देश में तेजी से बढ़ रही नौकरियां, लेकिन महंगाई के अनुसार नहीं बढ़ रहा वेतन; नीति आयोग बताई कहां आ रही परेशानी
भारत में पिछले सात सालों में नौकरियों में इजाफा देखने को मिला है लेकिन महंगाई के अनुरूप कर्मचारियों का वेतन नहीं बढ़ रहा है। पीएलएफएस के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले सात वर्षों में श्रमिक-जनसंख्या अनुपात स्पष्ट रूप से बढ़ रहा है। वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार आकस्मिक श्रमिकों के वास्तविक वेतन में वृद्धि हुई है जिससे उनके जीव स्तर में सुधार हुआ है।
पीटीआई, नई दिल्ली। नीति आयोग के सदस्य अरविंद विरमानी ने कहा है कि भारत में रोजगार तो बढ़ रहा है, लेकिन पिछले सात सालों में नियमित नौकरियों के लिए वास्तविक वेतन में महंगाई के साथ तालमेल नहीं रहा है।
उन्होंने कहा कि वैश्विक जनसंख्या के लिहाज से भारत के पास अवसर है और इसका लाभ उठाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इसके लिए शिक्षण और प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करना महत्वपूर्ण है।
जानिए आंकड़ों का गणित
- दरअसल, एक साक्षात्कार में विरमानी ने कहा कि आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले सात वर्षों में श्रमिक-जनसंख्या अनुपात स्पष्ट रूप से बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि जनसंख्या वृद्धि की तुलना में नौकरियों की संख्या में अधिक वृद्धि हो रही है।
- पीएलएफएस की वार्षिक रिपोर्ट 2023-24 (जुलाई-जून) के अनुसार, सभी आयु वर्ग के व्यक्तियों के मामले में श्रमिक-जनसंख्या अनुपात 2017-18 में 34.7 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 43.7 प्रतिशत हो गया।
- पीएलएफएस में वेतन के आंकड़ों के अनुसार, सात वर्षों के दौरान आकस्मिक श्रमिकों के वास्तविक वेतन में वृद्धि हुई है और इस अवधि के दौरान उनकी स्थिति में सुधार हुआ है। लेकिन बड़ा मुद्दा नियमित वेतन वाली नौकरियों का है। इस श्रेणी में वास्तविक मजदूरी सात वर्षों में महंगाई के अनुरूप नहीं बढ़ी है।
कुशल नौकरियां देने में कमी
उन्होंने कहा कि जहां तक मेरा आकलन है, महंगाई के हिसाब से वेतन में वृद्धि न होने का मुख्य कारण कौशल की कमी है। हम कुशल नौकरियां नहीं दे रहे हैं। मैंने कई देशों के आंकड़े देखे हैं। उसके आधार पर मैं कहूंगा कि हमें कौशल पर काम करने की जरूरत है। यह बहुत कमजोर स्थिति में है। केंद्र सरकार कदम उठा रही है। राज्यों को भी इस दिशा में काम करने की जरूरत है, जिला स्तर पर काम करने की जरूरत है क्योंकि वहां नौकरियां पैदा होंगी।
राज्यों का निवेश अनुकूलता सूचकांक जल्द
अरविंद विरमानी ने कहा है कि राज्यों के निवेश अनुकूलता सूचकांक के दूसरे चरण पर काम जारी है और इसके एक-दो महीने में जारी होने की उम्मीद है। यह सूचकांक राज्यों को नियमों की समीक्षा के लिए प्रेरित करेगा, ताकि यह पता लगाया जा सके कि निवेश को क्या बाधित कर रहा है। इस पहल का उद्देश्य निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना है।
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