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    डेवलपमेंटल डिस्ऑर्डर: उम्मीदें नहीं हुई हैं खत्म

    By Srishti VermaEdited By:
    Updated: Wed, 12 Apr 2017 12:57 PM (IST)

    हाल ही में देखा गया है कि बच्चों में डेवलपमेंटल डिस्ऑर्डर काफी बढ़ते जा रहे हैं और इनका फिजियो या ऑक्युपेशनल थेरेपी के अलावा कुछ समुचित इलाज भी मौजूद न ...और पढ़ें

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    डेवलपमेंटल डिस्ऑर्डर: उम्मीदें नहीं हुई हैं खत्म

    आटोलोगस बोन मेरो सेल ट्रांसप्लांट ने बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास से संबंधित रोगों (डेवलपमेंटल डिस्ऑर्डर) के इलाज में संभावनाओं और राहत के नए दरवाजे खोल दिए हैं। आइए जानते हैं कि बच्चों के इन रोगों के इलाज में सेल ट्रांसप्लांट के नतीजे क्या रहे हैं ...?

    बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास ही उनके जीवनभर की क्षमताओं की नींव रखता है। इसलिए उनमें आयी किसी भी प्रकार की कमी उनके लिए बहुत गंभीर हो सकती है। हाल ही में देखा गया है कि बच्चों में डेवलपमेंटल डिस्ऑर्डर काफी बढ़ते जा रहे हैं और इनका फिजियो या ऑक्युपेशनल थेरेपी के अलावा कुछ समुचित इलाज भी मौजूद नहीं है।

    रोगों की गंभीरता

    विशेषकर इस प्रकार के रोगों में आटिज्म, सेरीब्रल पेल्सी और ग्लोबल डेवलपमेन्टल डिले (समझ-विकास की कमी) को शामिल किया जाता है। आटिज्म एक सीरियस डेवलपमेंटल डिस्आर्डर है। 68 में से एक बच्चा इससे प्रभावित होता है। इन बच्चों में बोलने, समझने और घुलने-मिलने (सोशलाइजेशन) का अभाव होता है। चूंकि ऐसे बच्चों को अक्सर फिजियोथेरेपी से समुचित फायदा नहीं होता है, ऐसे में आटोलोगस बोन मेरो सेल ट्रांसप्लांट एक अच्छे इलाज के विकल्प के रूप में उपलब्ध है। लगभग 80 प्रतिशत बच्चों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट द्वारा 2 साल में 35 से 40 प्रतिशत का सुधार आया है।

    हालत में हुआ सुधार

    भारतीय मूल का एक अमेरिकी बच्चा हरमीत सिंह लगभग 4 वर्ष का होने के बाद भी, न तो बोलता था और न ही किसी से आंख मिलाता था। इस प्रकार से वह अपनी ही दुनिया में खोया रहता था।

    अमेरिका जैसे विकसित देशों में इस प्रकार की बीमारियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है, इसलिए डॉक्टरों ने वहां लगभग 2 साल की उम्र पर ही बता दिया था कि यह बच्चा स्पीच डिले और ऑटिस्टिक स्पेक्ट्रम डिस्आर्डर से पीड़ित है और इसका इलाज स्पीच थेरेपी और ऑक्युपेशनल थेरेपी द्वारा ही संभव है। लेकिन जब सभी प्रकार की थेरेपी कराने के बाद भी 2 साल बीत गए और बच्चे ने बोलना शुरू नहीं किया, तब माता-पिता चिंतित हुए। उन्होंने अन्य नए इलाजों में दिलचस्पी दिखाई और उन्हें मालूम हुआ कि आटोलोगस बोन मेरो सेल ट्रांसप्लांट द्वारा कई बच्चों में सुधार आया है। उन्होंने मुंबई में मुझसे संपर्क किया और एक महीने में 3 सेशन लेकर अमेरिका लौट गए, लेकिन महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि बच्चे ने 30 दिनों में ही लगभग 8-10 शब्द बोलने शुरू कर दिए और साथ ही उसने अपने आसपास के परिवेश में रुचि लेना शुरू कर दिया।

    कब और कैसे पहचानें डेवलपमेंटल डिले

    जब बच्चा अपनी उम्र के हिसाब से उठने, बैठने, बोलने, सोचने और समझने में साधारण बच्चों से पीछे हो, तो यह डेवलपमेंटल डिले और उससे जुड़े रोगों के शुरुआती लक्षण हंै। ये लक्षण ज्यादातर

    मामलों में 2 साल की उम्र के भीतर ही मालूम हो जाते हैं। क्या जांच कराएं बाल रोग विशेषज्ञ जरूरत पड़ने पर निम्न जांच करा सकते हैं ...

    -एमआरआई ब्रेन

    -आईक्यू और डी क्यू

    -सीएआर स्कोर

    -जेनेटिक टेस्टिंग

    डेवलपमेंटल डिले के कारण 

    -मुख्यत: विकास में धीमी गति किसी रोग के लक्षण के रूप में रहती है, जिनमें प्रमुख तौर पर ऑटिस्टिक स्पेक्ट्रम डिस्आर्डर (संवाद और समझने की कमी), सेरीब्रल पेल्सी, डाउन सिंड्रोम (एक जीन विकृति) और मस्कुलर डिस्ट्राफी (मांसपेशियों का क्षय) आते हैं। ’

    -कई बार गर्भवती महिला के एल्कोहल सेवन से भी डेवलपमेंटल डिले हो जाता है। ’

    -समय से पहले पैदा होने वाले और जन्म के समय कम वजन वाले बच्चों में भी यह समस्या पायी जाती है।

    कैसे बचें इस समस्या से

    85 प्रतिशत बच्चों में इस रोग का कारण मालूम नहीं हो पाता है। फिर भी निम्न सावधानियां इस गंभीर रोग से बचा सकती हैं .... ’

    -गर्भवती महिलाएं शराब या अल्कोहलिक डिंक का सेवन न करें। 

    -गर्भवती महिलाएं स्मोकिंग या हुक्का से परहेज करें और दूषित वातावरण से बचें। विशेष तौर पर केमिकल इंडस्ट्री में कार्यरत महिलाएं केमिकल टॉक्सिन से बचें। 

    -कम वजन का बच्चा पैदा होने का कारण मां का कुपोषण हो सकता है। इसलिए पौष्टिकआहार लें। 

    -निकट की रिश्तेदारी में विवाह से बचें ताकि जेनेटिक या जीन विकृति रोग की संभावना कम हो जाए।

    -गर्भवती महिलाएं वायरस से होने वाली बीमारियों से बचने के लिए टीका अवश्य लगवाएं।

    इलाज की उपलब्धि

    चूंकि इस पद्धति में मरीज के ही बोन मेरो (अस्थि मज्जा) का प्रयोग होता है। इसलिए यह इलाज लगभग सभी बड़े अस्पतालों में मौजूद है और इसमें प्रयोग होने वाली किट भी भारतीय ड्रग कंट्रोलर जनरल और अमेरिकन फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) से मान्यता प्राप्त है।

    -डॉ.बी.एस. राजपूत, स्टेम सेल ट्रांसप्लांट सर्जन क्रिटीकेयर हॉस्पिटल, जुहू, मुंबई 

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