SC में हिजाब विवाद पर सुनवाई, सालिसिटर जनरल ने कहा- विवाद के पीछे थी गहरी साजिश
कर्नाटक सरकार की ओर से सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उस आदेश को प्रस्तुत किया जिसमें सिफारिश की गई थी कि सभी छात्र शिक्षण संस्थान द्वारा निर्धारित पोशाक पहनेंगे। सालीसीटर जनरल ने कहा कि इस्लामिक देशों में भी हिजाब को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहा है।

जागरण ब्यूरो/एजेंसियां, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में मंगलवार को सालिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta) ने कहा कि कनार्टक के स्कूलों में हिजाब पहनने का मामला (Hijab Row) अचानक नहीं उठा। इसके पीछे गहरी साजिश थी। पिछले साल तक सभी छात्राएं स्कूल यूनिफार्म का पालन कर रही थीं। 2022 में पापुलर फ्रंट आफ इंडिया (पीएफआइ) ने इंटरनेट मीडिया पर अभियान चलाकर छात्राओं को हिजाब पहनने का संदेश देना शुरू किया।
कहा- हिजाब इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं, इस्लामिक देशों में भी हो रहा इसका विरोध
मेहता ने कहा कि हिजाब इस्लाम धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है। ईरान का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मुस्लिम देशों में भी महिलाएं इसके खिलाफ लड़ रही हैं। कर्नाटक के स्कूलों में हिजाब पहनने पर रोक के मामले में बुधवार को भी सुनवाई जारी रहेगी। न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ के समक्ष कर्नाटक सरकार (Karnataka government) की ओर से पेश सालिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि सरकारी आदेश स्कूलों में यूनिफार्म लागू करने के लिए है। यूनिफार्म का उद्देश्य होता है कि सब समान दिखें और कोई हीन न समझे। आदेश किसी धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि धर्म निरपेक्ष है। न तो भगवा शाल की इजाजत है और न ही हिजाब की। स्कूलों में सुचारु शैक्षणिक माहौल के लिए आदेश जारी किया गया। ड्रेस में कुछ भी ज्यादा या कम नहीं हो सकता।
राज्य सरकार का आदेश किसी धर्म के खिलाफ नहीं है
मेहता ने कहा कि छात्रों को ड्रेस अनुशासन का पालन करना चाहिए। इससे सिर्फ तभी छूट दी जा सकती है जबकि वो धर्म का अभिन्न हिस्सा हो। याचिकाकर्ताओं ने इसे धर्म का अभिन्न हिस्सा साबित करने के पक्ष में कोई साक्ष्य पेश नहीं किए हैं। इसके लिए कुछ मानक हैं जैसे कि उस प्रथा का चलन अनादिकाल यानी धर्म की शुरुआत से ही होना चाहिए। सभी उसका पालन करते हों।
मेहता ने कहा कि हिजाब धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है। मुस्लिम देशों में भी महिलाएं इसके खिलाफ लड़ रही हैं। मेहता ने कहा कि पवित्र कुरान में बहुत सी चीजें कही गईं हैं। हिजाब को आदर्श धार्मिक प्रथा तो माना जा सकता है लेकिन अनिवार्य नहीं, जैसे कि सिखों में कड़ा और पगड़ी धर्म का अभिन्न हिस्सा है। मेहता ने कहा कि यह मदरसा या वेदशाला नहीं है जहां उनके धर्म के मुताबिक ड्रेस लागू हो।
बुधवार को फिर होगी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की बेंच बुधवार को भी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी, जिसने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को बरकरार रखा था। उधर, शीर्ष कोर्ट में कुछ याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे (Senior advocate Dushyant Dave) ने मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि हिजाब से गरिमा बढ़ती है और जब वह इसे पहनती है तो एक महिला को बहुत सम्मानजनक बनाती है।
'समय के साथ बदल गई है गरिमा की परिभाषा'
एक हिंदू महिला जो अपना सिर ढकती है, यह बहुत सम्मानजनक होता है। जस्टिस हेमंत गुप्ता और सुधांशु धूलिया की पीठ ने दुष्यंत दवे से कहा कि गरिमा की परिभाषा समय के साथ बदल गई है और यह बदलती रहती है। दवे ने सही उत्तर दिया। दवे ने तर्क दिया कि स्कूल में हिजाब पहनने वाली लड़कियां किसी की शांति और सुरक्षा का उल्लंघन नहीं करती हैं और निश्चित रूप से शांति के लिए कोई खतरा नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था का केवल एक पहलू है, जिसे लेकर तर्क दिया जा सकता है।
पोशाक को लेकर कोई अमीर या गरीब नहीं देखता है
दुष्यंत दवे ने कहा कि लड़कियां हिजाब पहनना चाहती हैं, तो किसके संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है? अन्य छात्र'? स्कूल? उन्होंने सबरीमाला फैसले और हिजाब मामले में अंतर किया। पीठ ने जवाब दिया कि उस मामले में याचिकाकर्ताओं को मंदिर में प्रवेश करने का मौलिक अधिकार नहीं था। दुष्यंत दवे ने कहा कि अब यह स्थापित हो गया है कि हर कोई मंदिर में प्रवेश कर सकता है। बेंच ने दुष्यंत दवे से पूछा, कई स्कूलों में असमानता हो सकती है, इसलिए पोशाक है। इसे लेकर कोई अमीर या गरीब को नहीं देख सकता है।
दुष्यंत दवे ने कहा, समाज पर एक अनावश्यक बोझ है पोशाक
दुष्यंत दवे ने कहा कि मैं शिक्षण संस्थान में पोशाक के पक्ष में हूं। हर संस्थान को अपनी पहचान को पसंद करता है। पीठ ने कहा कि इसका बहुत सीमित सवाल है- क्या टोपी की अनुमति दी जा सकती है। दुष्यंत दवे ने कहा कि पोशाक समाज में एक अनावश्यक बोझ है और अधिकांश इसे बर्दाश्त नहीं कर सकत। उन्होंने बताया कि वह गोल्फ कोर्स में अपने कैडीज के साथ इसे देखते हैं।
कर्नाटक सरकार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का आरोप
दुष्यंत दवे ने दावा किया कि कर्नाटक सरकार के कई कृत्यों ने अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया है। कर्नाटक सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह कहते हुए हस्तक्षेप किया और कहा कि हम एक सार्वजनिक मंच में नहीं हैं। कृपया दलीलों पर टिके रहें। दुष्यंत दवे ने कहा कि ऐसा क्यों है कि अचानक 75 वर्षों के बाद राज्य सरकार ने हिजाब पर प्रतिबंध लगाने के बारे में सोचा? यह नीले रंग के एक बोल्ट की तरह आया है।
अल्पसंख्यकों को धर्म का पालने करने का अधिकार दिए हैं संविधान ने
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 25 बिल्कुल स्पष्ट है और संविधान सभा इस पर बहस कर चुकी है। वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने जोर देकर कहा कि नमून की जांच अनिवार्य अभ्यास नहीं है बल्कि धार्मिक अभ्यास है। उन्होंने उद्धृत किया कि इस प्रश्न का निर्णय लेने में कि यह धार्मिक प्रथा धर्म का एक अभिन्न अंग है या नहीं, जांच हमेशा यह होती है कि इसे धर्म का पालन करने वाले समुदाय द्वारा पालन किया जाता है या नहीं। दुष्यंत दवे ने इन बातों के साथ अपने तर्क समाप्त किए।
शीर्ष अदालत कर्नाटक उच्च न्यायालय के 15 मार्च के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसमें प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों में हिजाब पर प्रतिबंध को बरकरार रखा गया है।
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