हर पल बच्चे पर नजर रखना पड़ सकता है भारी! हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग छीन सकती है उनका आत्मविश्वास
हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग में माता-पिता बच्चे की हर गतिविधि पर निगरानी रखते हैं, जिससे बच्चे के आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

क्या होती है हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। समय के साथ लोगों की पेरेंटिंग स्टाइल में काफी बदलाव आया है। पेरेंटिंग के इन्हीं तरीकों के लिए अक्सर कोई न कोई नया शब्द सुनने को मिल जाता है, जैसे प्लास्टिक रैप पेरेंटिंग या लॉनमोवर पेरेंटिंग आदि। ऐसा ही एक शब्द है हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग।
इसके नाम से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इसमें पेरेंट्स बच्चे की लाइफ में खुद को बहुत ज्यादा इनवॉल्व करते हैं। आइए जानें कि हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग क्या होती है और इसका बच्चे पर क्या असर पड़ता है?
क्या होती है हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग?
इस पेरेंटिंग स्टाइल में माता-पिता बच्चे के सिर पर हेलीकॉप्टर की तरह मंडराते रहते हैं। ऐसे पेरेंट्स बच्चों से जुड़े हर छोटे-बड़े फैसलों में खुद शामिल होते हैं और उनकी हर एक्टिविटी पर नजर बनाए रखते हैं। वो बच्चों को किसी भी तरह की परेशानी या असफलता से बचाने के लिए तुरंत कूद पड़ते हैं।
इसके पीछे भले ही माता-पिता का प्यार छिपा होता है, लेकिन ओवर-प्रोटेक्शन के कारण बच्चों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
बच्चों पर हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग का असर
- आत्मविश्वास की कमी- जब बच्चों को खुद फैसला लेने का मौका नहीं मिलता, तो वे आत्मनिर्भर नहीं बन पाते। हर काम के लिए वो अपने माता-पिता पर निर्भर रहने लगते हैं। इसलिए जब उन्हें कभी खुद कोई फैसला लेना पड़ता है, तो वो घबरा जाते हैं और अपने फैसले पर यकीन नहीं रख पाते।
- मेंटल स्ट्रेस- जब बच्चों को पता होता है कि उनके पेरेंट्स उन्हें लगातार देख रहे हैं, तो वो परफेक्शन के दबाव में रहने लगते हैं। माता-पिता की उम्मीदों और उनकी निगरानी के कारण उनका स्ट्रेस बढ़ता है। उन्हें हमेशा ये डर रहता है कि कहीं उसके माता-पिता नाराज न हो जाएं।
- मुकाबला न कर पाना- हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग में माता-पिता बच्चे की हर परेशानी खुद ही हल करते हैं। इसलिए बच्चे मुसीबतों से लड़ना सीख ही नहीं पाते। इसके कारण उनमें मुश्किलों से लड़ने की क्षमता कम होती है।
बैलेंस कैसे बनाएं?
बच्चों पर निगरानी करना या मुसीबत में उनकी मदद करना जरूरी है, लेकिन उन्हें अपने फैसले लेने देना और थोड़ी आजादी देना भी उतना ही जरूरी है। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स बैलेंस बनाएं। बच्चों को अपने छोटे-मोटे फैसले खुद लेने दें और गलतियों से सीखने का मौका दें। इससे बच्चा ज्यादा आत्मनिर्भर बनेगा और उसका कॉन्फिडेंस भी बूस्ट होगा।
