झारखंड में सूचना आयुक्त की नियुक्ति में कहां फंसा है पेच, आखिर किस वजह से हो रही देरी
झारखंड में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की गेंद अब भाजपा के पाले में है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब भाजपा पर विधायक दल के नेता का चयन शीघ्र करने का दबाव है। झारखंड सरकार ने नियुक्ति नहीं होने के लिए विपक्षी दल भाजपा को ही जिम्मेदार ठहराया है। ऐसे में अब भाजपा जल्द ही विधायक दल के नेता का चयन कर सकती है।

मृत्युंजय पाठक, रांची। झारखंड में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के बाबत सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भाजपा पर राज्य विधानसभा में विधायक दल के नेता का जल्द चयन करने का नैतिक दबाव बढ़ गया है।
विधानसभा चुनाव-2024 का परिणाम 23 नवंबर को आया था। इसमें झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन (आइएनडीआइए) की जीत हुई और हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकार बनी। 25 सीटों के साथ यहां विधानसभा में भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी है।
नेता प्रतिपक्ष के बिना चला विधानसभा सक्ष का पहला सदन
सरकार गठन के डेढ़ माह बीत जाने के बाद भी विपक्षी दल भाजपा ने यहां अपने विधायक दल के नेता का चयन नहीं किया है। इससे विधानसभा का पहला सत्र बिना नेता प्रतिपक्ष के ही संचालित हुआ।
पिछली सरकार में भी भाजपा के तत्कालीन विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी को स्पीकर द्वारा तकनीकी कारणों से नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता नहीं देने के कारण लगभग तीन वर्षों तक बिना नेता प्रतिपक्ष के ही सदन चला था।
सूचना आयुक्तों के सभी पद रिक्त
सुप्रीम कोर्ट में झारखंड ने कहा है कि राज्य में नेता प्रतिपक्ष नहीं होने की वजह से सूचना आयोग में नियुक्ति पर निर्णय लेने वाली चयन कमेटी की बैठक नहीं हो पाई है।
झारखंड में वर्ष 2020 से ही राज्य में सूचना आयोग निष्क्रिय है। मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के सभी पद रिक्त हैं। सुनवाई पूरी तरह ठप है और आयोग में दर्ज सभी अपील व शिकायतें भी अरसे से लंबित हैं।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
इन पदों पर नियुक्ति को लेकर झारखंड हाई कोर्ट के अधिवक्ता शैलेश पोद्दार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए मंगलवार को जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने निर्देश दिया।
झारखंड विधानसभा की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा सूचना आयुक्तों की नियुक्ति पर निर्णय लेने वाली चयन कमेटी के लिए अपने किसी निर्वाचित सदस्य को दो सप्ताह के भीतर विपक्ष के नेता के तौर पर नामित करे।
जल्द हो सकता है विधायक दल के नेता का ऐलान
इसके तुरंत बाद कमेटी सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड को आदेश के अनुपालन को लेकर शपथ पत्र दाखिल करने का भी निर्देश दिया है। इसके बाद उम्मीद की जा रही है कि भाजपा दो सप्ताह के अंदर विधायक दल के नेता के नाम की घोषणा कर देगी।
पार्टी अगर ऐसा नहीं भी करती है तो भी सूचना आयोग चयन समिति के लिए भाजपा किसी विधायक को नामित जरूर करेगी। इस बीच झारखंड विधानसभा का बजट सत्र भी 24 फरवरी से शुरू होने वाला है। इससे पहले नेता प्रतिपक्ष का चयन तय माना जा रहा है।
वर्ष 2023 से 2024 तक नेता प्रतिपक्ष रहे भाजपा के अमर बाउरी 2024 में विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। ऐसे में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी फिर पार्टी के विधायक दल के नेता चुने जा सकते हैं।
पक्ष-विपक्ष की लड़ाई में पांच साल बर्बाद
- विधानसभा चुनाव-2019 के बाद सूचना आयोग में नियुक्ति नहीं होने का बड़ा कारण सत्ताधारी झामुमो और प्रतिपक्ष भाजपा के बीच की लड़ाई है।
- 24 फरवरी 2020 को भाजपा ने विधानसभा में बाबूलाल मरांडी को विधायक दल का नेता बनाया था। स्पीकर ने बाबूलाल को विधायक दल के नेता के तौर पर मान्यता नहीं दी।
- बाबूलाल मरांडी के विरुद्ध स्पीकर न्यायाधिकरण में चल रही दल-बदल मामले की सुनवाई लंबित होने को इसका आधार बनाया गया था।
- मरांडी ने 2019 के चुनाव के बाद अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा का भाजपा में विलय कर दिया था, जिसकी प्रक्रिया को नियमविरुद्ध बताते हुए कांग्रेस के प्रदीप यादव व कुछ अन्य विधायकों ने उनपर दल-बदल का मामला चलाने की मांग की थी।
- सत्ता पक्ष के विधायक और विधानसभा अध्यक्ष भाजपा को मरांडी के अलावा किसी और का नाम नेता प्रतिपक्ष के तौर पर नामित करने को कह रहे थे, जबकि भाजपा के विधायक जिद पर अड़े थे। इस खींचतान में तीन साल गुजर गए।
बाद में 4 जुलाई, 2023 को बाबूलाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने और 15 अक्टूबर 2023 को अमर बाउरी विधायक दल के नेता बने। इसके बाद भी सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर गंभीर प्रयास नहीं हुए और कुल मिलाकर पांच साल बर्बाद हो गए।
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