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    Madhya Pradesh: सतपुड़ा की पहाड़ी पर इतिहास, रोमांच और प्रकृति दर्शन का अद्भुत संगम

    देश में स्थित कई किले महल भवन इसका जीवंत उदाहरण हैं और इन्हीं में से एक है असीरगढ़ का किला। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में स्थित यह किला करीब पांच सदी पुराना है और यहां की यात्रा मात्र इतिहास से साक्षात्कार नहीं कराती है बल्कि प्रकृति दर्शन के साथ उस समय की समृद्ध इंजीनियरिंग और सोच से भी भेंट कराती है।

    By Jagran News Edited By: Sonu Gupta Updated: Thu, 18 Apr 2024 06:51 PM (IST)
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    असीरगढ़ के किले और पहाड़ी पर छाई हरियाली जो राहगीरों को भी अपनी ओर आकर्षित करती है।

    संदीप परोहा, बुरहानपुर। भवन निर्माण में वास्तुकला के साथ इंजीनियरिंग का उपयोग निरंतर बढ़ रहा है और नित नई तकनीकें सामने आ रही हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि हम इस कला में सदियों पहले से आधुनिकता और चकित करने वाले कौशल का प्रदर्शन करते रहे हैं।

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    देश में स्थित कई किले, महल, भवन इसका जीवंत उदाहरण हैं और इन्हीं में से एक है असीरगढ़ का किला। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में स्थित यह किला करीब पांच सदी पुराना है और यहां की यात्रा मात्र इतिहास से साक्षात्कार नहीं कराती है, बल्कि प्रकृति दर्शन के साथ उस समय की समृद्ध इंजीनियरिंग और सोच से भी भेंट कराती है।

    किले की अभेद्य संरचना

    बुरहानपुर आज देश में केला उत्पादन और हैंडलूम के लिए ख्यात है। अतीत में यह क्षेत्र दक्षिण का द्वार कहा जाता था और इसकी वजह था असीरगढ़ का अजेय दुर्ग। इतिहासकारों के अनुसार, अभेद्य संरचना के कारण इस किले को जीतना लगभग असंभव था। इतिहासकारों के अनुसार किले को आसा अहीर नामक राजा ने 15वीं सदी में बनवाया था जिस पर बाद में मुगलों ने कब्जा कर लिया।

    वर्ष 1760 से 1819 तक यह मराठों के कब्जे में रहा और वर्ष 1904 से अंग्रेजों ने इसे जेल के रूप में प्रयोग करना शुरू कर दिया था। समुद्र तल से करीब 250 फीट की ऊंचाई पर सतपुड़ा की पहाड़ी के शिखर पर तीन किलोमीटर के क्षेत्र में फैले इस किले का भ्रमण एक अलग ही अनुभव है। किले के प्रारंभ में बड़ा प्रवेश द्वार और चारों ओर तोप के गोले से भी नहीं टूटने वाले पत्थरों की दीवार है। इसमें मुगलों व अंग्रेजों के जमाने का बारूदखाना, बंदीगृह, अस्तबल, टकसाल, फांसी घर, न्यायालय, विश्राम गृह, तालाब और सेना के ठहरने के स्थान हैं।

    शिव मंदिर और पांडवकालीन धरोहर

    इतिहास के जानकार मेजर डा. एमके गुप्ता व होशंग हवलदार के अनुसार किले के पूर्व में स्थित शिव मंदिर अतिप्राचीन है। मान्यता है कि यहां हर सुबह गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा भगवान शिव का पूजन करने आते हैं।

    कुछ वर्ष पूर्व पुरातत्व विभाग द्वारा किले के भीतर शिव मंदिर के सामने स्थित कुएं की सफाई के दौरान यहां पांडवकालीन गुफाएं मिली थीं। इन गुफाओं में सात द्वार भी हैं जो किले की तलहटी की ओर खुलते हैं। इन गुफाओं पर अब भी शोध-अध्ययन जारी है। इस स्थान पर नीचे एक भूमिगत भवन भी है। जर्जर होने के कारण पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया है।

    सुंदर झरने और वनसंपदा

    असीरगढ़ केवल इतिहास में दर्ज महत्व की वजह से ही चर्चित नहीं है। यहां प्राकृतिक सौंदर्य भी अप्रतिम है। किले के आसपास मौजूद वनसंपदा और वन्य प्राणी पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। पक्षियों का कलरव और हरियाली में आत्मिक शांति का अनुभव होता है। यहां के सुंदर झरने मन मोहते हैं।

    इस तरह पहुंच सकते हैं

    असीरगढ़ का किला बुरहानपुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर खंडवा मार्ग पर इंदौर-इच्छापुर हाईवे के किनारे स्थित है। सड़क से ही यह दिखता है। इटारसी-मुंबई रेलखंड पर चलने वाली यात्री ट्रेन से बुरहानपुर स्टेशन पर उतर कर किले तक पहुंचा जा सकता है। निकटतम एयरपोर्ट इंदौर एयरपोर्ट यहां से करीब 182 किमी दूर है। वहां से सड़क मार्ग से खंडवा होते हुए बुरहानपुर पहुंचा जा सकता है।

    यूनेस्को की विश्व धरोहरों भी निहारिए

    जब असीरगढ़ किले की यात्रा पर आएं तो बुरहानपुर स्थित कुंडी भंडारा जल संरचना की यात्रा भी अवश्य करें। यह विश्व की अनूठी भूमिगत जल संरचना है जिसे यूनेस्को ने विश्व धरोहरों की अस्थायी सूची में भी शामिल किया है। इसका निर्माण लगभग चार सदी पूर्व हुआ था। यहां जमीन से अस्सी फीट नीचे घुमावदार नहरें बनी हैं। आप इंदौर और बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन की यात्रा की इस पर्यटन पैकेज में शामिल कर इसे और समृद्ध कर सकते हैं।

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