छत्तीसगढ़ में आज भी रहते हैं असुरों के वंशज, ऐसी है इनकी धार्मिक आस्था
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में रहने वाला एक समुदाय खुद को असुरों का वंशज मानता है। इनकी धार्मिक मान्यता सभी से अलग है।
जशपुरनगर, जेएनएन। हमारे पौणाणिक ग्रंथों में सुरों और असुरों की कथा पढ़ने को मिलती है। ऐसा माना जाता है कि एक युग में सुरों और असुरों के बीच संग्राम की स्थिति बनी रहती थी। देवी-देवताओं के हाथों इनके संहार की कथाएं भी सुनने को मिलती हैं। पुराणों की कहानियों के यह असुर एक जाति के रूप में पहचान रखते थे और आज भी यह जाति अस्तित्व में है। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में रहने वाला एक समुदाय खुद को असुरों का वंशज मानता है। इनकी धार्मिक मान्यता सभी से अलग है। यह अपनी संस्कृति को अपने लोक गीतों और रीति-रिवाजों के जरिए आज भी संजोकर रखे हुए हैं। मूर्ति पूजा की जगह प्रकृति पूजा पर भरोसा रखने वाले इन असुरों के बीच आज खुद की संस्कृति और सभ्यता को बचाए रखने की चुनौती भी है।
असुर जाति से जुड़े लोगों को भारतीय संविधान में अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता दी गई है। यह जाति विशेष रूप से छत्तीसगढ़ में जशपुर, सरगुजा और झारखण्ड राज्य के छोटा नागपुर के पठारी क्षेत्र में निवास करती है। इस जाति की अपनी विशिष्ठ सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराएं हैं। इनकी अपनी विशेष भाषा भी इनकी अलग पहचान बनाती है। आदिकाल से यह जनजाति अपने समाज में जिस भाषा का प्रयोग करती आ रही है उसे असुर भाषा के नाम से ही जाना जाता है। इस भाषा की लिपि नहीं है, लेकिन शब्दावली और लोकगीत के लिहाज से यह बेहद समृद्ध है।
जशपुर जिले के मनोरा तहसील के गजमा, लुखी, कांटाबेल, कुलाडोर, विरला, दौनापाठ में इस जनजाति के लोग निवास करते हैं। असुर जनजाति की बोली के संबंध में जिले में असुर समाज की सबसे वृद्ध महिला मडवारी बाई 95 वर्ष ने बताया कि इनकी भाषा में कुत्ते को सेता और बालिका को कुड़ीचेंगा कहा जाता है। हाड़ीकोना निवासी चीरमईत बाई ने बताया कि लोक गीतों के लिहाज से भी असुर जाति की बोली बेहद समृद्व है, लेकिन युवा पीढ़ी इस बोली को बचाए रखने में रूचि नहीं ले रही है। इस जनजाति के युवा अपनी बोली से पूरी तरह से अंजान हैं। समाज के दो-चार बुजुर्ग ही इसे जानते हैं। जागरण के विशेष आग्रह पर चीरमईत बाई ने असुर भाषा का एक लोकगीत गा कर सुनाया। इस गीत को सुनकर मौके पर मौजूद असुर समाज के युवा भी आश्चर्य चकित रह गए। बहरहाल, सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक महिषासुर के वंशज माने जाने वाले असुरों की संख्या एक लाख से भी कम बची है। अस्तित्व के खतरे से जूझ रही इस जनजाति की संस्कृति और भाषा दोनों ही विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है।
नहीं मनाते हैं दशहरा और नवरात्रि
असुर जनजाति दशहरा और नवरात्रि का त्योहार नहीं मनाते हैं। असुर समाज की महिला फुलेश्वरी बाई ने बताया कि उनके पूर्वजों ने उन्हें इस बात की जानकारी दी थी कि असुरराज महिषासुर उनके समाज के राजा थे। मां दुर्गा ने उनका वध किया था। इसलिए वे ना तो नवरात्र मनाते हैं और ना ही विजयदशमी दशहरा का उत्सव। होली और दीपावली का त्यौहार यह समाज धूमधाम से मनाता है। इस अनूठे समाज में देवी-देवताओं की मूर्ति की जगह प्रकृति की पूजा का प्रचलन अधिक है। समाज में बैगा या पुरोहित की परम्परा भी नहीं है। यहां सभी अपने-अपने तरीके से पूजा करने के लिए स्वतंत्र होते हैं।
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