कर्नाटक की धरती पर पनपी बेहद खूबसूरत कला है 'कसूती', खासियत जानकर आप भी कहेंगे 'वाह'
कर्नाटक की धरती पर पनपी कसूती हाथों से बुनकर बनाई गई एक ऐसी कला (Kasuti Embroidery) है जो सदियों से इस राज्य की पहचान रही है। काय मतलब हाथ और सूती मतलब सूत यानी हाथ से सूत बुनने की इस कला ने कर्नाटक की साड़ियों और चोलियों को एक अनूठा रूप दिया है। आइए इस आर्टिकल में इससे जुड़े कुछ खास फैक्ट्स पर नजर डालते हैं।

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कसूती कला (Kasuti Embroidery) का जन्म चालुक्य साम्राज्य के दौरान हुआ था। राजाओं और रानियों ने इस कला को संरक्षण दिया और इसे दरबारों में प्रोत्साहित किया। इस प्रकार कसूती कला न सिर्फ कर्नाटक की संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन गई, बल्कि भारतीय हस्तशिल्प (Indian Embroidery) का भी एक जरूरी हिस्सा बन गई। कसूती में कई तरह के पैटर्न होते हैं, जैसे 'मरुआ' जो अपनी बारीक नक्काशी के लिए जाना जाता है, 'गंद बरोज' जो ज्यामितीय आकृतियों से बना होता है, और 'उद्दी' जो फूलों और पत्तियों के नाजुक डिजाइनों से भरा होता है। ये पैटर्न कर्नाटक की रंगोली से प्रेरित हैं और इनमें स्थानीय संस्कृति की झलक मिलती है।
महिलाएं संजो रही हैं परंपरा
17वीं सदी में मैसूर साम्राज्य के दौरान महिला कलाकारों ने कसूती को और अधिक लोकप्रिय बनाया। उन्होंने इस कला को अपनी रचनात्मकता से सजाया और इसे नए आयाम दिए। आज भी हुबली में सरकार द्वारा स्थापित कसूती केंद्र में महिलाएं इस पारंपरिक कला को सीख रही हैं और इसे जीवित रखने का प्रयास कर रही हैं।
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सिर्फ साड़ी नहीं, बहुत कुछ
आजकल कसूती का इस्तेमाल केवल साड़ियों और चोलियों तक ही सीमित नहीं है। इसे दुपट्टे, बैग, और यहां तक कि घर की सजावट के सामान पर भी इस्तेमाल किया जा रहा है। फैशन डिजाइनर कसूती को आधुनिक डिजाइनों में शामिल कर रहे हैं और इसे युवाओं के बीच लोकप्रिय बना रहे हैं।
कसूती सिर्फ एक कला नहीं है, बल्कि यह कर्नाटक की संस्कृति और परंपरा का एक अहम हिस्सा है। यह कलाकारों के लिए रोजगार का एक साधन भी है। सरकार और गैर-सरकारी संगठन मिलकर कसूती कला को बचाने और बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास कर रहे हैं।
मशीन नहीं, बल्कि कलाकार के हाथों का जादू
इस कढ़ाई को पूरी तरह से हाथ से बनाया गया है। इसका मतलब है कि किसी मशीन का इस्तेमाल नहीं किया गया, बल्कि एक कलाकार ने इसे अपने हाथों से धागे और सुई से बनाया है। इस कढ़ाई में लगभग 5000 बहुत छोटे-छोटे टांके लगाए गए हैं। ये टांके इतने छोटे और बारीक होते हैं कि इन्हें लगाने के लिए कलाकार को बहुत ही कुशल और अनुभवी होना चाहिए।
हर एक टांका इस कढ़ाई को और भी खूबसूरत बनाता है। जब हजारों ऐसे टांके एक साथ जुड़ते हैं तो एक बहुत ही खास और मन को मोह लेने वाली कलाकृति बनती है। यानी, इस कढ़ाई को बनाने में बहुत मेहनत और कलाकारी का काम लगा है।
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