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    बच्चों को चिड़चिड़ा और गुस्सैल बना रहा स्मार्टफोन, हर मां-बाप को जाननी चाहिए एक्सपर्ट की यह चेतावनी

    Updated: Mon, 17 Mar 2025 01:54 PM (IST)

    आजकल बच्चों के लिए स्मार्टफोन उनकी जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन गया है लेकिन इसका ज्यादा इस्तेमाल उनके लिए काफी नुकसानदेह साबित हो रहा है। डॉ. एकांश शर्मा के अनुसार स्मार्टफोन बच्चों को गुस्सैल और चिड़चिड़ा बना रहा है और कई तरह की मानसिक बीमारियां भी दे रहा है। आइए जानें ज्यादा स्क्रीन देखने से बच्चों को क्या कुछ परेशानियां हो रही हैं।

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    बच्चों के कोमल मन पर गहरा असर छोड़ता है स्मार्टफोन (Image Source: Freepik)

    डॉ. एकांश शर्मा, नई दिल्ली। सब परेशानियों की जड़ है ये मोबाइल फोन। सारा दिन इसी में बीतेगा तो खेलने-कूदने के लिए कब समय मिलेगा?’ पांच साल की प्रीतिका की मम्मी ने नाराज होते हुए जब यह बात कही तो उन्हें अपनी मम्मी का कहा यही संवाद याद आया। समय बचाने व जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए आया और हर दिन स्मार्ट होता स्मार्टफोन आखिर कब सब परेशानियों की वजह बन गया, पता ही नहीं चला।

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    आज के दौर में कम्युनिकेशन और तरह-तरह की जानकारियों को हासिल करने के लिए मोबाइल डिवाइसेज की अनिवार्यता बढ़ गई है। मगर स्मार्टफोन के जरिए कब बच्चों के दिमाग में तमाम खतरनाक बीमारियां इंस्टॉल हो चुकी हैं, यह माता-पिता समझ ही नहीं पा रहे। स्मार्टफोन के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल के चलते बच्चों के विकास और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।

    बढ़ रही हैं चिंताएं

    प्रीतिका को हर दूसरे दिन एक नया खिलौना चाहिए, पढ़ाई के लिए लगातार एक घंटा भी उसको रोककर रख पाना मुश्किल होता है। लिखते-लिखते कब अचानक उसे कोई मीम याद आ जाता है तो कभी दादी की कही बात, मना करो तो गुस्सा इतना कि फिर उसको रोक पाना मुश्किल होता है। दरअसल यह स्मार्टफोन के अत्यधिक और अविवेकपूर्ण प्रयोग के चलते आने वाली समस्याओं में से एक है, न्यूरो डेवलपमेंट डिसआर्डर के रूप में इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ रहा है।

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    कई अध्ययन बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम के चलते बच्चों में चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी के साथ-साथ सेंसरी ओवरलोड की आशंका बढ़ रही है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के अनुसार, कई सारे एडीएचडी प्रभावित बच्चों को भावनाओं के आवेग को नियंत्रित करने और एकाग्रता में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मोबाइल डिवाइसेज के ज्यादा यूज और इसमें ध्यान भटकाने वाले गुणों के चलते यह समस्या और भी गंभीर हो रही है। खासकर, आटिज्म और एडीएचडी (अटेंशन-डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर) जैसे न्यूरो विकार को लेकर अभिभावकों, शिक्षकों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ रही हैं।

    सोशल स्किल्स पर पड़ रहा असर

    संभव है कि ऐसे बच्चों का ऑनलाइन कम्युनिकेशन बेहतर हो, पर आमने-सामने की बातचीत में उन्हें परेशानी आ सकती है। स्मार्टफोन पर अत्यधिक निर्भरता के चलते सामाजिक कौशल के विकास में व्यवधान आ सकता है। इससे वास्तविक दुनिया के व्यक्तिगत संबंध भी प्रभावित हो सकते हैं। मोबाइल फोन के प्रयोग से होने वाली मानसिक सेहत की परेशानी न्यूरो डेवलपमेंट डिसआर्डर तक पहुंच सकती है।

    इसके अलावा आटिज्म प्रभावित बच्चों को भी मोबाइल फोन के अधिक प्रयोग के चलते सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। साक्ष्य बताते हैं कि एडीएचडी और आटिज्म प्रभावित बच्चे इंटरनेट मीडिया पर गतिविधियों के दौरान अधिक दबाव महसूस करते हैं। वे अक्सर अकेलापन या दोस्तों के बीच अलगाव महसूस करने लगते हैं। उदाहरण के तौर पर लाइक्स और शेयर के जरिए तुरंत फीडबैक और वैलिडेशन पाने की चाहत एंजाइटी और डिप्रेशन की समस्या बढ़ा सकती है। खासकर जो किशोर पहले से किसी समस्या से जूझ रहे होते हैं, उनकी समस्या और भी बढ़ सकती है।

    सही संतुलन बनाना है जरूरी

    ऐसी स्थिति में माता-पिता को जागरूक होने के साथ अपने बच्चों की स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए। तकनीक के प्रयोग के लिए तय सीमा स्वस्थ आदतों के विकास में आवश्यक है। इसके अलावा अभिभावकों और शिक्षकों को यह भी समझना होगा कि स्मार्ट फोन का प्रयोग एक टूल के तौर पर होना चाहिए, ना कि बैसाखी की तरह। यह काम आप सही और यूजफुल एप्स के सिलेक्शन और ऑनलाइन और ऑफलाइन एक्टिविटीज के बीच सही बैलेंस बनाकर कर सकते हैं। बच्चों को आभासी दुनिया के बजाय वास्तविक दुनिया से जोड़ें। इससे न केवल उनमें इंटरपर्सनल स्किल का विकास होता है, बल्कि आत्मीयता और आत्म सम्मान की भावना भी मजबूत होती है। बच्चों के लिए ऐसा वातावरण तैयार करें, जिससे उनका  विकास और सशक्तिकरण होता है।

    • बच्चों को फिजिकल एक्टिविटीज में शामिल करें, क्योंकि यह अतिरिक्त ऊर्जा को बाहर निकालने में मदद करती है।
    • उन्हें ऐसे इनडोर गेम लाकर दें, जिनमें उनके दिमाग को ज्यादा काम करना पड़े। क्ले आर्ट, काइनेटिक सैंड किट, पजल जैसे खेल इसमें सहायक होते हैं।
    • लॉन्ग वीकेंड में घर पर समय बिताने के बजाय उन्हें आस-पास नेचर वाक पर ले जाएं।
    • बच्चों को गार्डनिंग में शामिल कर आप उन्हें प्रकृति के साथ सेहत का तोहफा दे सकते हैं। इससे बच्चे शांत और एकाग्र बनते हैं।
    • उन्हें किसी भी एक परफार्मेंस आर्ट जैसे डांस, जूडो, म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट आदि से जोड़ें।

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