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    इंदौर दूषित जल कांड: शिकायतें दबती रहीं और पानी की लाइन में मल-मूत्र मिलता रहा, 15 मौतों के बाद जागी सरकार

    Updated: Sat, 03 Jan 2026 06:57 AM (IST)

    देश के स्वच्छतम शहर इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से फैला संकट किसी एक दिन की गलती नहीं, बल्कि लगातार अनदेखी, गलत निर्माण और निगरानी के ...और पढ़ें

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    शिकायतें दबती रहीं और पानी की लाइन में मल-मूत्र मिलता रहा (फोटो- जेएनएन)

    जेएनएन, इंदौर। देश के स्वच्छतम शहर इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से फैला संकट किसी एक दिन की गलती नहीं, बल्कि लगातार अनदेखी, गलत निर्माण और निगरानी के अभाव का नतीजा है। छह दिन में 15 लोगों की मौत हो गई और शहर की जल व्यवस्था की भयावह तस्वीर सामने आ गई।

    दरअसल, स्थानीय निवासी कई हफ्तों से गंदे पानी की आपूर्ति की शिकायत कर रहे थे, लेकिन प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया। 29 दिसंबर, 2025 को स्थिति तब विस्फोटक हो गई, जब 100 से अधिक लोग उल्टी-दस्त से पीड़ित हो गए।

    अस्पतालों में मरीजों की भीड़ लगने लगी। अगले दिन हालात और बिगड़ गए। आठ मरीजों की मौत की बात सामने आई और बीमार लोगों की संख्या 1100 से अधिक पहुंच गई। नगर निगम ने आनन-फानन में पानी के सैंपल जांच के लिए भेजे।

    प्रशासनिक कार्रवाई के तौर पर दो अधिकारियों को निलंबित किया गया और एक की सेवा समाप्त कर दी गई। जांच में पता चला कि नर्मदा जल लाइन के ऊपर और आसपास ड्रेनेज चैंबर बने हुए थे। इससे भी गंभीर तथ्य यह था कि एक पुलिस चौकी का टायलेट भी इसी पाइपलाइन के ऊपर बना दिया गया, जिससे सीवेज सीधे पेयजल लाइन में रिसने की आशंका पुख्ता हो गई।

    सिस्टम कठघरे मेंमामले की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शासन से रिपोर्ट तलब कर ली। मुख्यमंत्री मोहन यादव इंदौर पहुंचे, अस्पतालों का दौरा किया और आपात बैठक ली। मृतकों के स्वजन के लिए दो-दो लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा की गई।

    इसी बीच नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का अपशब्द कहते हुए एक बयान सामने आया, जिसका वीडियो इंटरनेट मीडिया पर बहुप्रसारित हुआ। हालांकि, उन्होंने खेद प्रकट किया, लेकिन सरकार की किरकिरी हो गई।

    जांच ने उजागर किया भयावह सचनए साल के पहले दिन आई पानी की जांच रिपोर्ट ने पूरे मामले की भयावहता साफ कर दी। इसमें पुष्टि हुई कि लोग मल-मूत्र मिश्रित पानी पीने को मजबूर थे।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया। मुख्यमंत्री ने नगर निगम कमिश्नर और एडिशनल कमिश्नर को नोटिस जारी किया।

    हाई कोर्ट में पेश स्टेटस रिपोर्ट में सरकार ने आधिकारिक तौर पर जितनी मौत की बात स्वीकारी, आंकड़ा उससे कहीं ज्यादा था। अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है। 2800 से ज्यादा लोग बीमार हुए हैं। अभी 201 लोगों का विभिन्न अस्पतालों में इलाज जारी है।