नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। रैगिंग पर सख्ती के बाद भी इससे जुड़ी घटनाएं फिलहाल थमती नहीं दिख रही है। ऐसे में यूजीसी ने इस मामले में अब राज्य सरकारों को भी जवाबदेह बनाने की योजना बनाई है। पहली बार इसे लेकर सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और उच्च शिक्षा सचिवों को चिट्ठी लिखकर मदद मांगी है। जिसमें रैगिंग मुक्त राज्य बनाने सहित इन नियमों को तोड़ने वालों के खिलाफ सख्ती से पेश आने को कहा है। रैगिंग को लेकर यूजीसी की मुहिम अब तक विश्वविद्यालय और दूसरे उच्च शिक्षण संस्थानों तक ही सीमित थी।

खासबात यह है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( यूजीसी) ने राज्यों को यूं ही चिट्ठी लिखकर मदद नहीं मांगी है, बल्कि यह मदद तब मांगी है, जब उसकी कोशिशों के बाद भी रैगिंग की घटनाओं में कोई खास कमी नहीं दिख रही है। यूजीसी के आंकड़ों के मुताबिक 2019 में भी अब तक रैगिंग के करीब 950 मामले दर्ज हो चुके है, जबकि 2018 में करीब 1010 मामले दर्ज हुए थे। माना जा रहा है कि रैगिंग के मामले जिस रफ्तार से सामने आ रहे है, उसे देखते हुए 2019 में भी पिछले साल के आंकड़े पार होने की उम्मीद है।

यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि 2016 से रैगिंग के मामले साल दर साल बढ़ ही रहे है। 2016 में जहां रैगिंग के कुल मामले 515 सामने आए थे, वही 2017 में यह बढ़कर 901 हो गए थे। जो एक चौंकाने वाली स्थिति थी। यह घटनाएं तब सामने आ रही है, जब रैगिंग को लेकर सख्त कानून मौजूद है। जिसमें दोषी छात्रों को जेल और जुर्माने दोनों का प्रावधान है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक अब तक रैगिंग की घटनाओं को लेकर सिर्फ उच्च शिक्षण संस्थानों पर ही जवाबदेही आती थी, ऐसे में अब राज्य सरकार भी इनमें शामिल होंगी। यह इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि कुछ राज्यों में यह बुराई ज्यादा व्यापक है। इनमें उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। जहां 2018 में सबसे ज्यादा 180 मामले रिपोर्ट हुए थे। वहीं इस मामले में दूसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल है, जहां से रैगिंग की 119 शिकायतें थी। इनमें तीसरे नंबर पर मध्य प्रदेश था, जहां से 104 शिकायतें आयी थी।

Posted By: Manish Pandey

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