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    पेंडिंग मामलों पर एक्सपर्ट ने जताई चिंता, कहा - नोटिस, सम्मन सर्विस और सुनवाई के स्तर पर तय करनी होगी समय सीमा

    By Jagran NewsEdited By: Ashisha Singh Rajput
    Updated: Sun, 04 Jun 2023 08:25 PM (IST)

    अभी सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठों में होने वाली सुनवाई में इसे शुरू किया है जिसमें सुनवाई से पहले उसका पूरा कार्यक्रम तय कर लेते हैं ताकि वास्तविक सुनवाई शुरू होने पर उसे स्थगित न करना पड़े लेकिन ये चीज हर केस में लागू होनी चाहिए।

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    विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक का इस्तेमाल हो तो पेंडेंसी अगले कुछ साल में ही शून्य भी हो सकती-

    नई दिल्ली, माला दीक्षित। चार साल पहले 2018-2019 के आर्थिक सर्वेक्षण में लंबित मुकदमों पर एक अध्याय था, जिसमें कहा गया था कि लंबित केस खत्म करने का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। उसमें लंबित मुकदमों को पांच साल में खत्म करने के तरीके बताए गए थे।

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    लंबित मुकदमों की संख्या

    उस समय लंबित मुकदमों की संख्या 3.53 करोड़ थी, जबकि आज मुकदमों की संख्या बढ़ कर 4.34 करोड़ हो चुकी है। यानी पेंडेंसी खत्म होना तो दूर, बल्कि बढ़ गई है। स्पष्ट है कि इंसाफ तत्काल मिले, इसके लिए बहस तो हो रही है लेकिन प्रयास नाकाफी हैं।

    छोटे-छोटे प्रयासों और सुधारों से भी बदल सकते हैं हालात

    विशेषज्ञों का मानना है कि नोटिस, सम्मन सर्विस, प्री ट्रायल कान्फ्रेंस और वीडियो कान्फ्रेंसिंग से गवाही लागू होने से स्थिति काफी हद तक सुधर सकती है। जजों की पूर्ण तैनाती और पुलिस के स्तर पर सही वक्त में जांच पूरी हो जाए, तकनीक का इस्तेमाल हो तो पेंडेंसी अगले कुछ साल में ही शून्य भी हो सकती है।

    केस मैनेजमेंट और पेंडेंसी के मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रही संस्था दक्ष के प्रोग्राम डायरेक्टर बीएस सूर्यप्रकाश कहते है कि किसी भी मुकदमे में सबसे ज्यादा देरी की स्टेज है नोटिस या सम्मन की सर्विस में देरी। इसके लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि कैसे नोटिस-सम्मन जल्दी सर्व हों ताकि केस आगे बढ़ सके। नोटिस सर्व न हो पाने की समस्या सरकार के स्तर तक पर है। कई बार सरकार के महकमों को या सरकारी वकील को समय पर नोटिस सर्विस नहीं हो पाता।

    क्या है सबसे बड़ी समस्या?

    समस्या का दूसरा बिंदु सुनवाई में स्थगन होना यानी एडजार्नमेंट है। अभी मुकदमा लिस्ट होने के बाद भी तय नहीं होता है कि उस दिन कुछ होगा ही। यानी सुनवाई का स्थगन एक बड़ी समस्या है। अदालतों को स्थगन के मामले में सख्त होना चाहिए। बेवजह के स्थगन पर जुर्माना लगना चाहिए। पक्षकारों को भी चाहिए कि अगर वे तय तारीख पर सुनवाई के लिए तैयार नहीं हैं तो वे कोर्ट में पहले से केस मेंशन करके सूचित करें कि हमारी तारीख हटा दी जाए उस दिन दूसरा केस लिस्ट कर दिया जाए।

    प्री ट्रायल कान्फ्रेंस

    तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु है प्री ट्रायल कान्फ्रेंस। इसमें केस का ट्रायल शुरू होने से पहले कोर्ट तय कर लेता है कि किस तरह से मामले की सुनवाई होगी, कितने दिन किसको समय दिया जाएगा, कितने दिन के अंदर हर पक्ष को गवाह प्रस्तुत करने होंगे। उसी अनुसार हर पक्ष को दस्तावेज भी पहले ही मिल जाते हैं ताकि समय आने पर वह अपना पक्ष रख सके। केरल में ऐसा होता है। और इसीलिए केस पर सुनवाई और निर्णय के आंकड़े केरल में अच्छे हैं।

    बढ़ाया जाना चाहिए वीडियो कान्फ्रेंसिंग का इस्तेमाल

    अभी सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठों में होने वाली सुनवाई में इसे शुरू किया है, जिसमें सुनवाई से पहले उसका पूरा कार्यक्रम तय कर लेते हैं ताकि वास्तविक सुनवाई शुरू होने पर उसे स्थगित न करना पड़े लेकिन ये चीज हर केस में लागू होनी चाहिए। अगला सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है वीडियो कान्फ्रेंसिंग का इस्तेमाल और बढ़ाया जाना चाहिए।

    वीडियो कान्फ्रेंसिंग सिर्फ ब्राडकास्ट के लिए ही न हो, बल्कि गवाहों की पेशी और गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए इसका प्रयोग किया जाए। जैसे कई बार अधिकारियों के तबादले हो जाते हैं या कोई गवाह दूर है, वह कोर्ट आकर पेश नहीं हो पा रहा तो ऐसे में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये उसके बयान दर्ज किये जाएं ताकि सुनवाई जल्दी पूरी हो सके।

    किस तरह होगा स्थिति में सुधार?

    इस बार एक चीज अच्छी हुई है सरकार ने ई कोर्ट प्रोजेक्ट के तीसरे चरण के लिए 7000 करोड़ रुपये मंजूर किये हैं। चार साल के लिए ये राशि मंजूर की गई है। दो साल बाद इसमें राज्यों को भी योगदान देना होगा। यह पैसा कोर्टों में ढांचागत संसाधन बढ़ाने, डिजटलाईजेशन, एआइ के प्रयोग आदि पर खर्च होगा। यह रकम काफी है और अगर इसे ठीक से प्रयोग किया जाता है तो स्थिति में काफी सुधार आने की उम्मीद है।

    रोजाना दाखिल होने वाले मुकदमे

    शुक्रवार को देश भर की जिला अदालतों में मुकदमो के निस्तारण की दर 69 प्रतिशत थी जबकि उससे एक दिन पहले गुरुवार को ये दस प्रतिशत ज्यादा यानी 79 प्रतिशत थी। जबकि गुरुवार से एक दिन पहले बुधवार को 71 प्रतिशत थी।

    इसे देखने से पता चलता है कि मुकदमे निपटने की रोजाना की दर औसतन 70 प्रतिशत है। लेकिन इसके साथ ही अब रोजाना दाखिल होने वाले मुकदमों की दर भी देख लेते हैं, क्योंकि मुकदमों के निस्तारण की दर रोजाना दाखिल होने वाले मुकदमों की दर से ही निकाली जाती है। शुक्रवार को देश भर की जिला अदालतों में कुल 49131 मुकदमे दाखिल हुए जबकि गुरुवार को 41453 और बुधवार को 48930 मुकदमे दाखिल हुए।