क्लबिंग नहीं, अब 'भजन नाइट्स' का है जमाना, जानें क्यों ढोलक और मंजीरों की थाप पर झूम रही है नई पीढ़ी?
आजकल नई पीढ़ी के बीच वीकेंड पर किसी क्लब या पार्टी में जाने के बजाय 'कीर्तन और भजन नाइट्स' में जाने का चलन तेजी से बढ़ा है। आखिर भौतिक सुख-सुविधाओं से ...और पढ़ें

युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय होती 'कीर्तन और भजन नाइट्स' (Image Source: AI-Generated)
मालिनी अवस्थी, नई दिल्ली। नई पीढ़ी के बीच तेजी से उभर रहा है कीर्तन और भजन नाइट्स का चलन। क्या है इसके पीछे का कारण, बता रही हैं मालिनी अवस्थी...
"नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।।"
भगवान कहते है कि हे नारद! मैं न तो बैकुंठ में ही रहता हूं और न योगियों के हृदय में ही रहता हूं। मैं तो वहीं रहता हूं, जहां प्रेमाकुल होकर मेरे भक्त मेरे नाम का कीर्तन किया करते हैं। मैं सर्वदा लोगों के अन्तःकरण में विद्यमान रहता हूं!

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पिछले सप्ताह लखनऊ में गोमती के तट पर निर्मित दिव्य हनुमान मंदिर गई। हनुमान चालीसा का मंद स्वर में पाठ सुनते हुए हनुमान जी की विराट छवि दर्शन कर जैसे ही आगे बढ़ी, ऊंचे स्वर में सामूहिक स्वर कान में पड़ा "राम सीता राम जय जय राम सिया राम" मेरे सामने बारह पंद्रह युवाओं की टोली आनंद में डूबी हुई राम सिया राम दोहराती जा रही थी। आंखें बंद, चेहरे पर अलग मुस्कान, शांत भाव, लयबद्ध हाथों की अनुशासित तालियां। हनुमान जी की मूर्ति के सामने हारमोनियम लिए एक लड़का कीर्तन गा रहा है और उसके साथ उसी भाव में रमे बाकी लड़के। आधे घंटे के बाद जब वे उठने लगे, मैं उनके पास जाकर प्रशंसा करते हुए पूछ बैठी, यह कीर्तन का कोई समूह है। और इससे कब से जुड़े हो। दो लड़के हंसते कुछ शर्माते हुए बोले, हम लोग लगभग 30 लोग हैं। शुरुआत में हम चार दोस्तों ने शुरू किया अब दायरा बढ़ता जा रहा है। हममें से कुछ अभी प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे हैं, कुछ रिसर्च में हैं, दो तीन लोगों का विवाह हो चुका है। हम कीर्तन के लिए सप्ताह में एक बार तो बैठते ही हैं। मैने पूछा, मंदिर में? उसका उत्तर आया। नहीं। घर में बाहर कहीं भी। बस हमे बैठने की देर है कीर्तन जम जाता है। मैने दूसरे से पूछा। कैसा लगता है? वह बोला, अरे हम तो इंतजार करते हैं कि अगली बार कब कीर्तन की बैठकी जमेगी। हम सब एक साथ गाते बजाते हैं। कीर्तन समाप्त होता है तो ऐसा लगता है जैसे मन के सारे विकार निकल गए। मन शांत हो जाता है। सारी थकन उड़न छू। दूसरा बोला, "दीदी, अमेरिका में तो योग केंद्र अमेरिका में योग केंद्रों में, या किसी कम्युनिटी सेंटर में लोग कुछ वाद्ययंत्रों, आमतौर पर गिटार और तबले के साथ इकट्ठा होते हैं और कीर्तन गाते हैं। यह आजकल सब जगह चल रहा है। भगवान के नाम का जाप"
मैं सोचने लगी, भारत की आत्मा भारत की संस्कृति है, वह संस्कृति जो सामूहिकता में जीती है और जिसके केंद्र में आनंद हैं आध्यात्मिक सुख है। इन युवाओं को बजाते देख मेरा रोम रोम प्रफुल्लित हो उठा और आज इस विषय पर लिखने से खुद को रोक नहीं सकी।
आज की पीढ़ी भौतिक सुख का चरम जी रही है, हर भौतिक सुख को देख रही है और पाने के लिए यत्न कर रही है। वह सब धन संसाधन, जो कभी उनके माता पिता और उनके पूर्वजों के लिए अलभ्य था, आज वे उससे आगे जा चुके है। स्वतंत्रता सभी बंधन तोड़ निरंकुश हो चली है, छूने को आकाश है और बंधन कोई नहीं। यहां भी और परदेस में भी युवाओं के मध्य बढ़ता कीर्तन का प्रचलन का कारण क्या है।
क्या यह भौतिकवाद का चरम है जो युवाओं को पुनः भक्ति मार्ग की ओर ला रहा है। क्या यह एकाकीपन है जो पुनः सामाजिक बंधन में स्वर में स्वर मिलाने में सुख ढूंढ रहा है। क्या यही कारण है कि दुनिया भर में अलग अलग देशों, अलग अलग शहरों में समूहों द्वारा कीर्तन नाइट्स का आयोजन हो रहा है? कीर्तन परंपरा का यह आधुनिकरण चकित करने वाला है लेकिन जो भी हो, कीर्तन का यह नवप्रचलन मन को भा रहा है। समाज के विघटन से उपजे एकांत को हरने का यह ब्रह्मनाद सुखद लग रहा है। कीर्तन में ऐसी कौन सी शक्ति है जो हमें परमानंद की स्थिति तक ले जाती है।

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हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥
ढोलक झांझ मंजीरे की तेज लय में गूंजते मंत्र से स्वर सुन किसका मन श्रद्धा में न भीग जाए। कीर्तन भक्तों की आस्था में डूबी सामूहिक प्रार्थना है जिसमें सामूहिकता का स्वर अपने प्रभु में एकाकार हो जाता है। कीर्तन परंपरा भारत की सबसे सुंदर भक्ति परम्परा है। जब कीर्तन का सुर उठता है, प्रभु दर्शन के उत्साह में, अपने इष्ट की भक्ति में डूबते हुए, उतरते हुए स्वरों से ऐसी ऊर्जा प्रस्फुटित होती है जिसमें रोम रोम झूम उठता है।
भगवान का नाम लेना सुर लय ताल में लेना, संग साथ के साथ सुर मिला कर भगवान के गुन गाना, एक अलौकिक अनुभव है। कीर्तन एक आध्यात्मिक अनुभव है जिसमें मनुष्य अपना दुख सुख सब भूल कर प्रभु में लीन हो जाता है।
पहले हर मंदिर में कीर्तन की परम्परा थी। कुछ भक्त जो गायन वादन में निपुण थे, प्रतिदिन प्रभु सेवा में भजन करते थे। इसे प्रभु सेवा ही कहा जाता है और पुराने मंदिरों में आज भी यह परंपरा जारी है। भक्त मंडली भी मंदिरों में भगवान के सामने बैठकर ढोलक हारमोनियम करताल मंजीरा लेकर भक्ति पद गाती थी, श्रद्धालु साथ बैठ कर सुर लय साथ मिलाकर भक्ति में डूब जाते थे। दिन भर के थके हारे लोग कीर्तन में अपना स्वर मिलाने मंदिर पहुंचते थे, और प्रभु भक्ति में लीन हो जाते थे। बीच में कीर्तन की परम्परा का ह्रास हुआ लेकिन आज पुनः मंदिरों में कीर्तन उसी ओज से गूंजने लगे हैं।
हमारे यहां घरों में भी कीर्तन की परम्परा रही है। बड़े परिवार होते थे, हर शुभ काम पर, जन्माष्टमी रामनवमी, शिव रात्रि पर, नवरात्र पर, घर के बड़े लोग कीर्तन करते, बच्चे भी शामिल होते और आस पड़ोसी सभी। मुझे याद है, हमारे गोरखपुर के घर में पड़ोसी उपाध्याय जी थे, उनके यहां संयुक्त परिवार था। हर पंद्रह दिन में एक बार उनके घर दस बीस लोग एक साथ बैठ कर गाते बजाते। मैं उस समय गायन का प्रशिक्षण ले रही थी, मेरे अबोध मन में यह प्रश्न उमड़ता कि कन्हैया का भजन यहां कितना अच्छा लग रहा है, मैं तो वैसा नहीं गा पाती। मैं उस समय बालिका थी, लेकिन कीर्तन की प्राणशक्ति को समझ रही थी।
आज जब परिवार छोटे हो गए हैं, सभी नौकरी की तलाश में घर से दूर जा बसे हैं। क्या लड़के और क्या लड़कियां सबके जीवन में काम ही काम है, काम का तनाव है और इस तनाव को बांटने वाला कोई नहीं। सब कुछ पाकर भी यह अकेलापन और शायद इसी अकेलेपन से फिर समूह में खो जाने का विचार निकला है और उसकी परिणिति है कीर्तन नाइट्स!
काम से थक कर लौटते कदम घर को नहीं, किसी कीर्तन की बैठकी की ओर चल पड़ते हैं। कुछ जान पहचान के कुछ अनजान सभी मिल कर कृष्ण को जप रहे हैं, राम को सुमिर रहे हैं। तेज आवाज में गाते झूमते नाचते युवा आह्लाद में एकाकार हैं। तनाव भूलते हुए, कुंठाएं गलाते हुए, अहंकार को तोड़ते हुए एक साथ एक गति एक लय में प्रभु का सुमिरन कर रहे हैं यही तो कीर्तन है।
कीर्तन नाइट्स आज का सत्य है
कीर्तन संगीतमय पूजन है। सामूहिक भक्ति का ऐसा अदभुत स्वरूप है जिसमें गायन वादन नृत्य तीनों एक हो जाते हैं। इसके प्रवर्त्तक देवर्षि नारद थे। कीर्तन के माध्यम से ही प्रह्लाद, अजामिल आदि ने परम पद प्राप्त किया था। मीराबाई, नरसी मेहता तुकाराम आदि संत भी इसी परंपरा के अनुयायी थे। कीर्तन परंपरा का चरम उत्कर्ष महाप्रभु चैतन्य के समय में ही हुआ। कृष्ण नाम के आधार बनाकर 'मृदंग' अथवा 'करताल' के ताल पर भक्तिपूर्ण गीतों के गायन के साथ भावोन्मत्त होकर नृत्य करना इसकी विशेषता बन गई। चैतन्य महाप्रभु का अमिट प्रभाव बंगाल उड़ीसा असम पूर्वोत्तर भारत में पड़ा। उन्होंने भगवान का गुणगान करने के लिए मंदिर में शारीरिक उपस्थिति की अनिवार्यता को अस्वीकार करते हुए, सम्पूर्ण संसार को कृष्णमय माना, प्रभु का कीर्तन कहीं भी कभी भी किया जा सकता है। उन्होंने देह को गतिमय नृत्य में समर्पित कर देना मनुष्य के आनंद की चरम अवस्था और प्रभु भक्ति का चरमोत्कर्ष माना। इस्कॉन ने तो कीर्तन को महामंत्र मानते हुए "हरे राम हरे कृष्णा" को ही अपनाया। वे सभी चैतन्य महाप्रभु का अनुकरण करते प्रभु का नाम लेते हुए रास्ते में गाते बजाते नाचते चलते हैं। महाराष्ट्र में मराठी संकीर्तन की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा है, जिसमें कथा गायन, नृत्य और अभिनय के माध्यम से ईश्वर की स्तुति की जाती है, प्रायः भगवान कृष्ण, विठोबा, ज्ञानेश्वर, नामदेव और तुकाराम जैसे संतों की शिक्षाओं और लीलाओं पर केंद्रित है संकीर्तन।
सम्भवतः इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने कहा था,
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।।
मैं वहीं हूं जहां मेरे भक्त गाते हैं, भक्तिरस में विभोर भजन कीर्तन प्रभु को पाने का सर्वोच्च मार्ग है, ऐसा स्वयं प्रभु नारद से कह रहे हैं। इसीलिए कीर्तन प्रभु मार्ग का सुगम और सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।
गोविंदा नहीं गाया तो क्या गाया रे बावरे गोविंदा गोविंदा गोविंदा!
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