देसी बीज का कमाल, किसान के बगीचे में उगी साढ़े 3 फीट की लौकी; दूर-दूर से देखने आ रहे लोग
मध्यप्रदेश में सीधी जिले के एक किसान ने देसी बीज से 3.5 फीट लंबी लौकी उगाई है। यह लौकी ऑर्गेनिक तरीके से उगाई गई है और इसका स्वाद लाजवाब है। किसान धीरेंद्र पांडे अपने बगीचे में कई तरह की सब्जियां उगाते हैं। वह अपने बगीचे में कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करते हैं। इस काम में पूरा परिवार उनका सहयोग करता है।

योगेश साहू, सीधी/भोपाल। मध्यप्रदेश के सीधी जिले में एक किसान ने हरी सब्जियों में शुमार लौकी उगाई है। इस लौकी की दो बड़ी खासियत हैं। पहली तो ये कि यह करीब 3.5 फीट लंबी है। दूसरी ये कि इसका बीज देसी है और इसे ऑर्गेनिक (जैविक) तरीके से ही उगाया गया है। इस वजह से पकाए जाने पर इसका स्वाद मन को काफी भाता है।
बहरहाल, इस लौकी को उगाने वाले किसान हैं सीधी जिले के धीरेंद्र पांडे। धीरेंद्र यहां भेलकी ग्राम पंचायत में रहते हैं। पीढ़ियों से उनका परिवार खेती-किसानी से जुड़ा हुआ है। वह अपने बगीचे में ही कई तरह की सब्जियां उगाते हैं।
सोशल मीडिया पर शेयर की तस्वीर
धीरेंद्र पांडे ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर तस्वीरें साझा की हैं। इनमें वह अपने बगीचे में उगाई गई साढ़े 3 फीट की लौकी के साथ नजर आ रहे हैं। लौकी की लंबाई लोगों को अचरज में डालती है। दूर-दूर से लोग इसे देखने भी आते हैं।
हालांकि, धीरेंद्र पांडे बताते हैं कि वह अपने घर के उपयोग के लिए ही सब्जियां उगाते हैं। वह कहते हैं कि ज्यादा पैदावार होने और समय-समय पर आस-पड़ोस के लोगों में भी वह सब्जियां बांटते रहते हैं।
बगीचे में उगाई गई लौकी के साथ किसान धीरेंद्र पांडे।
कौन-कौन सी सब्जियां उगाते हैं धीरेंद्र
धीरेंद्र पांडे कहते हैं कि अपने परिवार के उपयोग के लिए लौकी के अलावा टमाटर, पालक, लहसुन, आलू, भिंडी, मिर्ची, बैंगन, तोरी (तोरई/गिल्की/रेरुआ) जैसी सब्जियां उगाते हैं। इन सब्जियों की देखभाल में उनका पूरा परिवार हाथ बंटाता है।
पांडे कहते हैं कि उनके पास कुल साढ़े 3 एकड़ जमीन है। इसमें वह धान और गेहूं की फसल बोते हैं। इसके अलावा उनके पास 15 डिसमिल (करीब आधा एकड़) जमीन भी है। जमीन के इस छोटे टुकड़े को वह अपने बगीचे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
कौन हैं धीरेंद्र पांडे
- किसान धीरेंद्र पांडे मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 550 किलोमीटर दूर सीधी जिले में भेलकी ग्राम पंचायत के रहने वाले हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग से परबनी टनल से करीब 3.5 किलोमीटर दूर यह ग्राम पंचायत है। वह ग्रेजुएट हैं।
- धीरेंद्र संयुक्त परिवार में रहते हैं। उनके परिवार में पिता श्रीरामसिया पांडे, मां सरोज पांडे, भाई विपिन पांडे, भाई की पत्नी आकांक्षा पांडे हैं।
- धीरेंद्र की पत्नी अनीता पांडे गृहिणी (हाउसवाइफ) हैं। धीरेंद्र के दो बच्चे हैं। इनमें बड़ी बेटी संयोगिता पांडे 9वीं कक्षा में पढ़ रही है। वहीं, छोटा बेटा सत्यांश पांडे अभी 7वीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा है।
गोपालक भी हैं धीरेंद्र
- पांडे बताते हैं कि वह बिना कीटनाशक का इस्तेमाल किए अपनी सब्जियां उगाते हैं। सब्जियों की अच्छी पैदावार के लिए वह गोबर की खाद का उपयोग करते हैं।
- वह गोपालक भी हैं। उनके पास दो-तीन गाय हैं। इनके गोबर से वह जैविक खाद बनाकर अपने बगीचे में डालते हैं।
- धीरेंद्र कहते हैं कि वह बीते करीब 15 साल से खेती-बाड़ी संभाल रहे हैं। उन्हें बचपन से ही पेड़-पौधों के बारे में जानने और उन्हें उगाने में रुचि थी। इसी शौक को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने अपने बगीचे में देसी बीज बोना शुरू किया था।
देसी बीजों का भंडारण करते हैं धीरेंद्र
धीरेंद्र बताते हैं कि उनका परिवार हमेशा से ही देसी बीजों को भंडारण करता रहा है। वह कहते हैं कि उनके दादा-दादी के जमाने से ही ये बीज उनके पास हैं। हर बार फसल में से कुछ बीज वह बचाकर अगली बुआई के लिए रख लेते हैं।
वह कहते हैं कि इस साल जो लौकी सबसे पहले बड़ी हुई, वो करीब साढ़े तीन फीट की थी। परंतु अब धीरे-धीरे लंबाई घटकर करीब 3 फीट की रह गई है।
बगीचे में उगी भाजी।
मौसम के हिसाब से फसल और सब्जियों की देखभाल करनी पड़ती है। इसमें परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग भी मिलता है।
वह बताते हैं कि लौकी के देसी बीज के एक दाने से बनने वाली बेला (लौकी के पौधे से बनने वाले बेल) 78 फीट लंबी और 19 फीट चौड़ी छत को पूरा कवर कर देती है।
इसमें मार्केट की खाद नहीं डाली जाती है। इससे यह खूब फलती-फूलती है, हां ये बात जरूर है कि इसे दिए जाने वाले पानी की सही मात्रा का ध्यान रखना होता है।
क्षेत्र की समस्या को भी उठा रहे धीरेंद्र
धीरेंद्र पांडे अपने क्षेत्र की समस्या को भी उठाते हैं। वह कहते हैं कि उनके इलाके में आवार पशुओं की बड़ी समस्या है। इनकी वजह से फसलों आदि को नुकसान होता है। ये पशु बाड़-जाली आदि को तोड़ देते हैं।
धीरेंद्र पांडे के बगीचे में इन दिनों गोल लौकी की बेल भी काफी फल-फूल रही है।
इससे मेहनतकश किसान की फसल चौपट हो जाती है। वह कहते हैं कि सरकार को इन आवारा पशुओं के लिए व्यवस्था करनी चाहिए। पहले कांजी हाउस (आवारा पशुओं को बांधकर रखने की जगह/बाड़ा) हुआ करते थे।
इनमें ऐसे पशुओं के लिए चारे का इंतजाम भी हुआ करता था। परंतु, समय के साथ ये कांजी हाउस बदहाल होते चले गए। अब प्रदेश की सरकार भी का इस ओर ध्यान नहीं देती है।
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