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    तापमान ने मारी छलांग, पारा हुआ 45 के पार, जानें क्या है भीषण गर्मी की वजह

    Updated: Sun, 26 May 2024 06:47 AM (IST)

    भारत के मैदानी इलाकों में तापमान बर्दाश्त से बाहर हो रहा है तो वहीं पहाड़ी इलाकों में भी स्थिति कोई बेहतर नहीं है। एक तरफ प्रचंड गर्मी से शहरों में तथा राजमार्गों पर दौड़ते वाहन अचानक ही धू-धूकर जलने लग रहे हैं जेनरेटर फट रहे हैं तो वहीं पहाड़ों के जंगलों में आग लगने की घटनाएं हो रही हैं। यह चौंकने से ज्यादा जागने की बात है।

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    जानें क्यों प्रचंड रूप ले रही गर्मी (Picture Credit- Freepik)

    नई दिल्ली, अनिल प्रकाश जोशी (पद्म भूषण सम्मानित प्रख्यात पर्यावरण कार्यकर्ता)। अब हमने जिस तरह की जीवनशैली अपना ली है, उससे जो अंततः होना था, वो ही प्रत्यक्ष नजर आ रहा है। अल निनो या ला नीना जो कि विज्ञानी भाषा में मौसम के व्यवहार के लिए उपयोग में आते हैं, वो समझ में कुछ आता हो या ना आता हो, लेकिन इस बार जिस तरह से प्रचंड गर्मी ने हालात पैदा किए हैं, उसने कुछ जरूर सिखा दिया होगा।

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    अब हिमालय से लेकर मैदानी इलाकों तक गर्मी की मार साफ दिखाई देती है। पहाड़ों में भी 38-40 डिग्री सेंटिग्रेड का तापमान और मैदानों में 45 डिग्री सेंटिग्रेड से ऊपर पारे की उछाल हमें परेशान तो करती ही है, परंतु यह मात्र गर्मी ही नहीं है, जो हमें झेलनी है। आने वाले समय में ये ही पानी की बड़ी मारकाट को भी जन्म देगी। इतना ही नहीं, वायु प्रदूषण भी इस गर्मी से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। बढ़ती गर्मी हमें एक तरफ एसी, कूलर चलाने के लिए मजबूर कर देती है, तो वहीं इनसे बाहर के वातावरण में प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

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    सुलग रहे हैं जंगल

    सबसे बड़ी बात यह है कि जंगल जो राहत देते थे, वो भी बढ़ती गर्मी के कारण आग पकड़ रहे हैं। उत्तराखंड का ही उदाहरण ले लीजिए। इस बार फिर वही हुआ, जो लगातार कई सालों से हो रहा है। सैकड़ों हेक्टेयर जंगल राख हो गए और उसका सीधा कारण यही था कि प्रचंड गर्मी ने छुटपुट आग की घटना को दावानल बना दिया। नमी के अभाव ने उत्तराखंड के वनों को एक बार फिर आग में झोंक दिया। गर्मी से कई तरह के अन्य दुष्प्रभाव भी जुड़े होते हैं। शरीर का सीधा नुकसान तो होगा ही, साथ में डायरिया, डेंगू व कई तरह की बीमारियां भी लपेटे में लेंगी।

    गर्मी, क्या पावर और क्या टावर, सबको जमीन दिखा देती है। अत्यधिक गर्मी से पारिस्थितिकी तंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। वर्षाजनित नदियों का सूखना, धारों का खत्म होना, वनों की नवजात वनस्पति प्रजातियों का नुकसान भी इससे जुड़ा होता है। आज पारिस्थितिकी तंत्र या बिगड़ते पर्यावरण के लिए हमारे पास आर्थिकी की तर्ज में कोई पारिस्थितिकी पैकेज नहीं है। हर संकट के बाद दुश्वारियां भुला दी जाती हैं। बावजूद इसके कि गर्मी सबको रुला देती है।

    हाथ से छूटा नियंत्रण

    अब इसी बीते सप्ताह दिल्ली-एनसीआर की घटनाएं देखिए। खड़ी गाड़ियों में अगर आग लग जाती हो, डीजल के जेनरेटर फटकर बम बन जाते हों, तो भी कुछ समझ न सकना हमारी मूढ़ता की तरफ ही इशारा करता है। मौसम हमारे नियंत्रण से पूरी तरह दूर जा चुका है, मगर हम अभी भी वही समाधान तलाश रहे हैं, जो हमेशा से करते चले गए l यथा हम गर्मी में एसी चला देते हैं और जाड़ों में हीटर। दरअसल, हमारा तंत्र प्रकृति के तंत्र से अलग हो चुका है। आइपीसीसी की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि हर दशक में 0.26 डिग्री सेंटिग्रेड तापमान बढ़ा है।

    दुनिया की तमाम संस्थाएं इस तरह के अध्ययनों में लगी हैं, लेकिन दुर्भाग्य है कि ये अध्ययन हमारी समझ से बाहर रहे और सबसे बड़ी बात है कि ये सरकारों की विकास की योजनाओं में भी कहीं नहीं झलकते हैं। परिस्थितियां यह हैं कि वर्ष 2030 तक 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड तापक्रम को कैप लगाने का जो निर्णय लिया गया था, वह अब बहुत दूर दिखाई देता है क्योंकि देश के कई इलाकों में तो 1.49 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान वृद्धि अभी से ही हमारे सामने है।

    हिमालय की हवा में कालिख

    मैदानी क्षेत्रों में बढ़ती गर्मियां पहाड़ों पर एक अलग किस्म का दबाव डालती हैं। लोग मैदान की बढ़ती गर्मी से व्याकुल होकर पहाड़ों की सैर को निकल पड़ते हैं। अब यह पहाड़ों पर भारी पड़ने लगा है। इस बार ही देख लीजिए। पहाड़ चाहे हिमाचल प्रदेश के हों या उत्तराखंड के या अन्य पहाड़ी राज्य हों, पर्यटकों की भीड़ जो चारधाम के लिए हो या अन्य पर्यटन के लिए, बड़ी संख्या में इकठ्ठी हो जाती है। जिद इतनी होती है कि प्रशासन ही हार जाता है।

    कल्पना कीजिए कि अगर पहाड़ी सड़कों में किसी भी तरह का ट्रैफिक जाम लगता है तो हजारों गाड़ियां लाइन से खड़ी होकर कार्बन उगलती हैं। हर एक घंटे में एक लीटर पेट्रोल करीब दो किलोग्राम कार्बन डाइआक्साइड से हिमालय की हवा को दूषित कर देता है, संख्या के हिसाब से शेष गणित आप लगा लीजिए। इसी प्रकार दिल्ली-एनसीआर की सड़कों में जिस तरह से जाम लगता है तो उन्हें खड़ी गाड़ियां मात्र न समझें। यह कार्बन यमदूत हैं।

    घना हो रहा मकड़जाल

    बढ़ती कार्बन सांद्रता के कारण ग्लोबल वार्मिंग किसी भी हालत में रुकनी संभव ही नहीं होगी। अभी हम प्रचंड गर्मी झेल रहे हैं। इसके तत्काल बाद हम वर्षा या बाढ़ की आपदाओं को झेलेंगे। इसके बाद जब शीतकाल आएगा तो तापक्रम वह नहीं होगा जो कि जाड़ों का अहसास दिलाता हो। वर्ष का कोई भी ऐसा समय नहीं बचा जिसमें हम स्वयं को पर्यावरण के रूप में सुरक्षित समझ सकें, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अभी बहुत कुछ हमारे हाथ में होते हुए भी हम उस ओर कुछ नहीं कर रहे हैं। जिस यूरोप को हम शीतोष्ण स्थितियों के लिए जानते थे, वहां भी परिस्थितियां हमारी तरह उष्ण हो चुकी हैं। पंखे व एसी अब लंदन में भी चलते हैं।

    सूखा और फसलों का नुकसान तो है ही, साथ में पानी की बढ़ती कमी बड़े संकट के रूप में हमारे बीच में है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक सब पानी के संकट से गुजर रहे हैं। पहाड़ जो पानी के लिए जाने जाते हैं, वहां भी गांव पानी के लिए तरसने शुरू हो चुके हैं। अब ऐसे में यह समझ बन जाए कि यह सब क्यों हो रहा है तो शायद हम में सुधार आए। आदतें और आराम हमें मार रहे हैं। हमने अपने लिए ऐसा जाल बना दिया है जो जान लेने में नहीं चूकेगा। यह जाल लगातार घना हो रहा है। इस मकड़जाल में फंसे हम मानव पृथ्वी के नहीं, केवल अपने अंत की तरफ चल चुके हैं!

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