बांग्लादेश से आए 12 हिंदू शरणार्थियों को CAA के तहत मिली भारतीय नागरिकता, मतुआ समुदाय के हैं लोग
बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए 12 हिंदू शरणार्थियों को सीएए के तहत भारतीय नागरिकता मिली है। लंबे इंतजार के बाद उन्हें कानूनी पहचान मिली है। बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में बसे इन शरणार्थियों को नागरिकता प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं। ये वे परिवार हैं जो बिना किसी दस्तावेज के भारत को अपना सुरक्षित घर मानकर आए थे। सरकार ने इसे लंबित न्याय बताया है।
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बांग्लादेश से आए 12 हिंदू शरणार्थियों को CAA के तहत मिली भारतीय नागरिकता (फाइल फोटो)
राज्य ब्यूरो, जागरण, कोलकताा। बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए 12 हिंदू शरणार्थियों को आखिरकार संशोधित नागरिकता कानून(सीएए) के तहत भारतीय नागरिकता मिल गई है। लंबे इंतजार और अनिश्चितता के बाद उन्हें कानूनी पहचान प्राप्त हुई है।
बांग्लादेश से सालों पहले अपने धर्म और पहचान पर हुए हमलों के कारण भारत आए हिंदू शरणार्थियों के लिए बड़ा राहत भरा दिन आया है। बंगाल के विभिन्न सीमावर्ती इलाकों में बसे इन लोगों को सीएए के तहत 12 शरणार्थियों को नागरिकता प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं। ये वे परिवार हैं जो बिना घर, बिना जमीन और बिना किसी दस्तावेज के केवल इस विश्वास के साथ सीमा पार आए थे कि भारत ही उनका सुरक्षित घर है।
सरकार ने क्या कहा?
पिछले दो महीनों में राज्य के नदिया और कूचबिहार जैसे जिलों में सीएए सहायता केंद्रों के माध्यम से आवेदनों की प्रक्रिया पूरी की गई। दस्तावेजों की जांच के बाद प्रशासन ने इन शरणार्थियों को आधिकारिक तौर पर भारतीय नागरिकता प्रदान की। इसमें विशेष रूप से मातुआ समुदाय के परिवार शामिल हैं, जो लंबे समय से पहचान और अधिकारों के अभाव में असुरक्षा में जी रहे थे।
सरकार का कहना है कि यह नागरिकता किसी उपकार के रूप में नहीं, बल्कि सालों से लंबित न्याय के रूप में दी गई है। नागरिकता प्रमाण पत्र मिलने के बाद लाभार्थियों ने राहत व्यक्त की और कहा कि अब उन्हें न तो अपनी पहचान साबित करनी पड़ेगी, न ही भविष्य को लेकर भय में जीना होगा।
कब सौंपी गई नागरिकता
2019 के बाद नागरिकता से जुड़े नियमों में बदलाव और 2024 में जारी प्रमाणपत्र वितरण अभियान के तहत यह नागरिकता सौंपी गई। प्रमाणपत्र प्राप्त करते हुए व्यक्ति ने कहा कि अब उन्हें अपने अस्तित्व या पहचान साबित करने का भय नहीं रहेगा। सरकार ने इसे पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए उत्पीड़ित हिंदुओं के लिए किए गए वादे की पूर्ति बताया है।

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