हर परेशानी से पहले ढाल बन जाते हैं पेरेंट्स, लॉनमोवर पेरेंटिंग से बच्चों के लिए खड़ी हुई नई मुश्किलें
लॉनमोवर पेरेंटिंग एक ऐसी शैली है जिसमें माता-पिता बच्चों की हर मुश्किल खुद सुलझा देते हैं।

बच्चे के विकास में बाधा है लॉनमोवर पेरेटिंग (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पहले के जमाने में जहां माता-पिता की छड़ी वाली पेरेटिंग अपना असर दिखाती थी, वहीं अब डांट-फटकार वाली परवरिश बच्चों पर उतना काम नहीं कर रही। यही वजह है कि पेरेंटिंग के नए-नए तरीके अपनाए जा रहे हैं और इन दिनों इन्हीं में से एक तरीका लॉनमोवर सुर्खियों में बना हुआ है।
कहीं आप भी तो जाने-अनजाने में इस तरह की पेरेटिंग को नहीं अपना रहे? आइए इसके बारे में विस्तार से बात करते हैं कि आखिर क्या है लॉनमोवर परवरिश और इससे बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ता है।
क्या है लॉनमोवर पेरेटिंग?
लॉनमोवर बच्चों की परवरिश से जुड़ी एक ऐसी शैली है जिसमें पेरेंट्स अपने बच्चों की हर मुश्किल खुद सुलझाकर आसान कर देते हैं। इस तरह की पेरेंटिंग में जब भी बच्चे पर कोई बड़ी मुसीबत आती है या वह किसी मुश्किल में फंस जाता है तो माता-पिता उसे खुद परेशानी से निपटने की सीख नहीं देते, बल्कि इसे अपनी जिम्मेदारी समझकर पहले ही खत्म कर देते हैं।
यह ठीक उसी तरह है, जिस तरह लॉनमोवर यानी घास काटने वाली मशीन अपने रास्ते में पड़ने वाली जंगली घास और बाधाओं को साफ करती है, उसी तरह पेरेंट्स भी अपने बच्चों के जीवन में इसी मशीन की तरह भूमिका निभाते हैं।
बच्चे के विकास में बाधा है लॉनमोवर पेरेटिंग
इन दिनों माता-पिता द्वारा किया जा रहा इस तरह का पालन-पोषण हम उनकी आदतों में बड़ी ही आसानी से देख सकते हैं। जान लेने वाली बात यह है कि इससे बच्चे के विकास में कोई मदद नहीं मिलती, उल्टा यह परवरिश बड़ी बाधा साबित हो सकती है। आइए जानते हैं कैसे:
स्कूल का होमवर्क और दोस्तों के झगड़े में भूमिका
पेरेंट्स अपने बच्चे पर निगरानी रखने के साथ ही उनका होम वर्क करने, प्रोजेक्ट्स खुद बनाने और यहां तक की उनके दोस्तों के बीच हुए झगड़े को भी सुलझाने में भी भूमिका निभाते है।
परेशानी का सामना करने के बजाय बैसाखी बन जाना
ऐसे पेरेंट्स बच्चों को मुश्किलों का सामना करना नहीं सिखाते, वो उनके लिए बैसाखी बन जाते हैं जिसे बच्चे समय-समय पर उपयोग में लाते हैं। इससे बच्चों में आत्मनिर्भरता के गुण नहीं आते और न ही वो जिम्मेदारी समझ पाते हैं।
बच्चों के फैसले खुद लेना
पेरेंट्स बच्चों के जीवन से जुड़े हर छोटे-बड़े फैसले लेने लगते हैं, फिर चाहे वो कोई सब्जेक्ट चुनना हो, स्पोर्ट्स चुनना हो या दोस्तों का चुनाव करना हो। इससे बच्चों में अपने जीवन के फैसले लेने की समझ विकसित नहीं हो पाती।
