कहीं 75 दिन का जश्न, तो कहीं देवी की शाही सवारी… अनोखी है देश के अलग-अलग हिस्सों में दशहरा मनाने की परंपरा
दशहरा पूरे भारत में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है, जहां उत्तर भारत में रावण दहन होता है, वहीं कुल्लू, मैसूर और बस्तर में इसकी अनोखी परंपराएं हैं।

दशहरा मनाने की अलग-अलग परंपराएं (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दशहरा के दिन रावण, मेघनाद और कुंभकरण के बड़े पुतलों का दहन किया जाता है और बुराई पर अच्छाई की जीत मनाई जाती है। उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्सों में दशहरा इसी तरह मनाया जाता है, लेकिन क्या आपको पता है भारत में कई ऐसी जगहें हैं, जहां दशहरा बिल्कुल अलग तरीके से मनाया जाता है।
दशहरा के दिन देश के कई हिस्सों में देवी की भव्य सवारी निकाली जाती है, तो कहीं रावण दहन की परंपरा है ही नहीं। आइए जानें देश के अलग-अलग इलाकों में दशहरा मनाने के इन अनोखे तरीकों के बारे में।
उत्तर भारत
उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में दशहरा रामायण की कहानी से जुड़ी है। दशहरा से नौ दिन पहले ही रामलीला का आयोजन शुरू हो जाता है और दशहरा के दिन रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतलों का दहन किया जाता है। इस त्योहार के जरिए बुराई पर अच्छाई की जीत के उत्सव को मनाया जाता है।
पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल में दशहरा विजय दशमी के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन दस दिनों के युद्ध के बाद मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। इसलिए इस दिन को विजय दशमी कहा जाता है। इस दिन महिलाएं सिंदूर खेला की रस्म निभाती हैं, जिसमें वे एक-दूसरे के माथे पर सिंदूर लगाती हैं और मां का आशीर्वाद लेती हैं। इसी दिन मां दुर्गा की प्रतिमा का विसरजन भी किया जाता है।
कुल्लू
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरा काफी अनोखे तरीके से मनाया जाता है। हिमाचल प्रदेश में हफ्ते भर चलने वाले इस उत्सव की शुरुआत में भगवान रघुनाथ को एक लकड़ी के रथ में बैठाकर ढालपुर मैदान लाया जाता है। इसके बाद पालकियों में सवार होकर 200 से ज्यादा स्थानीय और ग्राम देवता इस उत्सव में शामिल होने पहुंचते हैं।
मैसूर
कर्नाटक के मैसूर में दशहरा बेहद शाही तरीके से मनाया जाता है। मैसूर दशहरा 10 दिनों तक चलता है और ये देवी चामुंडेश्वरी को समर्पित है। इस उत्सव की सबसे बड़ी खासियत जंबू सवारी होती है। इसमें एक सजे-धजे हाथी पर सोने के हौदे में देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति विराजमान होती है और एक भव्य जुलूस निकाला जाता है।
आंध्र प्रदेश और तेलांगना
आंध्र प्रदेश और तेलांगना में सोना पत्ती की रस्म की निभाई जाती है। इस दिन शमी के पेड़ की पूजा की जाती है और उसकी पत्तियां आपस में सोने के रूप में बांटी जाती हैं। इसलिए इसे सोना पत्ती कहा जाता है।
बस्तर
बस्तर में भी दशहरा मनाने का तरीका काफी अलग है। यहां मनाया जाने वाला दशहरा लगभग 75 दिनों तक चलता है, लेकिन यहां रावण दहन नहीं किया जाता। इसके पीछे बस्तर की 600 साल पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता जुड़ी है। ये उत्सव मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवता के आगमन और पूजा से जुड़ा है। दशहरा के दौरान यहां रथ यात्राएं निकलती हैं। यहां दशहरा के दौरान बस्तर के आदिवासी समुदाय से जुड़े कई रीति-रिवाज देखने को मिलते हैं।
