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'बिक्री का समझौता स्वामित्व हस्तांतरित नहीं करता...', सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के एक आदेश पर सुनाया फैसला

Supreme Court 1990 में दो पक्षों ने बिक्री का एक समझौता किया था और पूरी धनराशि का भुगतान कर दिया गया था व अपीलकर्ता-प्रस्तावित खरीदार को कब्जा भी दे दिया गया था। इस समझौते में यह भी कहा गया था कि कर्नाटक प्रिवेंशन आफ फ्रेग्मेंटेशन एंड कोंसोलिडेशन आफ होल्डिंग्स एक्ट के तहत प्रतिबंधों के हटने के बाद सेल डीड को निष्पादित किया जाएगा।

By AgencyEdited By: Babli KumariWed, 15 Nov 2023 08:36 PM (IST)
'बिक्री का समझौता स्वामित्व हस्तांतरित नहीं करता...',  सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के एक आदेश पर सुनाया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को किया खारिज (फाइल फोटो)

आइएएनएस, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बिक्री का समझौता स्वामित्व का अधिकार हस्तांतरित नहीं करता या प्रस्तावित खरीदार के पक्ष में कोई स्वामित्व प्रदान नहीं करता। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने कर्नाटक हाई कोर्ट के एक आदेश के विरुद्ध दायर विशेष अनुमति याचिका पर फैसला करते हुए यह टिप्पणी की।

1990 में दो पक्षों ने बिक्री का एक समझौता किया था और पूरी धनराशि का भुगतान कर दिया गया था व अपीलकर्ता-प्रस्तावित खरीदार को कब्जा भी दे दिया गया था। इस समझौते में यह भी कहा गया था कि कर्नाटक प्रिवेंशन आफ फ्रेग्मेंटेशन एंड कोंसोलिडेशन आफ होल्डिंग्स एक्ट के तहत प्रतिबंधों के हटने के बाद सेल डीड को निष्पादित किया जाएगा।

पहली अपीलीय अदालत ने दे दी डिक्री 

1991 में फ्रेग्मेंटेशन एक्ट निरस्त कर दिया गया, लेकिन प्रतिवादियों ने सेल डीड निष्पादित करने से इन्कार कर दिया। मामला अदालत में पहुंचा और पहली अपीलीय अदालत ने डिक्री दे दी। इस फैसले के विरुद्ध अपील पर हाई कोर्ट ने इस आधार पर बिक्री समझौते को शून्य घोषित कर दिया कि फ्रेग्मेंटेशन एक्ट के तहत सेल डीड के रजिस्ट्रेशन पर प्रतिबंध था।

2008 के फैसले को किया जाता है बहाल- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फ्रेग्मेंटेशन एक्ट की धारा-5 के तहत लीज, बिक्री, अधिकारों के हस्तांतरण या स्थानांतरण पर प्रतिबंध था, लेकिन बिक्री समझौते पर प्रतिबंध नहीं था। इसलिए अपील मंजूर किए जाने योग्य है और हाई कोर्ट का 10 नवंबर, 2010 का फैसला खारिज किया जाता है और पहली अपीलीय अदालत के 17 अप्रैल, 2008 के फैसले को बहाल किया जाता है।

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