Jharkhand Politics: खेल संघों में नेताओं और ब्यूरोक्रेसी को दूर रखना चाहते थे जयपाल सिंह मुंडा, बहुमुखी प्रतिभा के धनी
जयपाल सिंह मुंडा की जयंती पर उनके बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला गया है। अश्विनी कुमार पंकज ने बताया कि वे हॉकी के जादूगर होने के साथ-साथ खेल पत्र ...और पढ़ें

बहुमुखी प्रतिभा के धनी जयपाल सिंह मुंडा की जयंती पर कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।
संजय कृष्ण, रांची। बहुत कम लोग जानते हैं कि जयपाल सिंह मुंडा (3 जनवरी 1903–20 मार्च 1970) ने खेल पत्रकारिता भी की। पिछले डेढ़ दशक से जयपाल सिंह मुंडा के संविधान सभा में भाषण, लेखन, पत्रिकाओं में छपे उनके लेख को प्रकाश में ला रहे अश्विनी कुमार पंकज ने बताया कि जयपाल सिंह के इस पक्ष पर बात नहीं होती है।
वे कहते हैं कि जयपाल सिंह जब आक्सफोर्ड में पढ़ रहे थे तब वे हाकी क्लब से जुड़कर खेलते थे और इसके एवज में पैसे मिलते थे, लेकिन यह उनके लिए पर्याप्त नहीं था। इसलिए उन्होंने खेल के साथ-साथ खेल पत्रकारिता की। खेल पर पत्रिकाओं में रपट लिखा। खेल की कमेंट्री की।
जयपाल सिंह हाकी के जादूगर थे। 1928 में एम्स्टर्डम में होने वाले ओलंपिक में पहली भारतीय हाकी टीम के जयपाल सिंह कप्तान थे और पूरे टूर्नामेंट में एक भी गोल खाए बिना जीत हासिल की। इस जीत ने गुलाम भारत को उत्साह से भर दिया था और आज की मुंबई सहित कई बड़े शहरों में जश्न मनाया गया था।
इस जीत के मुख्य किरदार जयपाल सिंह थे। आक्सफोर्ड में पढ़ते हुए आक्सफोर्ड ब्लू से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय छात्र बने, जो विश्वविद्यालय द्वारा खेल के क्षेत्र में दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। ओलंपिक में भारत की जीत से भारतीयों में यह भावना भी पैदा कर दी कि एक न एक दिन अंग्रेजों को भी भारत से खदेड़कर रहेंगे। इस जीत ने राष्ट्रीय भावना का संचार कर दिया।
खेल के लिए छोड़ दी प्रतिष्ठित नौकरी
अश्विनी कुमार पंकज कहते हैं कि उन्होंने आईसीएस की प्रतिष्ठित नौकरी की जगह अपने देश के लिए खेल को चुना। जयपाल सिंह आक्सफोर्ड से अर्थशास्त्र में डिग्री प्राप्त करने के बाद भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) की तैयारी शुरू कर दी थी। इसके बाद साक्षात्कार में शीर्ष स्थान प्राप्त किया और आईसीएस द्वारा चयनित हो गए।
आईसीएस में अपने परिवीक्षा काल के दौरान उन्हें भारतीय हाकी दल में शामिल होने का निमंत्रण मिला। इतने बड़े वैश्विक आयोजन में देश का प्रतिनिधित्व करने के गौरव से प्रेरित होकर जयपाल ने छुट्टी के लिए आवेदन किया, लेकिन आईसीएस ने इसे अस्वीकार कर दिया।
उन्होंने एम्स्टर्डम में टीम में शामिल होने का मन बनाया और उसमें शामिल हो गए और अपनी प्रतिभा के कारण कप्तान बनाए गए। कहा जाता है कि इस अभियान की शुरुआत जबरदस्त रही। टीम ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए फाइनल से पहले 26 गोल दागे और एक भी गोल नहीं खाया।
जयपाल सिंह अपनी टीम की रक्षापंक्ति की रीढ़ थे, जिसने पूरे ग्रुप चरण में एक भी गोल नहीं होने दिया। लेकिन उन्हें वह महत्व आज तक नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे।
राजनीति में कदम
पंकज कहते हैं कि उन्होंने संविधान सभा में आदिवासियों की आवाज उठाई। इसके बाद जब संसद में चुनकर गए तो सबसे पहले सांसदों के बीच क्रिकेट कराया। देश में पहला हाकी फेडरेशन बना। खेलों के विकास के लिए उन्होंने उच्च समिति बनवाई, लेकिन इसका चेयरमैन दूसरे को बना दिया गया।
उन्होंने खेल संघों की स्थापना में बड़ी भूमिका निभाई और यह सुझाव दिया था कि खेल संघों में ब्यूरोक्रेसी व नेताओं को न रखा जाए। इसमें खेल से जुड़े वरिष्ठ खिलाड़ी ही रखे जाएं। लेकिन इसके लिए एक ड्राफ्ट भी बनाया था, जिसे आज तक लागू नहीं किया जा सका।
आज वे अपने ही घर में उपेक्षित हैं। एके पंकज यह सवाल उठाते हैं, आज देश में उनके नाम पर खेल नहीं होता। वे अपने राज्य में भी उपेक्षित हैं। क्या नए विधानसभा में उनकी आदमकद प्रतिमा नहीं होनी चाहिए?
जयंती पर कई कार्यक्रमों का आयोजन
मारंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा की जयंती के अवसर पर केंद्रीय सरना समिति की ओर से 3 से 7 फुटबाल प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है। यह प्रतियोगिता डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के फुटबाल मैदान में आयोजित की जा रही है।
प्रतियोगिता का शुभारंभ शुक्रवार को जगलाल पाहन के द्वारा पारंपरिक विधि से मैदान का शुद्धीकरण (सोसोपड़ा) कर की गई। मौके पर खिलाड़ियों और युवाओं में खासा उत्साह देखने को मिला। पहले दिन का रोमांचक मुकाबला दीपक ब्रदर्स बुढ़मू और लकड़ा ब्रदर्स फुटबाल क्लब के बीच खेला जाएगा, जबकि दूसरा मैच मूटरु ब्रदर्स संग्रामपुर और सतियारी टोली के बीच होगा।

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