रातभर मेला, तड़के होता है रावण दहन; 1941 के बाद से नहीं बदला हापुड़ में पुतला दहन का समय
हापुड़ में रावण दहन की एक अनोखी परंपरा है, जहां दशानन का पुतला रात की बजाय सुबह में जलाया जाता ...और पढ़ें
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प्रतीकात्मक तस्वीर, एआई जेनरेटेड
HighLights
हापुड़ में रावण दहन सुबह तड़के होता है।
यह परंपरा 1941 में सुरक्षा कारणों से शुरू हुई।
मिथकों के कारण समय बदलना जोखिम भरा माना जाता है।
ठाकुर डीपी आर्य, हापुड़। देशभर में जब दशहरे की रात रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, तब हापुड़ में सुबह की पहली किरण के साथ दशानन का अंत होता है। यह कोई नई पहल नहीं, बल्कि 1941 से चली आ रही ऐसी परंपरा है, जिसकी नींव कभी ग्रामीणों की सुरक्षा की चिंता के चलते रखी गई थी।
उस समय 10-15 किलोमीटर दूर गांवों से बैलगाड़ियों में सवार होकर मेला देखने आने वाले परिवारों को रात में लौटते समय लूटपाट का डर सताता था। इसी समस्या के समाधान के लिए बुजुर्गों ने रातभर मेला चलाने और तड़के रावण दहन का रास्ता चुना गया। हालांकि अब
समय बदला पर नहीं बदली परंपरा
वक्त बदला, हालात बदले, बैलगाड़ियों की जगह आधुनिक साधनों ने ले ली, लेकिन परंपरा जस की तस रही। अब आलम यह है कि सुरक्षा की चिंता से शुरू हुई यह व्यवस्था मिथक और अनिष्ट की आशंका से जुड़ गई है।
जिम्मेदार चाहकर भी परंपरा बदलने का जोखिम नहीं उठाना चाहते। यानी हापुड़ में रावण तो हर साल जलता है, लेकिन 1941 में बनी परंपरा आज भी जस की तस खड़ी है।
यानी, हापुड़ में हर साल रावण तो जलता है, लेकिन उसकी अग्नि के साथ 1941 में शुरू हुई परंपरा की लौ भी लगातार जल रही है। वक्त ने साधन बदल दिए, हालात बदल दिए, मगर दशानन को जलाने की घड़ी आज भी नहीं बदली।
तड़के जलाया जाता है दशानन
करीब 85 साल पहले हालात कुछ ऐसे थे कि हापुड़ का दशहरा मेला आसपास के गांवों के लोगों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र हुआ करता था। 10 से 15 किलोमीटर दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों से परिवार बैलगाड़ियों में सवार होकर मेला देखने पहुंचते थे।
दिनभर मेले की रौनक का आनंद लेने के बाद जब शाम को पुतला दहन के बाद वह अपने गांवों की ओर लौटते, तो रास्ते में लूटपाट की आशंका बनी रहती थी। देर रात सुनसान रास्तों पर परिवारों की सुरक्षा बड़ी चिंता थी।
असुरक्षित रास्ता था असली कारण
उस दौर के बुजुर्गों ने इस समस्या का समाधान निकालते हुए मेला रातभर चलाने और सुबह तड़के रावण दहन करने का निर्णय लिया। मकसद साफ था कि ग्रामीण परिवार रात के अंधेरे में असुरक्षित रास्तों से गुजरने के बजाय सुबह उजाला होने पर अपने घरों को लौट सकें। धीरे-धीरे यही व्यवस्था हापुड़ की पहचान और परंपरा बन गई। दशहरा आया तो मेला सजा, रातभर चहल-पहल रही और सुबह रावण दहन हुआ।
1941 से चली आ रही परंपरा
समय के साथ परिवहन के साधन बदले। बैलगाड़ियों की जगह मोटरसाइकिलों, कारों और अन्य वाहनों ने ले ली। ग्रामीणों की आवाजाही का तरीका बदल गया और पुराने दौर की परिस्थितियां भी पहले जैसी नहीं रहीं, लेकिन रावण दहन का समय नहीं बदला। वर्ष 1941 में शुरू हुई यह परंपरा आज भी उसी अंदाज में निभाई जा रही है।
अब इस परंपरा के साथ मिथक और अनिष्ट की आशंकाएं भी जुड़ गई हैं। ऐसे में रावण दहन का समय बदलने को लेकर जिम्मेदार भी सहज नहीं हैं। परंपरा को बदलने की पहल करना जोखिम भरा माना जाता है। नतीजा यह है कि जिस व्यवस्था की शुरुआत कभी व्यावहारिक जरूरत और सुरक्षा के मद्देनजर हुई थी, वह अब हापुड़ की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।
हमारे पुर्वजों ने उस समय के हालात के अाधार पर रावण दहन सुबह को करने का निर्णय लिया था। पिछले वर्षाें में इसको बदलकर सुबह को करने का प्रयास किया गया, लेकिन उसके साथ ही कुछ अनिष्ट होने लगा। ऐसे में हमने दहन का समय पहले जैसा ही रखने का निर्णय लिया। इसको बदला जाना फिलहाल संभव नहीं है। - सुयश वशिष्ठ - पदाधिकारी - रामलीला कार्यकारणी।
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