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क्या सिर्फ प्रोटीन सप्लीमेंट्स से बनती हैं मसल्स? एक्सपर्ट ने बताया बिना पैसे खर्च किए फिट रहने का तरीका

Published: Sun, 20 Sep 2026 12:33 PM (IST)

आजकल बाजार में महंगे विदेशी सुपरफूड्स और क्रैश डाइट का चलन तेजी से बढ़ा है, जिसे लोग सेहत की एकमात्र ...और पढ़ें

ग्रोसरी का भारी बिल नहीं, ये 4 पिलर्स तय करते हैं आपकी सेहत! (Image Source: AI-Generated)

ग्रोसरी का भारी बिल नहीं, ये 4 पिलर्स तय करते हैं आपकी सेहत! (Image Source: AI-Generated)

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आरती तिवारी, नई दिल्ली। आजकल वेलनेस इंडस्ट्री में एक अजीब सी होड़ मची है। इंटरनेट मीडिया के प्रभाव में लोग बिना सोचे-समझे केवल फल या केवल उबली सब्जियों वाली एक्सट्रीम डाइट शुरू कर देते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि किसी एक चीज को जरूरत से ज्यादा खाना और सिर्फ उसी चीज पर निर्भर हो जाना, दोनों में बड़ा अंतर है। फल और सब्जियां फाइबर, विटामिन्स, मिनरल्स और प्लांट कंपाउंड्स के लिए जरूरी हैं, लेकिन शरीर को सिर्फ एक फूड ग्रुप से नहीं चलाया जा सकता। हमारा शरीर एक जटिल मशीन है, जिसे ऊतकों की मरम्मत के लिए प्रोटीन, हार्मोन्स के संतुलन और सेल फंक्शन के लिए गुड फैट्स तथा ऊर्जा के लिए कार्बोहाइड्रेट्स की भी उतनी ही जरूरत होती है।

किसी योग्य विशेषज्ञ की सलाह के बिना हफ्तों तक केवल जूस या फल पर रहना शरीर को कुपोषित कर सकता है। इसलिए इंटरनेट मीडिया रील्स देखकर नहीं, बल्कि अपनी शारीरिक जरूरत के हिसाब से संतुलित और विविधता से भरपूर भोजन चुनें, जो आपके पेट के माइक्रोबायोम को भी स्वस्थ रखे। हमेशा खुद से पूछें कि आप इस डाइट से क्या ठीक करना चाहते हैं। क्या डाक्टर ने इसे किसी बीमारी के लिए कुछ समय के लिए लिखा है, या आप सिर्फ एक ट्रेंड के पीछे भाग रहे हैं?

स्थानीय उपज ही सर्वश्रेष्ठ है

ब्लूबेरी और एवोकाडो जैसे आयातित विदेशी फल इंस्टा रील्स में दिखने में अच्छे हो सकते हैं, लेकिन हमारे सेहतमंद रहने के लिए इनकी कोई मजबूरी नहीं है। हमारे आसपास मिलने वाले आंवला, अमरूद, पपीता, केला, जामुन, तरबूज, संतरा और मौसमी हरी सब्जियां पोषण का असली खजाना हैं। अगर आपका बजट कम है, तो स्थानीय और मौसमी फल-सब्जियां खरीदना कोई समझौता नहीं बल्कि सबसे समझदारी भरा फैसला है। दरअसल 'सुपरफूड' जैसी कोई वैज्ञानिक श्रेणी नहीं है, यह केवल मार्केटिंग का एक शब्द है जिसे आपको चीजें बेचने के लिए बनाया गया है। अलसी के बीज, तिल , कद्दू के बीज और मूंगफली में वह सब कुछ है जो महंगे विदेशी बीजों में मिलता है। अलसी से आपको फाइबर और ओमेगा-3 मिलता है, तिल से जरूरी मिनरल्स मिलते हैं और मूंगफली से प्रोटीन और अनसैचुरेटेड फैट मिलता है। स्थानीय खाना ताजा होता है और आपके पर्यावरण के अनुकूल होता है। जब आप स्थानीय चीजें खरीदते हैं, तो पैसा आपके अपने किसानों और स्थानीय खाद्य प्रणालियों में घूमता है। इसलिए वैश्विक खान-पान के पीछे भागने के बजाय अपनी संस्कृति, भूगोल और बजट से जुड़ें।

स्वास्थ्यकर है पारंपरिक पाक कला

भोजन को पकाने और तैयार करने का तरीका भी उतना ही मायने रखता है जितना कि उसे खरीदना। हमारे घरों में दालों, अनाज और बीजों को पकाने से पहले भिगोना, अंकुरित करना या खमीर उठाना (फरमेंट करना) बेहद पुरानी आदत है। यह पारंपरिक तरीका भोजन की पाचनशीलता को बढ़ाता है, गैस की समस्या को कम करता है और शरीर को पोषक तत्वों (जैसे मिनरल्स) को सोखने में मदद करता है। यदि आप महंगे विदेशी खाद्य पदार्थ जैसे क्विनोआ या चिया सीड्स खरीद सकते हैं तो शौक से खाइए, लेकिन यह भ्रम छोड़ दीजिए कि वे पोषण के मामले में हमारी देसी दालों, चने, राजमा और श्रीअन्न से बेहतर हैं। आपका किचन महंगा दिखने से ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि आप रोजमर्रा में क्या खाते हैं। स्वास्थ्य इस बात से बनता है कि आप लगातार दिन-ब-दिन क्या करते हैं, इस बात से नहीं कि आपकी ग्रासरी का बिल कितना आता है।

खड़ा कर दिया प्रोटीन का हौवा

जिम जाने वाले युवा अक्सर बिना सोचे-समझे प्रोटीन शेक और सप्लीमेंट्स के महंगे डिब्बे खरीदने लगते हैं। फिटनेस इंडस्ट्री ने प्रोटीन को लेकर एक हौवा खड़ा कर दिया है, जबकि आम इंसान को हाई प्रोटीन की नहीं बल्कि प्रोटीन की पर्याप्तता ( प्रोटीन सफिशिएंसी) की जरूरत होती है। इसकी जरूरत उम्र, शरीर के आकार, ट्रेनिंग के स्तर और लक्ष्यों के हिसाब से बदलती रहती है। भारत में दाल, चना, राजमा, सोया, टोफू, पनीर, दही, दूध, अंडा और चिकन जैसे प्रोटीन के बेहतरीन स्रोत मौजूद हैं। इसके अलावा यह भी जान लें कि केवल प्रोटीन खाने से मांसपेशियां नहीं बनतीं; प्रोटीन सिर्फ कच्चा माल देता है। उसके लिए सही रेजिस्टेंस ट्रेनिंग, गहरी नींद (जहां रिकवरी होती है), सही हाइड्रेशन और बेहतर पाचन भी उतना ही जरूरी है। अगर आपका पाचन खराब है और आप नींद नहीं ले रहे हैं, तो ज्यादा प्रोटीन खाने का कोई फायदा नहीं है। सप्लीमेंट का इस्तेमाल केवल तब करें जब भोजन से जरूरत पूरी न हो रही हो और इसे किसी विशेषज्ञ की देखरेख में लें। प्रोटीन को लेकर जुनूनी होने के बजाय भोजन को ही अपनी प्राथमिकता बनाएं!

देसी एवोकाडो भी है दमदार

इस पखवाड़े प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जेन जी और एवोकाडो पर बात करते देखना वाकई दिलचस्प था। वैसे भी भारत में हमें स्नैकिंग करना बहुत पसंद है और लोग जल्दी भूखे हो जाते हैं, ऐसे में एवोकाडो का सटायटी फैक्टर (पेट भरा रखने की क्षमता) इस आदत को सुधारने में मददगार है। मगर इंटरनेट मीडिया ट्रेंड्स के चक्कर में लोगों को यह मानना बंद करना होगा कि आप जितना ज़्यादा एवोकाडो खाएंगे, यह उतना ही बेहतर होगा। दरअसल यह एक कैलोरी-डेंस फूड है और दिन में केवल एक-चौथाई से आधा एवोकाडो ही बहुत है। एक बात और कि यह फल हमारे लिए नया नहीं है, इसे सालों से 'मक्खन फल' कहा जाता रहा है। अब समय आ गया है कि हम थोड़ा सोच और स्वाद में बदलाव करें और आयातित विदेशी एवोकाडो की जगह हमारे दक्षिण भारत के किसानों द्वारा उगाए जा रहे एवोकाडो को अपनाएं।

असली स्वास्थ्य का एल्गोरिदम

  • थाली की विविधता: शरीर को सेहतमंद रखने के लिए इंटरनेट मीडिया की तरह एक ही चीज नहीं, बल्कि स्थानीय भोजन की विविधता चाहिए।
  • सटायटी कोड: सुबह के नाश्ते में सही प्रोटीन और गुड फैट्स शामिल करें, ताकि बार-बार अनहेल्दी स्नैकिंग करने की आदत टूट सके।
  • संतुलन का नियम: कोई चीज सेहतमंद है तो उसे जरूरत से ज्यादा न खाएं, क्योंकि सीमित मात्रा ही आपके सिस्टम को सही रखती है।
  • लोकल कनेक्ट: विदेशी और महंगे ट्रेंड्स के पीछे भागने के बजाय अपनी सोच बदलें। स्थानीय व मौसमी भोजन को प्राथमिकता दें।

समग्र स्वास्थ्य के चार स्तंभ

  • संतुलित पोषण: किसी एक सुपरफूड के पीछे भागने के बजाय अपनी थाली में दाल, चावल, स्थानीय सब्जियां, फल और पारंपरिक मसालों की विविधता शामिल करें।
  • सटीक रेजिस्टेंस ट्रेनिंग: शरीर की मांसपेशियों और ताकत को बनाए रखने के लिए केवल डाइट बदलना काफी नहीं है, शरीर को सक्रिय रखना और सही व्यायाम जरूरी है।
  • रात की गहरी नींद: प्रोटीन या पोषण का लाभ शरीर को तब तक नहीं मिल सकता जब तक आप पर्याप्त नींद नहीं लेते। नींद के दौरान ही शरीर की असली रिकवरी और मरम्मत होती है।
  • मजबूत पाचन क्रिया: आप क्या खाते हैं, उससे ज्यादा जरूरी यह है कि आपका शरीर उसे कितना सोख पाता है। हाइड्रेशन और पारंपरिक भारतीय पाक कला (भिगोना, अंकुरित करना) से पाचन को मजबूत रखें।

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