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    जज के घर पर नकदी मिलने के मामले में FIR की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- नहीं होगी तत्काल सुनवाई

    Updated: Wed, 26 Mar 2025 11:29 PM (IST)

    Justice Yashwant Varma हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले में एफआइआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग पर तत्काल सुनवाई करने का अनुरोध को सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया। वकील मैथ्यू जे नेदुपरा सहित चार लोगों ने शीर्ष कोर्ट में याचिका दाखिल की है।

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    Justice Yashwant Varma: कैश कांड को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से इनकार किया।(फोटो सोर्स: जागरण)

    जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले में एफआइआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग पर तत्काल सुनवाई करने का अनुरोध बुधवार को ठुकरा दिया।

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    वकील मैथ्यू जे नेदुपरा सहित चार लोगों ने शीर्ष कोर्ट में याचिका दाखिल कर दिल्ली हाई कोर्ट के जज वर्मा के आवास से नकदी मिलने के मामले में दिल्ली पुलिस को एफआइआर दर्ज कर जांच करने का आदेश देने की मांग की है।

    नेदुपरा ने चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ के समक्ष याचिका का उल्लेख करते हुए मामले पर तत्काल सुनवाई की मांग की। उन्होंने कहा कि यह व्यापक जनहित से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है जिस पर तत्काल सुनवाई की जरूरत है।

    याचिकाकर्ता वकील ने जस्टिस वर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई त्वरित कार्यवाही की सराहना भी की। लेकिन सीजेआइ खन्ना ने नेदुपरा से सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी न करने को कहा। मालूम हो कि सीजेआइ ने आजकल मौखिक मेंशनिंग पर रोक लगा रखी है।

    मामला तय प्रक्रिया के मुताबिक सुनवाई पर आएगा: सीजेआई

    नेदुपरा के बाद एक अन्य याचिकाकर्ता मनीषा मेहता ने भी कोर्ट से मामले पर तत्काल सुनवाई का अनुरोध करते हुए कहा कि अगर यही मामला किसी सामान्य नागरिक के साथ होता तो विभिन्न एजेंसियां जैसे सीबीआइ और ईडी उस व्यक्ति के पीछे लग जातीं। लेकिन सीजेआइ दलीलों से प्रभावित नहीं हुए और उन्होंने कहा कि मामला तय प्रक्रिया के मुताबिक सुनवाई पर आएगा।

    मालूम हो कि मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक सीजेआइ की पूर्व अनुमति पर ही हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ एफआइआर दर्ज हो सकती है। अन्यथा हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ पुलिस या कोई भी जांच एजेंसी सीधे एफआइआर दर्ज नहीं कर सकतीं। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट ने 1991 में के. वीरास्वामी के मामले में दिए फैसले में तय की थी।

    यह संज्ञेय अपराध है: याचिकाकर्ता

    नेदुपरा और तीन अन्य की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि इस मामले में भारतीय न्याय संहिता के तहत विभिन्न धाराओं में संज्ञेय अपराध बनता है और पुलिस एफआइआर दर्ज करने के लिए बाध्य है। याचिका में के. वीरास्वामी के मामले में दी गई व्यवस्था को चुनौती दी गई है।

    याचिका में मांग है कि सीजेआइ की पूर्व अनुमति के बगैर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ एफआइआर दर्ज न करने का के. वीरास्वामी के मामले में दिया गया आदेश भी निरस्त किया जाए। मालूम हो कि 14 मार्च को दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने की सूचना पुलिस को मिली और जब अग्निनशमन दस्ता आग बुझाने पहुंचा तो कथित तौर पर वहां भारी मात्रा में जले हुए नोट मिले थे।

    इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की रिपोर्ट और जस्टिस यशवंत वर्मा का जवाब देखने के बाद सीजेआइ संजीव खन्ना ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की तीन सदस्यीय कमेटी बनाई है। इसके अलावा यह पहला मौका है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने किसी न्यायाधीश पर लगे आरोपों से संबंधित सारे दस्तावेज, फोटो और रिपोर्ट वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दी हैं।

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