क्या 31 अक्टूबर की रात धरती पर लौटती हैं आत्माएं? बहुत दिलचस्प है हैलोवीन से जुड़ी ये 2000 साल पुरानी कहानी
हर साल 31 अक्टूबर को मनाया जाने वाला हैलोवीन, प्राचीन केल्टिक सभ्यता के सामहिन त्योहार से जुड़ा है।

क्या है हैलोवीन की शुरुआत की कहानी? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हर साल 31 अक्टूबर को हैलोवीन मनाया जाता है। ये दूसरे त्योहारों से बिल्कुल अलग होता है, क्योंकि इसमें लोग भूतों की तरह या डरावने किरदारों की तरह तैयार होते हैं, अपने घरों को भी कंकालों, कद्दू और मकड़ी के जालों से सजाते हैं और साथ मिलकर पार्टी करते हैं।
बच्चों के लिए ये ट्रिक ऑर ट्रीट का मौका होता है, जब वो घर-घर जाकर कैंडीज मांगते हैं। हालांकि, पश्चिमी सभ्यता में मशहूर ये त्योहार अब भारत में भी अपनी जगह बना चुका है और कई बड़े शहरों में हैलोवीन पार्टी का आयोजन किया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि लोग ये त्योहार क्यों मनाते हैं?
लोग क्यों जानबूझकर अपने घरों को डरावने कंकालों से सजाते हैं, कद्दू पर डरावने चेहरे उकेरे जाते हैं और क्यों डरावना मेकअप करके बाहर निकलते हैं? दरअसल, इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी छिपी है। आइए जानें इसके बारे में।
सामहिन त्योहार से हुई शुरुआत
माना जाता है कि हैलोवीन की जड़ें प्राचीन केल्टिक सभ्यता से जुड़ी हुई हैं, जो आयरलैंड, यूनाइटेड किंगडम और नॉर्थ फ्रांस में रहा करती थी। केल्टिक लोग एक नवंबर को अपना नया साल मनाते थे और इस दिन को गर्मियों के अंत और सर्दियों की शुरुआत के प्रतीक की तरह देखा जाता था।
सर्दी का मौसम अंधेरे और मौत से जुड़ी होती थी। इसलिए वो मानते थे कि 31 अक्टूबर की रात को जीवित और मृत लोगों की दुनिया के बीच की दीवार धुंधली हो जाती है और इस रात भूत-प्रेत और आत्माएं धरती पर लौटती हैं। इस दिन को सोविन कहा जाता था।
डरावने कपड़े और आग जलाने की परंपरा
केल्टिक लोगों का मानना था कि जब आत्माएं धरती पर आती हैं, तो वे फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं और जीवित लोगों को परेशान कर सकती हैं। इन बुरी आत्माओं से बचने के लिए और उन्हें कन्फ्यूज करने के लिए लोग जानवरों की खाल और डरावने मुखौटे पहनते थे, ताकि आत्माएं उन्हें अपना साथी समझें।
इस रात लोग इकट्ठा होकर बॉनफायर जलाते थे और लोग इस आग में फसलों और जानवरों का बलि देते थे, ताकि देवता उनसे प्रसन्न रहें और सर्दी के मौसम में उनकी रक्षा करें।
ईसाई धर्म का प्रभाव और 'हैलोवीन' नाम
लगभग 8वीं शताब्दी के आसपास, ईसाई धर्म का प्रसार होने लगा और कैथोलिक चर्च ने इस केल्टिक त्योहार को अपने तरीके से ढालने की कोशिश की। संतों को सम्मानित करने के लिए एक नवंबर को ऑल सेंट्स डे या ऑल हैलोज मनाया जाने लगा और इसके पहले की शाम यानी 31 अक्टूबर की शाम को ऑल हैलोज ईव कहा जाने लगा।
समय के साथ ये नाम बिगड़कर हैलोवीन बन गया। केल्टिक लोगों के सोविन के साथ मिलकर ये हैलोवीन का त्योहार बना, जिसे आज भी लोग बड़े जोश के साथ मनाते हैं।
जैक-ओ-लैंटर्न की परंपरा
हैलोवीन पर नक्काशी किए गए कद्दू के अंदर मोमबत्ती जलाना सबसे मशहूर परंपराओं में से एक है, जिसे जैक-ओ-लैंटर्न कहा जाता है। इसकी कहानी है कि आयरिश लोग बुरी आत्माओं को डराने के लिए शलजम और आलू में डरावने चेहरे बनाकर उनमें मोमबत्ती रखते थे।
जब 19वीं शताब्दी में आयरिश लोग अमेरिका पहुंचे, तो उन्हें वहां आसानी से कद्दू मिले और उन्होंने उसमें डरावने चेहरे बनाकर मोमबत्ती रखना शुरू कर दिया। इस तरह हैलोवीन पर जैक-ओ-लैंटर्न की परंपरा शुरू हुई।
