Gandhi Jayanti Quotes and Poems: गांधी जयंती पर पढ़ें राष्ट्रपिता के अनमोल वचन और कविताएं, सम्मान के साथ होगा आपका स्वागत
2 अक्टूबर को देश के साथ ही विदेश में भी गांधी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी जाती है। अगर आप भी गांधी जयंती पर भाषण कविता या उनके अनमोल विचार लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं तो यह पेज आपके लिए बेहद उपयोगी है। आप यहां से स्लोगन कविता और स्पीच तैयार कर सकते हैं।

एजुकेशन डेस्क, नई दिल्ली। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिवस के अवसर पर प्रतिवर्ष गांधी जयंती मनाई जाती है। इस दिन पर स्कूलों, कॉलेजों सहित सरकारी कार्यालयों में राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि दी जाती है और उनके द्वारा किये गए कार्यों को याद किया जाता है और साथ ही उनके बारे में लोगों को जानकारी दी जाती है। इस दिन पर कई जगहों पर कविताओं, भाषण सहित अन्य कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। अगर आप भी गांधी जी के द्वारा दिए गए विचारों को लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं तो यह पेज आपको लिए उपयोगी है। इसके साथ ही आप यहां गांधी पर लिखी गई कविताओं को भी प्राप्त कर सकते हैं।
गांधी जी के द्वारा दिए गए अनमोल विचार
- पहले वो आपको अनदेखा करेंगे, फिर आप पर हंसेंगे, फिर आपसे लड़ेंगे, और तब आप जीत जाएंगे
- आप मानवता में विश्वास मत खोइए। मानवता सागर की तरह है। अगर सागर की कुछ बूंदें गंदी हैं तो जरूरी नहीं कि पूरा सागर ही गंदा हो।
- डर शरीर का रोग नहीं है, यह आत्मा को मारता है।
- हमारे जीवन का उद्देश्य दूसरों की सहायता करना है।
- मुझे लगता है कि नेतृत्व का अर्थ है लोगों के साथ चलना।
- स्वतंत्रता एक जन्म की भांति है। जब तक हम पूर्णतः स्वतंत्र नहीं हो जाते तब तक हम परतंत्र ही रहेंगे। जब तक गलती करने की स्वतंत्रता ना हो तब तक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
(Image-freepik)
- गांधी जी पर लिखित कविताएं
- एक दिन इतिहास पूछेगा
- कि तुमने जन्म गांधी को दिया था,
- जिस समय अधिकार, शोषण, स्वार्थ
- हो निर्लज्ज, हो नि:शंक, हो निर्द्वन्द्व
- सद्य: जगे, संभले राष्ट्र में घुन-से लगे
- जर्जर उसे करते रहे थे,
- तुम कहां थे? और तुमने क्या किया था?
- हरिवंशराय बच्चन
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- गांधी तूफान के पिता
- और बाजों के भी बाज थे ।
- क्योंकि वे नीरवताकी आवाज थे।
-रामधारी सिंह "दिनकर"
- युग बढ़ा तुम्हारी हंसी देख
- युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,
- तुम अचल मेखला बन भू की
- खींचते काल पर अमिट रेख
- -सोहनलाल द्विवेदी
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