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    Jharkhand : मुआवजे की जंग, अंबा के संग: बड़कागांव में फिर गरजे पूर्व मंत्री योगेंद्र साव

    Updated: Sun, 04 Jan 2026 10:02 PM (IST)

    पूर्व मंत्री योगेंद्र साव ने अपनी 30 साल पुरानी फैक्ट्री के ध्वस्त होने पर एक करोड़ प्रति एकड़ मुआवजे की मांग को लेकर रांची के केरेडारी में मुख्य सड़क ...और पढ़ें

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    पुलिस ने जबरदस्ती हटाई ईंट और बहाल हुआ ट्रांसपोर्टेशन।

    डिजिटल डेस्क, रांची। राजनीति के पुराने खिलाड़ी और पूर्व मंत्री योगेंद्र साव अब सड़क पर उतरकर अपनी ही सरकार से टकरा रहे हैं। कभी कृषि मंत्री की कुर्सी संभालने वाले साव ने मुख्य सड़क पर रातों-रात दीवार खड़ी करके कोयला परिवहन ठप कर दिया।

    वजह? उनकी 30 साल पुरानी फैक्ट्री का ध्वस्त होना और जमीन के मुआवजे में 'एक करोड़ प्रति एकड़' की मांग। लेकिन पुलिस ने उन्हें हाथ-पैर पकड़कर हटाया और दीवार तोड़ दी।

    आइए इस पूरे मामले को समझते हैं। यहां राजनीति, कोयला खदानें, परिवार की विरासत और मुआवजे की लड़ाई सब शामिल है। 

    कौन हैं योगेंद्र साव और परिवार?

    योगेंद्र साव (पूर्ण नाम योगेंद्र प्रसाद साव) कोई आम आदमी नहीं हैं। वे झारखंड के पूर्व कृषि मंत्री रह चुके हैं और कांग्रेस के प्रमुख नेता हैं। उनकी पत्नी निर्मला देवी पूर्व विधायक रहीं हैं और बड़कागांव से विधानसभा चुनाव जीत चुकी हैं।

    उनकी बेटी अंबा प्रसाद भी पूर्व विधायक हैं, जो 2019 में बड़कागांव से चुनी गई थीं, लेकिन 2024 चुनाव में हार गईं। यानी पूरा परिवार राजनीति का 'पावर पैक' है। 2016 में वे NTPC की कोयला परियोजना के खिलाफ विरोध में सुर्खियों में आए थे, जब प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई और पुलिस फायरिंग में चार लोग मारे गए थे।

    साव और उनकी पत्नी को उस मामले में दोषी ठहराया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली। अब मामला व्यक्तिगत है। साव हजारीबाग के केरेडारी इलाके में झुमरी टांड़ में अपनी लक्ष्मण सिरेमिक फैक्ट्री (फायर ब्रिक्स) चला रहे थे, जो करीब 30 साल पुरानी थी।

    एक करोड़ प्रति एकड़ का चाहिए मुआवजा

    कहानी की जड़ चट्टी बारियातू कोल माइंस प्रोजेक्ट में है। इस परियोजना के लिए बनी 2.2 किलोमीटर लंबी सड़क साव की जमीन से गुजरती है।

    उनकी फैक्ट्री को 1 अगस्त 2025 को ध्वस्त कर दिया गया, जिसके बाद वे धरने पर बैठ गए। मांग: 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत चार गुना मुआवजा, जो करीब एक करोड़ रुपये प्रति एकड़ बनता है।

    कंपनी (NTPC और रित्विक) ने 1.97 करोड़ रुपये रांची ट्रिब्यूनल में जमा कर दिए हैं, लेकिन साव का कहना है कि यह पर्याप्त नहीं। वे और अन्य रैयत चार गुना राशि मांग रहे हैं, साथ ही पुनर्वास और प्रदूषण मुआवजे (2 रुपये प्रति टन कोयला) की भी।

    यह विरोध 2004 से चली आ रही NTPC परियोजनाओं से जुड़ा है, जहां किसानों ने कम मुआवजे पर कई बार विरोध किया। अब अपनी सरकार में विरोध जारी है।

    रातों-रात दीवार से कोयला ट्रांसपोर्ट ठप

    नए साल की शुरुआत में साव ने विरोध को नाटकीय मोड़ दिया। 1 जनवरी की रात उन्होंने केरेडारी इलाके में मुख्य सड़क पर 20 फीट लंबी और पांच फीट ऊंची ईंट-मिट्टी की दीवार खड़ी कर दी। कुर्सी लगाकर खुद सड़क पर बैठ गए, जिससे NTPC के कोयला ट्रक और ट्रेनें रुक गईं। दो दिनों तक परिवहन बाधित रहा।

    साव का कहना है कि सड़क बिना अधिग्रहण के बनाई गई, उनकी बाउंड्री दो बार तोड़ी गई और जमीन 'नॉन-मजूरबा खास' है, जिसे उन्होंने शंकर शाह की बेटियों से खरीदा है, लेकिन रजिस्ट्री कोर्ट ऑर्डर से पेंडिंग है। जब तक मुआवजा नहीं, सड़क बंद।

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    पुलिस ने हाथ-पैर पकड़कर हटाया, दीवार तोड़ी

    2 जनवरी की सुबह 6 बजे पुलिस पहुंची। केरेडारी ओपी इंचार्ज समेत टीम ने पहले समझाने की कोशिश की, लेकिन साव नहीं माने। आखिरकार, हाथ-पैर पकड़कर उन्हें हटाया और दीवार को हाथ से तोड़ दिया।

    कोयला परिवहन शुरू हो गया। प्रशासन का तर्क है कि जमीन विवादित है, जंगल-झाड़ वाली, और साव के नाम रजिस्टर्ड नहीं। इलाके में धारा 144 लगा दी गई।

    साव ने इसे 'पुलिस की गुंडागर्दी' बताया और कहा कि वे हाई कोर्ट जाएंगे। उन्होंने BJP सांसद जय राम महतो पर भी आरोप लगाए कि पुलिस 'सुपारी' पर काम कर रही है।

    ED की छापेमारी और राजनीतिक कोण

    यह सिर्फ मुआवजे की लड़ाई नहीं। जुलाई 2025 में ED ने साव, उनके परिवार और सहयोगियों पर मनी लॉन्ड्रिंग केस में रांची और हजारीबाग में 8 जगहों पर छापे मारे थे।

    क्या विरोध उससे जुड़ा है? या पुरानी NTPC कड़वाहट? साव कांग्रेस से हैं, जबकि झारखंड में JMM-कांग्रेस गठबंधन की सरकार है। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हैं, जहां पुलिस एक्शन को तानाशाही कहा जा रहा है।

    धरना जारी या कोर्ट की दखल

    साव ने कहा कि संघर्ष जारी रहेगा और वे कानूनी सलाह लेकर आगे बढ़ेंगे। कंपनी का कहना है कि मुआवजा जमा हो चुका। लेकिन साव चार गुना राशि पर अड़े हैं।

    यह मामला झारखंड की कोयला खदानों और किसानों के मुआवजे की बड़ी समस्या को दिखाता है। क्या साव की दीवार टूटने से जंग खत्म या नई शुरुआत? फिलहाल सड़क खुली है, लेकिन राजनीतिक आग सुलग रही है।