प्रदूषण में सुबह टहलना पड़ सकता है भारी, नाक के रास्ते सीधे दिमाग पर हमला कर रहे हैं PM 2.5 के कण
वायु प्रदूषण अब केवल फेफड़ों को ही नहीं, बल्कि दिमाग को भी प्रभावित कर रहा है, जिससे डिमेंशिया का खतरा बढ़ रहा है।

दिमाग पर भी असर कर रहा वायु प्रदूषण (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। वायु प्रदूषण अब केवल फेफड़ों की बीमारी तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से डिमेंशिया यानी मनोभ्रंश का खतरा बढ़ रहा है। जो दिमाग की कार्यक्षमता और याददाश्त को प्रभावित कर रहा है। अल्जाइमर्स रिसर्च एंड थेरेपी-2026 में प्रकाशित समीक्षा में यह बात सामने आयी है।
इसमें वैश्विक स्तर पर 49 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया, जिसमें पीएम 2.5 की मात्रा प्रति घन मीटर एक माइक्रोग्राम बढ़ने पर डिमेंशिया का खतरा सात प्रतिशत अधिक पाया गया, हालांकि विशेषज्ञ इसे 14 प्रतिशत बताते हैं।
फेफड़ों के अलावा दूसरे अंगों पर भी असर
डॉ. जीसी खिलनानी चेयरमैन पल्मोनरी क्रिटिकल केयर एंड स्लीप मेडिसिन, पीएसआरआइ अस्पताल के अनुसार वायु प्रदूषण के संपर्क से डिमेंशिया का खतरा 14 प्रतिशत बढ़ने का संबंध सामने आया है। अति सूक्ष्म कण मस्तिष्क में सूजन बढ़ा सकते हैं। सूक्ष्म कण श्वसन तंत्र के अलावा शरीर के दूसरे अंगों को भी प्रभावित करते हैं। इससे वायु प्रदूषण का स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ रहा है। एन95 मास्क पहनें,
प्रदूषण में बाहर व्यायाम से बचें
डॉ. राजेश भारद्वाज के अनुसार प्रदूषण अधिक होने पर सही फिटिंग वाला एन95 मास्क पहनना, अधिक यातायात वाले समय में खुले में व्यायाम से बचना और नाक की सफाई के लिए सलाइन नेजल वाश का इस्तेमाल करना उपयोगी है। प्रो. जीसी खिलनानी के अनुसार वायु प्रदूषण अधिक होने पर बाहर रहने का समय कम रखना चाहिए। बुजुर्गों और हृदय या सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
नाक के रास्ते भी दिमाग तक पहुंच रहे प्रदूषक कण
दिल्ली मेडफर्स्ट ईएनटी सेंटर के संस्थापक डॉ. राजेश भारद्वाज के अनुसार नाक से मस्तिष्क तक जाने वाली घ्राण तंत्रिकाएं अतिसूक्ष्म प्रदूषक कणों के मस्तिष्क तक पहुंचने का मार्ग होती हैं। लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से शरीर में सूजन, आक्सीडेटिव स्ट्रेस और मस्तिष्क की प्रतिरक्षा कोशिकाओं की सक्रियता बढ़ने लगती है। इससे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और याददाश्त के प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। डॉ. राजेश भारद्वाज के अनुसार उनके क्लिनिक में कई मरीज ब्रेन फाग यानी सोचने-समझने में अस्पष्टता, सुस्ती, थकान और साइनस में जलन की शिकायत लेकर आते हैं। सर्दियों में इसका खतरा बढ़ जाता है।
