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    ज्यादा 'काम' करने से मर जाते हैं दिमागी सेल्‍स, क्या यही है Parkinson's की वजह?

    Updated: Sat, 30 Aug 2025 08:21 AM (IST)

    नए शोध में वैज्ञानिकों ने पाया कि दिमाग की कोशिकाएं लंबे समय तक सक्रिय रहने से कमजोर होकर मर जाती हैं जिससे पार्किंसंस रोग हो सकता है। चूहों पर किए गए अध्ययन में डोपामाइन न्यूरॉन्स की अति सक्रियता से वे नष्ट हो गए। पार्किंसंस रोगियों के दिमाग में भी यही परिवर्तन देखे गए।

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    क्‍यों बढ़ जाता है Parkinson's रोग का खतरा (Image Credit- Freepik)

    लाइफस्‍टाइल डेस्‍क, नई द‍िल्‍ली। वैज्ञानिकों ने एक नए शोध में पाया है कि अगर दिमाग की कोशिकाएं लगातार लंबे समय तक बहुत सक्रिय रहती हैं, तो वे धीरे-धीरे कमजोर हो जाती हैं और आखिरकार मर जाती हैं। यह खोज यह समझाने में मदद कर सकती है कि पार्किंसंस से पीड़ित लोगों के दिमाग में आखिर कौन-सी गड़बड़ी होती है।

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    शोधकर्ताओं को पहले से पता था कि पार्किंसंस रोग बढ़ने पर दिमाग की कुछ खास नसें या न्यूरस धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं। लेकिन वे यह निश्चित रूप से नहीं जानते थे कि ऐसा क्यों होता है। इस बार हुए अध्ययन में पाया गया कि न्यूरस का लगातार ज्यादा सक्रिय रहना ही उनकी मौत का एक बड़ा कारण हो सकता है।

    क्‍यों मर जाती हैं द‍िमाग की कोश‍िकाएं

    विशेषज्ञों का मानना है कि पार्किंसंस रोग में न्यूरस का यह अति सक्रिय होना कई कारणों से हो सकता है। जैसे आनुवांशिक वजहें, पर्यावरण में मौजूद जहरीले तत्व या फिर अन्य बाहरी कारक। अमेरिका के लैंडस्टोन इंस्टीट्यूट्स के वैज्ञानिक केन नाकामुरा का कहना है कि पार्किंसंस पर लंबे समय से एक सवाल उठ रहा है। इस बीमारी में आखिर दिमाग की खास कोशिकाएं क्यों मर जाती हैं?

    कैसे होता है ये रोग?

    इस सवाल का जवाब मिलने से न सिर्फ यह समझने में मदद मिलेगी कि यह रोग कैसे होता है, बल्कि इसके नए इलाज के रास्ते भी खुल सकते हैं। आज दुनिया भर में लगभग 80 लाख लोग पार्किंसंस रोग से पीड़ित हैं। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने चूहों के दिमाग में मौजूद डोपामाइन न्यूरस पर प्रयोग किया। इन न्यूरस में एक खास रिसेप्टर डाला गया, जिससे उनकी गतिविधि बढ़ गई।

    चूहों पर क‍िया गया अध्‍ययन

    इसके बाद चूहों को एक दवा दी गई, जिसने इन न्यूरस को लगातार ज्यादा सक्रिय बनाए रखा। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में चूहों के दिन और रात की सामान्य गतिविधियां बिगड़ गईं। जब प्रयोग करीब एक महीने तक चला, तो वैज्ञानिकों ने पाया कि कई न्यूरस मरने लगे थे।

    ज्यादा देर तक जीवित नहीं रह पाए न्‍यूरस

    रिसर्च टीम ने इन न्यूरस में अति सक्रिय होने से पहले और बाद में होने वाले बदलावों का अध्ययन भी किया। नतीजों से पता चला कि जब न्यूरस बहुत ज्यादा काम करने लगे, तो उनमें कैल्शियम का स्तर बदल गया और डोपामाइन से जुड़े कई जीनों की कार्यप्रणाली भी प्रभावित हुईं। यही कारण था कि न्यूरस ज्यादा देर तक जीवित नहीं रह पाए।

    पार्किंसंस रोगियों पर भी क‍िया गया सर्वे

    शोधकर्ताओं ने शुरुआती चरण के पार्किंसंस रोगियों के दिमाग के नमूनों की जांच भी की। वहां भी उन्हें वही परिवर्तन देखने को मिले, जो चूहों में पाए गए थे। इससे यह साफ हुआ कि पार्किंसंस में न्यूरस की लगातार ज्यादा सक्रियता ही उनकी कमजोरी और अंततः मृत्यु का मुख्य कारण हो सकती है।

    (इनपुट- आईएएनएस)

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