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    दिवाली का दिया आपके जीवन को कई तरह से करता है रौशन, जानिए क्या कहता है विज्ञान

    By Ashish PandeyEdited By:
    Updated: Fri, 05 Nov 2021 03:58 PM (IST)

    दिवाली में दियों को महत्व दिए जाने के पीछे विज्ञान और आध्यात्म दोनों है। आज हम सभी वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन आप घी या तेल का दिया जला कर घर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ा सकते हैं। ये कोई अंधविश्वास नहीं इसके पीछे विज्ञान है।

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    आप दिया जला कर घर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ा सकते हैं, ये कोई अंधविश्वास नहीं इसके पीछे विज्ञान है

    नई दिल्ली, अनुराग मिश्र/ विवेक तिवारी। दिवाली को रौशनी और दियों का त्योहार माना जाता है। पर इस त्योहार में दियों को इतना महत्व दिए जाने के साथ विज्ञान और आध्यात्म दोनों है। आज हम सभी वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं। लेकिन आप अपने घर पर घी या तेल का दिया जला कर आपके घर में ऑक्सीजन की मात्रा को बढ़ा सकते हैं। ये कोई अंधविश्वास नहीं इसके पीछे विज्ञान है।

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    नागपुर के एजुकेश्निस्ट और पिछले 25 सालों से बच्चों को विज्ञान की बारीकियों को समझाने और उन्हें विज्ञान के प्रति जागरूक करने का काम कर रहे पाणिनी तेलंग के मुताबिक घर के दरवाजे पर दिए जलाने से आपके घर में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ जाता है। और इसके पीछे सीधा सा विज्ञान है। जब हम घी या तेल का दिया जलाते हैं तो तेल या घी में मौजूद फैटी एसिड जलते हैं। इस प्रक्रिया में फैटी एसिड का एक मॉलीक्यूल जलने से 56 कार्बन के मॉलीक्यूल निकलते हैं और 52 पानी के मॉलीक्यूल निकलते हैं। वहीं एक फैटीएसिड के मॉलीक्यूल को जलाने के लिए हवा में मौजूद ऑक्सीजन के 79 मॉलीक्यूल खर्च होते हैं।

    विज्ञान साफ तौर पर बताता है कि गर्म हवा हल्की होती है वो ऊपर चली जाती है और ठंडी हवा नीचे नीचे आती है। ऐसे में दिये में चलने वाली आग के चलते हवा में मौजूद ऑक्सीजन दिए की ओर तेजी से आती है। इसके चलते दिये के आसपास ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है।

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    दिवाली पर घरों में दिए को सांकेतिक तौर पर घर के दरवाजे पर जलाए जाने की परंपरा है। लेकिन बहुत से लोग घर में बहुत सारे दिए जलाते हैं। ये ठीक नहीं है। बंद जगह में बहुत सारे दिए जलाने से ऑक्सीजन का खर्च भी बढ़ जाएगा।

    आध्यात्मिक तौर पंच तत्वों को प्रदर्शित करता है दिया

    दिया मिट्टी से बना होता है। ये पृथ्वी का प्रतीक है। उसमें जलने वाला तेल और बाती भी जमीन से ही मिलती है। वहीं पृथ्वी के चारों ओर अंतरिक्ष है। ऐसे में दिए के चारों ओर अंतरिक्ष की कल्पना की गई है। वहीं दिए में अग्नि भी है, उसे जलने के लिए वायु भी चाहिए और तेल के जलने की प्रक्रिया में पानी के मॉलीक्यूल भी बनते हैं। ऐसे में एक दिया एक तरह से उन पंच तत्वों का प्रतीक माना गया है जिनसे दुनिया बनी है।

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    दिया जलाने के हैं कई वैज्ञानिक कारण

    दिवाली मानसून के मौसम के बाद पड़ती है। मानसून के दौरान, हवा नम होती है और बैक्टीरिया से भर जाती है। दिये से निकलने वाली गर्मी हवा को साफ करने में मदद करती है।

    दिया जलाने से कोई ऐसा तत्व या केमिकल नहीं निकलता जिससे वातावरण को नुकसान पहुंचे।

    दिये की रोशनी बिजली पर निर्भर नहीं होती है। ऐसे में रोशनी करने के साथ ही किसी तरह के जीवाश्म इंधन का इस्तेमाल नहीं करते।

    तेल में मौजूद मैग्नीशियम हवा में मौजूद सल्फर और कार्बन ऑक्साइड के साथ प्रतिक्रिया करके सल्फेट और कार्बोनेट बनाता है। भारी तत्व जमीन पर गिरते हैं, जिससे हवा हल्की हो जाती है।

    प्रकाश में आने वाली गर्मी हवा में मौजूद बैक्टीरिया, वायरस आदि को नष्ट कर देती है।

    मोमबत्ती जलाते समय रखें ध्यान

    अगर आप मधुमक्खियों के छत्ते से निकलने वाले मोम से बनी मोमबत्ती जला रहे हैं तो उसे जलाने पर किसी तरह का प्रदूषण नहीं होता है। लेकिन आप पेट्रोलियम वैक्स से बनी मोमबत्ती जला रहे हैं तो उसे जलाने पर कई तरह के केमिकल निकलते हैं जो आपके पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। दक्षिण कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा 2009 के एक अध्ययन में दावा किया गया कि पेट्रोलियम वैक्स से बनी मोमबत्तियों में पैराफिन मोम टोल्यून जैसे हानिकारक पदार्थ निकलते हैं।

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