‘पुलिस भैया की खिड़की’ और सी-60 कमांडो से बदला गढ़चिरौली का चेहरा, SP नीलोत्पल ने बताए सफलता के राज
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के माओवाद खात्मे के संकल्प के बीच, गढ़चिरौली के पुलिस अधीक्षक नीलोत्पल ने जिले में माओवाद पर काबू पाने की रणनीति साझा की। ...और पढ़ें

एसपी नीलोत्पल
ओमप्रकाश तिवारी, मुंबई। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 31 मार्च, 2026 तक माओवाद के पूरी तरह से खात्मे का संकल्प लिया है। महाराष्ट्र का गढ़चिरौली जिला जो माओवाद प्रभावित पट्टी अर्थात रेड कॉरिडोर का एक प्रमुख हिस्सा रहा है। एक तरफ छत्तीसगढ़ (पहले मध्यप्रदेश), तो दूसरी तरफ तेलंगाना (पहले आंध्रप्रदेश) से सटा गढ़चिरौली जिला 70 प्रतिशत से अधिक वनभूमि से आच्छादित होने के कारण माओवादियों की गतिविधियों का बड़ा केंद्र रहा है।
तेलंगाना से गढ़चिरौली के रास्ते छत्तीसगढ़ में जाकर हिंसक वारदातों को अंजाम देकर वे गढ़चिरौली के जंगलों में आसानी से शरण पा जाते थे। इसे रोकने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने सी-60 कमांडो फोर्स का गठन किया। इसमें ग्रामीण युवाओं को पुलिस में भर्ती कर माओवादियों के खिलाफ अभियान चलाया गया। गोली के साथ बोली की भी मदद ली गई।
पुलिस भैया की खिड़की के जरिए संवाद बढ़ाया
‘पुलिस दादालोरा खिड़की’, यानी पुलिस भैया की खिड़की के जरिए संवाद बढ़ाया गया। ग्रामीणों के बीच अपनी पैठ बढ़ाकर गढ़चिरौली पुलिस एवं सी-60 कमांडो फोर्स ने माओवादियों पर जिस तरह से काबू पाया है, वह अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल है।

इस दल का नेतृत्व करने वाले और भूपति जैसे कई बड़े माओवादी कमांडरों का आत्मसमर्पण करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गढ़चिरौली जिले के पुलिस अधीक्षक नीलोत्पल से दैनिक जागरण के महाराष्ट्र ब्यूरो प्रमुख ओमप्रकाश तिवारी ने विस्तार से बात की।

मूलतः बिहार के भागलपुर के रहने वाले नीलोत्पल ने इंजीनियरिंग की डिग्री ली है। हिंदुस्तान पेट्रोलियम में तीन साल तक काम करने के बाद नौकरी छोड़कर यूपीएससी की तैयारी की और आइपीएस बने। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंशः
गढ़चिरौली जिला देश में माओवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में से एक रहा है। वर्तमान स्थिति क्या है?
- स्थिति में बहुत बड़ा बदलाव आया है। उत्तर गढ़चिरौली अब माओवाद से मुक्त है। फिलहाल दक्षिण में मुट्ठीभर नक्सली ही बचे हैं। गढ़चिरौली में लगभग 10 माओवादी ही बचे हैं, जो एक तालुका के सीमावर्ती क्षेत्र में सिमट कर रह गए हैं। हम उनसे हथियार डालने की अपील कर रहे हैं। उन्हें मुख्यधारा में शामिल होना होगा, अन्यथा पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
ये कैसे संभव हुआ... थोड़ा विस्तार से बताइए?
- महाराष्ट्र सरकार ने इस जिले में विकास को बढ़ावा दिया है। गढ़चिरौली में कनेक्टिविटी को बेहतर बनाया जा रहा है। आज दुर्गम क्षेत्रों में भी बिजली, पानी की आपूर्ति, मोबाइल टावर और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं। केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाएं लागू की जा रही हैं। आम लोगों में सुरक्षा की भावना है। सुदूरतम क्षेत्रों में भी पुलिस और सुरक्षा बलों की मौजूदगी है। कुल 87 गांवों को उनके तालुका मुख्यालय से जोड़ने के लिए सड़क, पुलिया एवं बस सेवाएं भी शुरू की गई हैं। इन सभी प्रयासों से माओवाद का अंत होगा और वह कभी पुनर्जीवित नहीं हो पाएगा। जनता और पुलिस में विश्वास का भाव है। अब गढ़चिरौली में वह सब कुछ मौजूद है, जो किसी भी अन्य जिले में है।
गढ़चिरौली में माओवादियों की स्थिति पहले कितनी थी और अब कितनी है?
- जनवरी 2024 में गढ़चिरौली में सभी 10 उपविभाग माओवाद ग्रस्त थे, जिसमें लगभग 100 माओवादी कार्यकर्ता सक्रिय थे। अब मुश्किल से 10 ही बचे हैं। हम उनसे आत्मसमर्पण करने की अपील कर रहे हैं। हम उनसे हथियार डालने और मुख्यधारा में शामिल होने का आग्रह कर रहे हैं।
सरकारी नीतियां इसमें किस प्रकार मददगार हो रही हैं?
हमारी एक व्यापक आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास योजना है। आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के रहने के लिए एक अलग बस्ती बनाई गई है। वे ‘नवजीवन कालोनी’ में रह रहे हैं। आत्मसमर्पण करने वाले कुछ लोग लायड्स स्टील प्लांट में काम कर रहे हैं। लायड्स ने और लोगों को लेने का आश्वासन भी दिया है। हम आत्मसमर्पण कर चुके लोगों को कौशल प्रशिक्षण दे रहे हैं। कौशल प्रशिक्षण के कार्यक्रमों में कक्षा आठ पास होना आवश्यक है, तो हम उन्हें कक्षा आठ पास करने में मदद कर रहे हैं, क्योंकि उनके लिए महाराष्ट्र राज्य कौशल विकास निगम के पाठ्यक्रमों के तहत प्रशिक्षण प्राप्त करना आवश्यक है।
गढ़चिरौली में पिछले पांच वर्षों के माओवादी घटनाक्रम किस प्रकार रहे?
- संक्षेप में, यदि आप देखें तो पिछले छह वर्षों में गढ़चिरौली जिले में गोलीबारी की 56 घटनाएं हुई हैं, जिनमें 102 माओवादी मारे गए हैं। 164 माओवादियों को गिरफ्तार किया गया और 156 माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। इस अवधि के दौरान गढ़चिरौली पुलिस को तीन शौर्य चक्र, वीरता के लिए 210 पुलिस पदक और सराहनीय सेवा के लिए आठ राष्ट्रपति पुलिस पदक प्राप्त हुए हैं।
2021 से अब तक केवल एक ही घटना में सुरक्षा बलों के हताहत होने की सूचना मिली है, जबकि 2009 में सबसे ज्यादा 54 पुलिसवाले मारे गए थे। गढ़चिरौली आज किसी अन्य शहर या किसी अन्य जिले की तरह ही है।
हाल ही में एक बहुत महत्वपूर्ण घटना घटी है, जिसमें कुछ बड़े स्तर के माओवादी कार्यकर्ताओं ने अपने हथियारों के साथ हमारे मुख्यमंत्री के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। जहां तक माओवादी संगठनों में भर्ती का सवाल है, गढ़चिरौली में पिछले कुछ वर्षों में यह शून्य रहा है।
आप जब गढ़चिरौली पुलिस की उपलब्धियों का जिक्र कर रहे हैं, सुना है यहां पुलिस भर्ती में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाती है।
-वैसे तो पूरे महाराष्ट्र में पुलिस भर्ती प्रक्रिया एक जैसी ही है, लेकिन गढ़चिरौली की विशेष परिस्थितियों के कारण यहां के पुलिस बल में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाती है। इसके अपने फायदे भी हैं। इससे स्थानीय लोगों को सम्मानजनक रोजगार मिलता है, तो वे और उनके परिवार के सदस्य भटकने से बच जाते हैं। वहीं नौकरी पाए स्थानीय युवा अपने क्षेत्र के बारे में जितना जानते हैं, स्थानीय लोगों से जितना घुलमिल पाते हैं, उतना बाहर से आया कोई व्यक्ति अपनी पैठ नहीं बना पाएगा।
गढ़चिरौली की भौगोलिक एवं रणनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह जरूरी भी है। इसलिए 2018 के बाद से एक विशेष अधिसूचना के आधार पर गढ़चिरौली पुलिस में केवल यहां के स्थानीय निवासियों को ही भर्ती का मौका मिल रहा है।
माओवाद से निपटने में सी-60 कमांडो फोर्स की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। यह कब बना और सामान्य पुलिस बल से किस प्रकार अलग है?
-सी-60 गढ़चिरौली में माओवादी गतिविधियों से निपटने के लिए बनाई गई एक विशेष कमांडो फोर्स है। इसकी स्थापना 1 दिसंबर, 1990 में गढ़चिरौली के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के.पी. रघुवंशी ने की थी। वह 2004 में बने महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के भी पहले प्रमुख रहे।
उन्होंने उस विशेष पुलिस बल के गठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1990 में जब सी-60 कमांडो फोर्स का गठन किया गया, तो उसमें सिर्फ 60 प्रशिक्षित जवान थे। आज तो यह विशेष दस्ता 1000 कमांडोज का हो गया है। इस बल के गठन में भी इस बात का ध्यान रखा गया था कि इसमें स्थानीय लोगों को शामिल किया जाए।
इनमें स्थानीय गोंड एवं माडिया जनजातियों के लोग अधिक होते हैं, क्योंकि वे यहां की भौगोलिक स्थितियों और यहां के लोगों की भाषा समझने में निपुण होते थे। इन्हें हिंसक माओवादी गतिविधियों से निपटने के लिए खासतौर से छापामार युद्ध का प्रशिक्षण दिया जाता है। सी-60 के सभी कमांडो एके-103 जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस रहते हैं। इसमें 30 जवानों की एक टीम के ऊपर एक पार्टी कमांडर होता है, जो उनका नेतृत्व करता है।
गढ़चिरौली की माओवादी समस्या से निपटने के लिए केंद्र या राज्य से भी कुछ पुलिस बल मिला है?
- हां, यहां पर राज्य रिजर्व पुलिस बल (एसआरपीएफ) की 17 एवं केंद्र रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की 30 कंपनियां भी तैनात हैं। सीआरपीएफ की कंपनियां 2009 से यहां तैनात हैं।
माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई को किस तरह से अंजाम देते थे?
- हम दो तरह से कार्रवाई करते थे... गोली और बोली। एक ओर एंटी नक्सल ऑपरेशन के जरिए माओवादियों की कमर तोड़ी। वहीं सिविक एक्शन प्रोग्राम के जरिए ग्रामीणों से संवाद बढ़ाया और माओवादियों के साथ उनके संपर्क को पूरी तरह से तोड़ दिया। दो धारी एक्शन प्लान कारगर साबित हुआ।
आपने अभी गढ़चिरौली पुलिस द्वारा ग्रामीणों का भरोसा बहाल करने वाली कुछ योजनाओं का जिक्र किया। क्या हैं, वे योजनाएं? कैसे जीता गया ग्रामीणों का भरोसा?
- माओवादी गतिविधियों से निपटने के लिए हमें ग्रामीणों का भरोसा जीतना बहुत जरूरी होता है। जंगलों में रहने वाले आदिवासी अपने जल-जंगल-जमीन को लेकर बहुत संवेदनशील होते हैं। माओवादी समूहों द्वारा उन्हें इन पर खतरा दिखाकर ही उन्हें भड़काया जाता था। ग्रामीण उनके बहकावे में आकर उन्हें आश्रय देते थे और कुछ युवा तो उनका साथ देने के लिए उनके समूहों में भी शामिल हो जाते थे, जबकि सरकारी योजनाएं उन तक पहुंच नहीं पाती थीं।
ग्रामीणों से रिश्ता मजबूत करने के लिए पुलिस ने सामुदायिक पुलिसिंग की शुरुआत की। इसके लिए ‘पुलिस दादालोरा खिड़की’ की शुरुआत की गई। इसके माध्यम से नागरिकों को सरकारी योजनाओं का लाभ, जाति प्रमाण-पत्र एवं अन्य जरूरी दस्तावेज आसानी से उपलब्ध कराए जाते हैं। 74 गांवों में ‘एक गांव, एक पुस्तकालय’ मुहिम के तहत हमने पुस्तकालय शुरू करवाए हैं।
अब ग्रामीण युवाओं को पुलिस भर्ती का प्रशिक्षण देकर उन्हें आधुनिक तकनीक से भी सशक्त बनाया जा रहा है। आदिवासी युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार के योग्य बनाने के कारण गढ़चिरौली पुलिस के प्रोजेक्ट उड़ान को ‘फिक्की स्मार्ट पुलिसिंग अवार्ड 2024’ भी प्राप्त हुआ है।
हाल ही में सीपीआई (माओवादी) पोलित ब्यूरो के सदस्य मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू उर्फ भूपति ने आत्मसमर्पण किया। इस घटनाक्रम को आप किस नजरिए से देखते हैं?
- भूपति का आत्मसमर्पण माओवादी आंदोलन को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। वास्तव में, 2024-25 का वर्ष माओवाद और अपराधियों से निपटने के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है। भूपति के आत्मसमर्पण के बाद उसकी अपील पर बड़ी संख्या में और लोगों ने आत्मसमर्पण किया है।
खासतौर पर इन सफलताओं में 2025 के अक्टूबर और नवंबर का महीना हमारे लिए बहुत सफलतादायक रहा है। इससे स्थिति में अभूतपूर्व बदलाव आया है। वास्तव में महाराष्ट्र माओवाद को 31 मार्च, 2026 की समय सीमा के अंदर समाप्त करने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। अब माओवादियों ने जनता का समर्थन खो दिया है और उन्हें यह बात समझ आ चुकी है।
भूपति के मन में यह बदलाव किस कारण से आया?
- दरअसल वह काफी समय से अपना मन बना रहा था। 21 मई 2025 को सुरक्षा बलों द्वारा सीपीआइ (माओवादी) के महासचिव नंबाला केशवा राव उर्फ कासवाराजू का छत्तीसगढ़ में एक मुठभेड़ में मारा जाना एक प्रमुख घटनाक्रम था। इसके बाद से ही भूपति कमांडरों और कार्यकर्ताओं को हथियार डालने के लिए मना रहा था।
15 अक्टूबर 2025 को भूपति ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। हमारे मुख्यमंत्री ने इस घटनाक्रम को ‘माओवाद के अंत की शुरुआत’ बताया है। इससे पहले 1 जनवरी 2025 को भूपति की पत्नी और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी की सदस्य विमला चंद्र सिदाम उर्फ तारक्का ने आत्मसमर्पण कर दिया था।
क्षेत्र की स्थिति को आप समग्र रूप से कैसे देखते हैं?
- सीपीआई (माओवादी) पूरी तरह से बिखर गई है। महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ (एमएमसी) विशेष क्षेत्र, जिसमें तीनों पड़ोसी राज्यों के सीमावर्ती जिले शामिल हैं, उनके सभी सदस्यों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में काफी बड़ी संख्या में माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। अब माओवाद अंतिम सांसें गिन रहा है।
आत्मसमर्पण के बाद पूर्व माओवादियों को माओवादियों से ही जान का खतरा रहता है। उनकी सुरक्षा का क्या इंतजाम करते हैं आप लोग?
- समर्पण करने वाले माओवादियों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता है। उन्हें उनके मूल गांव में लौटने नहीं दिया जाता है। उन्हें जिला मुख्यालय के आसपास ही बसाया जाता है, ताकि उनकी सुरक्षा का ध्यान रखा जा सके।

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