पूर्वोत्तर को जोड़ने का माध्यम बने भारत के महान समाजवादी चिंतक और स्वतंत्रता सेनानी डा. राममनोहर लोहिया
डा. लोहिया ने उर्वशीयम नाम का इस्तेमाल मुख्य रूप से उत्तर-पूर्व के सीमावर्ती इलाकों के लिए किया जिनकी सीमा चीन भूटान और म्यांमार से लगती थी। दक्षिण मे ...और पढ़ें

अभिषेक रंजन सिंह। भारत के महान समाजवादी चिंतक, स्वतंत्रता सेनानी और दूरद्रष्टा डा. राममनोहर लोहिया की आज 55वीं पुण्यतिथि है। संयोगवश यह वर्ष डा. लोहिया के उर्वशीयम अभियान का 65वां वर्ष भी है। इस मौके पर हमें उर्वशीयम यानी पूर्वोत्तर के बारे में कुछ अनकहे प्रसंगों के बारे में जानना चाहिए। अंग्रेजों ने मौजूदा अरुणाचल प्रदेश और उससे सटे पूर्वोत्तर के इलाकों को नेफा (नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) नाम दिया था, जो आजादी के बाद भी बना रहा। भारत का हिस्सा होते हुए भी उन इलाकों में प्रवेश के लिए विशेष अनुमति या परमिट की आवश्यकता होती थी। आजाद भारत में भी यह व्यवस्था बनी रही। नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले अनथक योद्धा डा. राममनोहर लोहिया को अंग्रेजों के जमाने का यह गैर-बराबरी वाला कानून भला कैसे मंजूर होता। अंग्रेजों के दिए नाम नेफा में कहीं से भी भारतीय संस्कृति और सभ्यता की झलक नहीं दिखती थी, जिसकी वजह से उन्होंने इसका नामकरण किया उर्वशीयम। उर्वशीयम सौंदर्य की प्रतिमूर्ति रही अप्सरा उर्वशी से प्रेरित है। पूर्वोत्तर की प्राकृतिक खूबसूरती और मनोरम दृश्यों को ध्यान में रखकर ही उन्होंने इस इलाके को यह नाम दिया था।
डा. लोहिया ने वहां के नागरिकों के अधिकारों को लेकर केवल चिंता ही नहीं जताई, बल्कि वहां जाकर उन लोगों को अपने अधिकारों की खातिर लड़ने की प्रेरणा भी दी। इसके लिए उन्होंने बिना परमिट के वहां प्रवेश कर गिरफ्तारी दी। उनकी गिरफ्तारी पर संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं ने पूछा, “आजाद भारत में जनहित के मुद्दे पर डा. लोहिया की गिरफ्तारी के क्या मायने हैं?” इस पर नेहरू ने उत्तर दिया, “डा. राममनोहर लोहिया को परमिट लेकर उर्वशीयम जाना चाहिए था।”
आखिर पूर्वोत्तर के लोगों ने कौन सा गुनाह किया था कि उन्हें आजादी के दो दशक बाद भी बंधनों में रहना पड़ा। उर्वशीयम में नागरिक स्वतंत्रता के सवाल पर डा. लोहिया पहली बार 12 नवंबर, 1958 को बिना अनुमति के नेफा में दाखिल हुए। लोहित डिवीजन के तेजपुर, जयरामपुर, तिनसुकिया, नौगांव, शिलांग, लोहित, मार्गरीटा, बराक घाटी, डिब्रूगढ़ आदि जगहों पर बिना परमिट के गए और जनसभाओं को संबोधित किया। इस वजह से उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें नेफा की सीमा से ही बैरंग लौटा दिया गया। इसके एक साल बाद नवंबर 1959 में उन्होंने फिर से नेफा के इलाकों में बिना परमिट के प्रवेश किया। उन इलाकों में कई जनसभाओं को संबोधित कर उन्होंने पूर्वोत्तर के लोगों को नागरिक आजादी और सिविल नाफरमानी का पाठ पढ़ाया।
डा. लोहिया ने उर्वशीयम नाम का इस्तेमाल मुख्य रूप से उत्तर-पूर्व के सीमावर्ती इलाकों के लिए किया, जिनकी सीमा चीन, भूटान और म्यांमार (तब बर्मा) से लगती थी। दक्षिण में इसकी सीमा असम और नगालैंड से लगती थी। इसे ही पहले नेफा कहा जाता था। यह आज का अरुणाचल प्रदेश है। 1972 में इसे नए सिरे से केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया और 1987 में पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। 1972 में जब इसका नए सिरे से नामकरण किया जा रहा था तब यदि तत्कालीन सरकार चाहती तो डा. लोहिया को श्रद्धांजलि देते हुए इसका नाम उर्वशीयम रख सकती थी। मगर अरुणाचल प्रदेश नाम रखा। बेशक, अरुणाचल अच्छा नाम है, लेकिन उर्वशीयम नाम देने के पीछे डा. लोहिया की दूरगामी सोच थी। इससे अरुणाचल पर चीन का दावा पूरी तरह से निरस्त हो जाता, क्योंकि डा. लोहिया ही पहले राजनेता थे जिन्होंने जोरदार तरीके से यह बात सामने रखी कि उर्वशीयम पूरी तरह से भारत से जुड़ा हआ है। उर्वशी की कथा वहां की लोक-संस्कृति का हिस्सा है और कथित नेफा में भी यह कथा प्रचलित है कि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी वास्तव में उसी इलाके की मिश्मी जनजाति से थीं।
यह डा. लोहिया के संघर्षों का ही परिणाम था कि अरुणाचल को नेफा जैसे ब्रिटिश औपनिवेशिक शब्द से मुक्ति मिली। उन्होंने नागरिक आजादी के साथ-साथ उन लोगों और उन इलाकों के लिए लड़ाई लड़ी जिसे आज भी उपेक्षित समझा जाता है। उत्तर-पूर्व के राज्यों को आजादी के 75 वर्ष बाद भी उपेक्षा के भाव से देखा जाता है। उन इलाकों के प्रति आत्मीयता प्रकट करने वाले डा. लोहिया उस दौर के और आजाद भारत के पहले राजनेता थे। उर्वशीयम अभियान के 65वें वर्ष में सरकारों को चाहिए कि पूर्वोत्तर के सर्वांगीण विकास का मानचित्र डा. लोहिया के सपनों पर आधारित हो।
[अध्यक्ष, डा. राममनोहर लोहिया रिसर्च फाउंडेशन]

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