लुप्तप्राय बिरहोर जनजाति का एक और मासूम ने तोड़ा दम, सरकारी दावे पर उठे सवाल, सिस्टम फिर बेनकाब
नोवामुंडी में बिरहोर जनजाति के 6 वर्षीय दीपक बिरहोर की इलाज के दौरान मौत हो गई। यह घटना विलुप्तप्राय आदिम जनजाति के लिए सरकारी संरक्षण और स्वास्थ्य सु ...और पढ़ें

बच्चे की मौत के बाद शोक में डूबा पिता।
संवाद सूत्र, नोवामुंडी। देश में विलुप्ति के कगार पर खड़ी आदिम जनजाति बिरहोर समुदाय के लिए सरकारी संरक्षण और स्वास्थ्य सुविधाओं की जमीनी हकीकत एक बार फिर सवालों के घेरे में है। गुरुवार सुबह नोवामुंडी टीएमएच अस्पताल में इलाज के दौरान टाटीबा बिरहोर बस्ती निवासी छह वर्षीय दीपक बिरहोर की मौत हो गई।
मासूम की मौत ने इस बात को उजागर कर दिया कि आदिम जनजातियों के बच्चों तक समय पर और समुचित इलाज अब भी एक चुनौती बना हुआ है।
मृतक के पिता कुनू बिरहोर ने बताया कि दीपक पिछले कई दिनों से बीमार था। मंगलवार की शाम तबीयत ज्यादा बिगड़ने पर उसे मेघाहातुबुरु सेल कंपनी के अस्पताल में भर्ती कराया गया।
वहां प्राथमिक इलाज के बाद चिकित्सकों ने उसकी हालत गंभीर बताते हुए बुधवार शाम को नोवामुंडी टीएमएच अस्पताल रेफर कर दिया। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद गुरुवार सुबह दीपक ने दम तोड़ दिया।
इलाज के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक रेफर होने की यह प्रक्रिया बताती है कि दूरदराज और खनन क्षेत्रों में रहने वाली आदिम जनजातियों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं कितनी असहज और अपूर्ण हैं। सवाल यह भी है कि जब बिरहोर जैसी जनजाति को सरकार ने ‘लुप्तप्राय आदिम जनजाति’ की श्रेणी में रखा है, तो उनके बच्चों के लिए विशेष मेडिकल केयर सिस्टम क्यों नहीं है।
मृत बच्चे का शव आदिवासी खदान कंस्ट्रक्शन द्वारा उपलब्ध कराए गए मुक्ति वाहिनी वाहन से टाटीबा गांव ले जाया गया, जहां परंपरागत रीति-रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया। दीपक की मां सुकरू बिरहोर का रो-रोकर बुरा हाल है, जबकि तीन वर्षीय छोटा भाई अरविंद अब भी यह नहीं समझ पा रहा कि उसका बड़ा भाई हमेशा के लिए चला गया।
दीपक के पिता कुनू बिरहोर नोवामुंडी क्षेत्र में आदिवासी खदान कंस्ट्रक्शन के कैंप इलाके में घुस आने वाले बंदरों को जंगल की ओर भगाने का काम कर किसी तरह परिवार का पेट पालते हैं। सीमित संसाधन, गरीबी और सरकारी योजनाओं तक अधूरी पहुंच इस समुदाय की रोजमर्रा की सच्चाई है।
घटना की सूचना मिलने पर भाजपा नेता बाबूलाल माझी अस्पताल पहुंचे और शोक संतप्त परिवार से मुलाकात कर सांत्वना दी। हालांकि सवाल यह है कि क्या केवल सांत्वना से उन नीतिगत खामियों की भरपाई हो पाएगी, जिनकी कीमत बिरहोर जैसे समुदाय के मासूम बच्चों को अपनी जान देकर चुकानी

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