एस.के. सिंह/अनुराग मिश्र। हेल्थकेयर क्षेत्र में भारत के नाम कई उपलब्धियां हैं। दुनिया की लगभग 60% वैक्सीन भारत में बनती हैं। ग्लोबल हेल्थ प्रोग्राम में वैक्सीन के लिए यूनिसेफ काफी हद तक भारत पर निर्भर है। देश में रिकॉर्ड 220 करोड़ से ज्यादा कोविड-19 वैक्सीन लगाई जा चुकी हैं। भारत जेनरिक दवाओं का भी सबसे बड़ा निर्यातक है। लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र में उपलब्धियों की फेहरिस्त बहुत लंबी नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार भारत में एक हजार लोगों पर अस्पतालों में सिर्फ 0.5 बेड उपलब्ध हैं। यहां 143 करोड़ लोगों के लिए सिर्फ 1.25 लाख आईसीयू बेड हैं। डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या भी वैश्विक मानकों से बहुत कम है। इस लिहाज से अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है।

जागरण प्राइम ने इस बारे में कई विशेषज्ञों से बात की। उन्होंने वर्ष 2023-24 के बजट में हेल्थकेयर पर खर्च बढ़ाने, नए स्वास्थ्य संस्थानों को कर्ज पर ब्याज और टैक्स में छूट देने, ज्यादा लोगों को आयुष्मान भारत की कवरेज देने, मेडिकल डिवाइस के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव (PLI) और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च बढ़ाने जैसे सुझाव दिए। हेल्थकेयर सर्विसेज पर 18% जीएसटी लगता है। इसे कम कर स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता किया जा सकता है।

हेल्थ इंडेक्स में 66वां स्थान

2021 के ग्लोबल हेल्थ सिक्युरिटी इंडेक्स में भारत को 195 देशों में 66वीं रैंकिंग मिली थी। पिछले साल सितंबर में जारी नेशनल हेल्थ एकाउंट्स के आंकड़ों के अनुसार 2018-19 में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च जीडीपी का 1.3% था। इससे पहले 2004-05 से 2017-18 तक यह लगातार बढ़ रहा था, 15 साल बाद इसमें गिरावट आई थी। हालांकि, आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 2020-21 में हेल्थकेयर पर सार्वजनिक खर्च जीडीपी का 2.1% हो गया। अपोलो हॉस्पिटल्स के वाइस प्रेसिडेंट डॉ. करण ठाकुर जागरण प्राइम से कहते हैं, “जीडीपी की तुलना में हेल्थकेयर पर खर्च अगले पांच वर्षों में जीडीपी के 5% तक ले जाने का रोडमैप होना चाहिए।”

सरकारी और निजी, दोनों मिलाकर स्वास्थ्य पर कुल खर्च भी इन 15 वर्षों में 4.2% से घटकर जीडीपी का 3.2% रह गया। हालांकि इस दौरान निजी खर्च का हिस्सा कम हुआ और सरकारी खर्च का हिस्सा बढ़ा है। 2004-05 में कुल खर्च का 70% लोगों ने अपनी जेब से दिया, जबकि सरकारी खर्च का हिस्सा सिर्फ 22.5% था। 2018-19 में निजी खर्च 48% और सरकारी खर्च 40.6% हो गया।

एएफ डेवलपमेंट केयर के डायरेक्टर सची सत्पथी के अनुसार अनेक मामलों में लोग उधार लेकर खर्च करते हैं। वे कहते हैं, “एनएसएस सर्वे 2018 के अनुसार ग्रामीण इलाकों में 13.4% और शहरों में 8.5% मामलों में अस्पताल का खर्च लोगों ने उधार लेकर चुकाया। गांव-शहर दोनों क्षेत्रों में तीन से चार प्रतिशत लोगों को मित्रों और रिश्तेदारों से मदद की जरूरत पड़ी। यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के लिए सरकार को नए उपाय करने चाहिए, ताकि जेब से होने वाला खर्च कम हो सके।”

यह भी पढ़ेंः आम चुनाव से पहले अंतिम पूर्ण बजट में मिडिल क्लास को टैक्स राहत की उम्मीद

अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक एक्सेस हेल्थ इंटरनेशनल के दक्षिण एशिया के रीजनल डायरेक्टर डॉ. कृष्ण रेड्डी नल्लामल्ला कहते हैं, “सवाल अधिक बजट आवंटन का नहीं, सही तरीके से आवंटन का है ताकि उस राशि का बेहतर इस्तेमाल हो सके। अनेक जगहों पर प्रबंधन के पास योजनाएं बनाने और उन पर अमल करने का अनुभव नहीं होता। सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में इसे दूर करने के उपाय होने चाहिए।” डॉ. कृष्ण रेड्डी के अनुसार ऐसे कदम उठाए जाने चाहिए जिनसे गरीबों को स्वास्थ्य पर कम खर्च करना पड़े।

निवेश बढ़ाने की आवश्यकता

भारत में हेल्थकेयर सेवाएं कमजोर हैं। इसे बेहतर बनाने के लिए सरकारी और निजी, दोनों निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है। डॉ. करण ठाकुर कहते हैं, “सबसे पिछड़े जिलों में फाइनेंसिंग, क्षमता निर्माण और योजनाओं को लागू करने के लिए विशेष कार्यक्रम होने चाहिए। नए हेल्थकेयर संस्थानों को कर्ज पर ब्याज और टैक्स में छूट मिलनी चाहिए।”

प्रयाग हॉस्पिटल्स ग्रुप की सीईओ प्रीतिका सिंह, मैनपावर की कमी को बड़ी चिंता का विषय मानती हैं। वे कहती हैं, “दूरदराज के इलाकों में अस्पताल तो खुल जाते हैं, लेकिन उनमें पर्याप्त स्टाफ नहीं होते। सरकार को पूरे देश के अस्पतालों में पर्याप्त स्टाफ सुनिश्चित करना चाहिए। मैनपावर की कमी दूर करने के लिए निजी अस्पतालों को पैरामेडिक कोर्स चलाने की अनुमति दी जा सकती है। हेल्थकेयर प्रोफेशनल प्रशिक्षित होने चाहिए ताकि वे डिजिटाइजेशन के दौर में नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर सकें।”

ग्रामीण इलाकों में सुधार की जरूरत

खास तौर से ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं अच्छी नहीं हैं। शारदा अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. ए.के. गडपायले कहते हैं, “80% हेल्थकेयर सेवाएं निजी क्षेत्र उपलब्ध कराता है और वह गावों में कम जाता है। इस अंतर को पाटने के लिए गांवों में आपात सेवा और बीमा की पहुंच बढ़ाना जरूरी है। स्वास्थ्य शिक्षा भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। इन्फ्रास्ट्रक्चर और ट्रांसपोर्टेशन की कमी इसमें बड़ी बाधा है।” डॉ. गडपायले के अनुसार सरकारी निजी साझीदारी, जीडीपी की तुलना में स्वास्थ्य खर्च और डॉक्टर, नर्स तथा पैरामेडिक की पढ़ाई की सुविधाएं बढ़ाकर इसमें सुधार किया जा सकता है। ब्रॉडबैंड की पहुंच बढ़ाकर ग्रामीण इलाकों में टेलीहेल्थ सेवाएं सुधारी जा सकती हैं।

डॉ. गडपायले प्रिवेंटिव केयर को भी जरूरी मानते हैं। अभी प्रीवेंटिव केयर को ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाती, जबकि इससे गंभीर होने से पहले ही बीमारी का पता चल सकता है और कम खर्च में इलाज हो सकता है। इसलिए ग्रामीण इलाकों में बेहतर टेस्टिंग फैसिलिटी बहुत जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार प्रिवेंटिव हेल्थ चेकअप के लिए इनकम टैक्स में डिडक्शन की सीमा 5000 से बढ़ाकर 15000 रुपये की जानी चाहिए। अपोलो हॉस्पिटल्स के डॉ. ठाकुर के मुताबिक स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम और चेकअप के लिए इनकम टैक्स डिडक्शन की सीमा बढ़नी चाहिए।

आयुष्मान योजना की कवरेज बढ़े

नीति आयोग ने 2021 में ‘हेल्थ इंश्योरेंस ऑफ इंडियाज मिसिंग मिडिल’ नाम से रिपोर्ट जारी की थी। उसमें कहा गया था कि करीब 40 करोड़ लोगों के पास किसी भी तरह स्वास्थ्य सुरक्षा नहीं है। इसलिए डॉ. ठाकुर कहते हैं, “अभी जो लोग आयुष्मान भारत की कवरेज से बाहर हैं, उन्हें इसमें शामिल किया जाना चाहिए। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए तय फंडिंग होनी चाहिए।” उनका यह भी कहना है कि ज्यादा वैक्सीन को शामिल करने के लिए इंद्रधनुष वैक्सिनेशन प्रोग्राम के लिए आवंटन बढ़ाया जाना चाहिए।

शारदा अस्पताल के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. श्रेय कुमार श्रीवास्तव का मानना है कि छोटे शहरों में अच्छी सेवाएं देने के लिए हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स को बेहतर सुविधाएं दी जानी चाहिए। सरकारी योजनाओं की जानकारी देने तथा लोगों को शिक्षित करने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ाया जा सकता है। सरकारी अस्पतालों को बेहतर बनाकर छोटे शहरों में स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत की जा सकती हैं।

हेल्थकेयर सेवाओं पर 18% जीएसटी लगता है। डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार यह बहुत ज्यादा है, इसे कम करने से स्वास्थ्य सेवाएं सस्ती होंगी। वे स्वास्थ्य बीमा को भी सस्ता बनाने की बात कहते हैं, “स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी को अफॉर्डेबल बनाना तथा लोगों को उसके बारे में जागरूक करना जरूरी है। स्कूल स्तर पर ही इसके बारे में जानकारी दी जाए तो ज्यादा लोग स्वास्थ्य बीमा कराएंगे।”

प्रीतिका आयुष्मान भारत स्कीम में तय दरों को कम मानती हैं। उनका कहना है कि इन दरों पर निजी अस्पतालों को नुकसान होता है। इन दरों की समीक्षा की जानी चाहिए। वे देश में मेंटल हेल्थ के और अस्पताल खोलने की भी बात कहती हैं, “मेंटल हेल्थ के बारे में लोग अब भी बात करने से झिझकते हैं। उन्हें पता होना चाहिए कि मेंटल अस्पताल और मेंटल हेल्थ संस्थान में फर्क होता है।”

रिसर्च एवं डेवलपमेंट पर खर्च बहुत कम

हेल्थकेयर में रिसर्च एवं डेवलपमेंट का बड़ा महत्व है, लेकिन इस पर बहुत कम खर्च होता है। सची सत्पथी कहते हैं, 2022-23 के बजट में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए 86,201 करोड़ रुपये का आवंटन पिछले साल के संशोधित अनुमान से सिर्फ 0.2% ज्यादा है। प्रधानमंत्री के 'जय अनुसंधान' नारे के बावजूद स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग को सिर्फ 3,201 करोड़ रुपये (4%) मिले। कुल स्वास्थ्य बजट का 15-20% इस मद में होना चाहिए। डॉ. ठाकुर भी कहते हैं, “नई वैक्सीन और दवाएं तैयार करने के लिए रिसर्च और डेवलपमेंट पर खर्च बढ़ना चाहिए।” घरेलू फार्मा इंडस्ट्री अभी करीब 50 अरब डॉलर की है। इसके 2030 तक 130 अरब डॉलर और 2047 तक 450 अरब डॉलर का हो जाने का अनुमान है।

ये भी पढ़ेंः आम बजट: घरेलू मांग बढ़ाने के साथ निर्यात बढ़ाने के उपाय तलाशना भी जरूरी

मेडिकल डिवाइस में चीन पर निर्भरता खत्म करनी होगी

एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (AiMeD) के फोरम कोऑर्डिनेटर राजीव नाथ ने बताया कि मेडिकल डिवाइस के मामले में हम 80-85% आयात पर निर्भर हैं। वर्ष 2021-22 में भारत ने 63,200 करोड़ रुपये के मेडिकल डिवाइस का आयात किया, जो 2020-21 के 44,708 करोड़ के मुकाबले 41% अधिक है। सबसे ज्यादा 13,538 करोड़ का आयात चीन से हुआ जो पिछले साल से 48% अधिक था। जर्मनी, सिंगापुर और नीदरलैंड से जितना आयात हुआ, उतना अकेले चीन से खरीदा गया। अमेरिका से आयात भी 48% बढ़कर 10,245 करोड़ रुपये हो गया।

नाथ कहते हैं, “घरेलू उद्योग चीन से सस्ते आयात का मुकाबला नहीं कर सकता, इसलिए स्थानीय कंपनियां बंद हो रही हैं। कुछ डिवाइस पर आयात शुल्क 0% होने के कारण चीन अपना सामान यहां डंप कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'आत्मनिर्भर भारत' घोषणा के दो साल बाद भी चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़ रहा है।” नाथ के अनुसार स्वास्थ्य पर संसदीय समिति की 70% सिफारिशें भी सरकार लागू करे तो स्थिति इसके विपरीत होगी। हम मेडिकल डिवाइस के क्षेत्र में दुनिया के 5 बड़े निर्माताओं में शामिल होना चाहते हैं।

नाथ का कहना है कि मोबाइल फोन की तरह मेडिकल डिवाइस की मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने के लिए सरकार को बेसिक कस्टम ड्यूटी कम से कम 10-15% करनी चाहिए, जो अभी 0-7.5% है। इन पर डब्लूटीओ का बाउंड रेट (अधिकतम) 40% है। सही नीति अपनाई जाए तो कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स की तरह मेडिकल डिवाइस के क्षेत्र में भी आयात पर निर्भरता 30% से कम हो सकती है जो अभी 80% से अधिक है।

उन्होंने कहा, आयात शुल्क घटाने का मकसद था कि उपभोक्ता को कम दाम पर डिवाइस मिले, लेकिन यह मकसद पूरा नहीं हो रहा क्योंकि आयातित कीमत का 10 से 20 गुना दाम लिया जा रहा है। वे जीएसटी में एकरूपता लाने की बात भी कहते हैं, “कुछ डिवाइस लक्जरी श्रेणी में नहीं आते, फिर भी उन पर 18% जीएसटी लगता है। सभी डिवाइस पर एक समान 12% जीएसटी लगना चाहिए।”

भारत का मेडिकल टूरिज्म मार्केट 2020 में 2.89 अरब डॉलर का था। इसके 2026 में 13.42 अरब डॉलर का हो जाने का अनुमान है। शारदा अस्पताल के डॉ. श्रीवास्तव, कहते हैं, मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जाना चाहिए जो विदेशी मरीजों की उम्मीदों के मुताबिक हो।

भारत की हेल्थकेयर इंडस्ट्री बड़ी संख्या में रोजगार उपलब्ध कराने की भी क्षमता रखती है। इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन के अनुसार 2021 में भारत की हेल्थकेयर इंडस्ट्री में 47 लाख लोग काम कर रहे थे। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन सुझावों पर अमल किया गया तो इस इंडस्ट्री में काम करने वालों की संख्या कई गुना बढ़ सकती है।

Union Budget 2023- Metal Sector का देश के इंफ्रास्ट्रक्चर में योगदान व बजट से उम्मीद

blinkLIVE