शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की जरूरत, वीडियो के माध्यम से स्कूल-कॉलेजों में हो पढ़ाई
आज की शिक्षा व्यवस्था किताबों को रटने पर आधारित है और यही कारण है कि शिक्षा के दौरान बहुत कम छात्र ऐसे होते हैं जो बिजनेस या नौकरी के लिए बिल्कुल तैया ...और पढ़ें
रवि शर्मा। हमारी शिक्षा व्यवस्था में आज भी सबसे ज्यादा जोर अंकों पर है, न कि सीखने और अधिक से अधिक नॉलेज हासिल करने पर। दशकों से चली आ रही इस व्यवस्था में बदलाव की जरूरत समझे जाने के बावजूद अब तक कोई खास पहल नहीं की जा सकी है। बदलते वक्त में तकनीक का साथ लेकर शिक्षा व्यवस्था और गुणवत्ता में किस तरह के परिवर्तन की जरूरत है।
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की जरूरत
समय आ गया है जब हमें अपनी शिक्षा पद्धति को शीघ्र से शीघ्र बदलने पर विचार करना चाहिए। शिक्षा वही सार्थक है, जो जीवन को सक्षम और बेहतर बना सके, बौद्धिक, शारीरिक और व्यावहारिक स्तर पर। इन सबको करने के पहले हमें शिक्षा का उद्देश्य समझना होगा। शिक्षा का उद्देश्य कुछ किताबों या कुछ अध्यायों को रटना कदापि नहीं है, बल्कि उनसे सीखना है। सरल शब्दों में कहूं तो शिक्षा का उद्देश्य शिक्षार्थी के सीखने की क्षमता और प्रवृत्ति का विकास करना है। इसलिए शिक्षा व्यावहारिक और रुचिकर होनी चाहिए, जिससे वह शिक्षार्थी को सीखने की दिशा में प्रेरित कर सके।
हमारी आज की शिक्षा पद्धति किताबों को रटने पर आधारित है और यही कारण है कि शिक्षा के उपरांत बहुत कम शिक्षार्थी ऐसे होते हैं, जो व्यवसाय या नौकरी के लिए बिल्कुल तैयार होते हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि अधिकतर शिक्षा कक्षा तक ही सीमित है और कक्षा के बाहर बहुत कम। जबकि होना ठीक इसका उलटा चाहिए। सीखने के अवसर बाहर ऑफिस, शोध संस्थानों और कारखानों में अधिक हैं, न कि सिर्फ कक्षा में। इस अनुपात को बदलकर ही हम शिक्षा को उपयोगी बना सकते हैं ।
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समय के साथ बदलाव जरूरी
जीवन में प्रासंगिकता का बहुत महत्व है। आज के समय में जब संसार का सारा सूचना भंडार गूगल के एक क्लिक पर उपलब्ध है और जब प्रत्येक विद्यार्थी के हाथ में फोन और कंप्यूटर है, तो ऐसे में सूचना (जिसे हम विद्या भी कह सकते हैं) को रटने की क्षमता को पुरस्कार देना किस तरह की प्रासंगिकता है। सूचना और तकनीक में प्रतिदिन और प्रतिपल विकास और बदलाव हो रहा है। जो कल प्रासंगिक था, आज शायद नहीं है फिर उसे रटने का क्या औचित्य है। उसे तो समझने और सीखने का ही औचित्य है। इतिहास, गणित, मानव व प्रकृति संरचना और यहां तक की भूगोल जैसे विषयों में भी प्रतिदिन नये आविष्कार हो रहे हैं। इन्हें किताबों के माध्यम से प्रतिवर्ष बदलना संभव नहीं होगा, इसलिए शिक्षा का पाठ्यक्रम हर वर्ष बदलना होगा और शिक्षा की तकनीक भी।
पढ़ाने का तरीका हो रुचिकर
जब मैं शिक्षा की तकनीक की बात कर रहा हूं तो पढ़ाने के ढंग और पढ़ाने में टेक्नोलॉजी दोनों की ही बात कर रहा हूं। पढ़ाने के ढंग से मेरा तात्पर्य शिक्षा को रुचिकर बनाने से है। उसमें चित्रों, प्रेरक कहानियों और व्यावहारिकता का अधिकतम समावेश करना होगा। ऐसी शिक्षा को विद्यार्थियों को रटने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि वे उसे आसानी से सीख लेंगे। मैं इसके दो उदाहरण अपने स्वयं के जीवन से देना चाहूंगा। रसायन शास्त्र मेरी समझ में कम आता था, किंतु तभी मुझे एक ऐसे अध्यापक मिले, जो उसे कहानी की तरह बहुत रुचिकर तरीके से समझाते थे। मुझे स्वयं आश्चर्य हुआ कि जो रसायन शास्त्र कभी मुझे अप्रिय लगता था, वह कितनी जल्दी मेरा पसंदीदा विषय बन गया और फिर उसमें मेरे अधिकतम अंक भी आए।
प्रैक्टिकल पर हो ज्यादा जोर
दूसरा उदाहरण तब का है, जब मैं इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का कोर्स कर रहा था। कक्षा में मुझे मोटर का विषय बहुत समझ में नहीं आ रहा था। तभी मुझे एक फैक्ट्री में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग करने का अवसर मिला और वहां मैंने स्वयं के हाथों वाइंडिंग कर इंडक्शन मोटर बनाई। उस दिन से उसमें इतनी रुचि हो गई कि उसके सिद्धांत आज तक याद हैं। मुझे लगता है कि ऐसे अनुभव हम सबके होंगे। अब समय है कि हम इस तरह के अनुभवों के आधार पर नई शिक्षा पद्धति तैयार करें। जब ऐसा होगा तो बच्चों के सीखने की क्षमता का विकास होगा और वे सिर्फ स्कूलों में ही नहीं, बल्कि जीवन में भी सफल होंगे। प्रैक्टिकल पर आधारित शिक्षा का एक उत्कृष्ट उदाहरण लेह के सोनम वांगचुक हैं, जिन्होंने हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ आल्टरनेटिव यूनिवर्सिटी स्थापित कर इसे साबित कर दिखाया है। उनके यहां के बच्चे अधिक से अधिक समय किसी कौशल को सीखकर बिताते हैं, न कि रटकर।
तकनीक निभा सकती है बड़ी भूमिका
शिक्षा के क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण समस्याएं हैं। पहला, कम स्कूलों का होना और दूसरा, सार्थक यानी क्वालिटी अध्यापकों की कमी। ये दोनों समस्याएं टेक्नोलॉजी की मदद से हल हो सकती हैं और हमें ऐसा करना ही चाहिए। मेरा मानना है कि मनुष्य की ज्यादातर समस्याओं का समाधान टेक्नोलॉजी के पास है। इसका अधिक से अधिक इस्तेमाल शिक्षा के प्रसार और गुणवत्ता को सुधारने में लगाना चाहिए। उन गांवों में जहां स्कूल नहीं हैं और जहां अध्यापकों का स्तर भी ठीक नहीं है, वहां सारी पढ़ाई वीडियो के माध्यम से होनी चाहिए।
वीडियो के जरिए हो पढ़ाई
वीडियो केंद्र के जरिए वहां के लिए प्रतिदिन नये विषयों के नए पाठ प्रसारित किए जाएं। इससे सही क्वालिटी की शिक्षा हर स्तर और हर गांव में पहुंचेगी। संक्षेप में, दूरस्थ शिक्षा और मुक्त शिक्षा को प्राथमिक स्तर पर भी लागू करना होगा, तभी शिक्षा हर घर में पहुंच पाएगी। छोटे गांवों में सरकार को स्कूलों पर धनराशि खर्च करने की बजाय बच्चों को स्मार्ट फोन या सरल कंप्यूटर देने चाहिए, जिससे सही स्तर की शिक्षा उनके पास सीधे पहुंच सके।
निजी क्षेत्र की कई कंपनियां वीडियो के माध्यम से बच्चों को प्राइवेट ट्यूशन और कोचिंग देने का काम करती हैं। इनके वीडियो सरस और रुचिकर होते हैं और बच्चे उनसे जल्दी सीखते भी हैं। अब सवाल यह है कि इस तरह के वीडियो यदि ट्यूशन के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं तो सीधे पाठ्यक्रम की पढ़ाई के लिए क्यों नहीं?
हमारा भारत एक जनसंख्या प्रमुख देश है और इसीलिए इसके अंदर एक प्रतिभा-प्रमुख देश बनने की असीम संभावनाएं हैं। उन संभावनाओं का सत्य होना केवल ‘सर्वशिक्षा’ और उससे भी अधिक ‘सही शिक्षा’ पर निर्भर है। समय आ गया है कि हम तकनीक के उपयोग से अपनी शिक्षा पद्धति को प्रत्येक बच्चे तक पहुंचाएं।
(लेखक प्रमा ज्योति फाउंडेशन, नई दिल्ली के अध्यक्ष हैं।)
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