद) समिट में मुख्यमंत्री के साथ राष्ट्रपति जब गौरा पत्थरों के उत्पादों के स्टाल पर पहुंचे तो कला के बेजोड़ नमूने देख जमकर सराहना की। बारीकियां जानने के साथ ही कारीगरों को प्रोत्साहित किया। थोड़े प्रयास से इस कुटीर उद्योग के विस्तार की असीम संभावनाएं बताई। इस कला के प्रति राष्ट्रपति की दिलचस्पी ने इस कुटीर उद्योग के लिए उम्मीदों का धरातल तैयार कर दिया।

Posted By: Kamal Verma