जासं, रांची : झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति धुर्वा के प्रतिनिधिमंडल ने रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को अपना मांग पत्र सौंपा। इस मांग पत्र में कहा गया है कि जो आदिवासी धर्मांतरण कर ईसाई बन गए उनका जाति प्रमाण पत्र निर्गत नहीं किया जाए। साथ ही जनजातियों को मिलने वाली सुविधा और आरक्षण से उन्हें वंचित किया जाए। पत्र में दूसरी मांग थी कि झारखंड राज्य में एक जनजाति आयोग का गठन किया जाए। जनजाति समाज की महिला के गैर जनजाति पुरुष से विवाह के बाद उस महिला को मिलने वाली आरक्षण एवं सुविधा से वंचित किया जाए। इसके साथ ही पूर्व की भांति जाति प्रमाण पत्र में सरना धर्म कॉलम का स्थान दिया जाए। जनजाति समाज के पाहन, पुजार, बैगा, नाइके इत्यादि को सम्मान प्रोत्साहन राशि दिया जाए। जनजाति धर्म समाज की रक्षा सुरक्षा हेतु धर्मातरण कानून 2017 का कड़ाई से पालन कराया जाए। पत्र में बताया गया है कि केरल राज्य बनाम चंद्र मोहनन एवं अन्य के बाद संख्या दांडीक अपील संख्या 204 वर्ष 1997 दिनांक 28 जनवरी 2004 में उच्चतम न्यायालय ने यह न्याय निर्णय दिया है कि जो जनजाति अपने पूर्वजों की रुढि़ प्रथा, व्यवस्था, परंपरा रीति रिवाज, विवाह विरासत एवं अन्य मान्यताओं को त्याग कर ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए हैं, वो जनजाति के सदस्य नहीं हो सकते हैं। ईसाई मिशनरियां जनजातियों के पर्व, त्योहार को गलत तरीके से प्रस्तुत कर रही है

समिति के अध्यक्ष मेघा उरांव ने बताया है कि सात सितंबर को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, असम, झारखंड के राष्ट्रीय स्तर के जनजाति समाज की ऑनलाइन बैठक हुई। इस बैठक में दो विषयों पर चर्चा के बाद निर्णय लिया गया है कि वर्ष 2004 में आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को प्रत्येक राज्यों में लागू कराने के लिए पहल की जाएगी। दूसरा ईसाई मिशनरी द्वारा उरांव, मुंडा, जनजातियों के नाम पर जनजाति, परंपरा, संस्कार, परब त्योहार या किसी भी तरह के कार्यक्रम को गलत तरीके से प्रस्तुत करने पर विरोध किया जाएगा। बाबूलाल मरांडी के मिलने वालों में समिति के संरक्षक कर्मपाल उरांव, जय मंत्री उरांव, उपाध्यक्ष नीलम तिर्की, सचिव कुमुदिनी लकड़ा, सा सचिव डॉक्टर बुटन महली, कोषाध्यक्ष सीमा टोप्पो एवं अन्य शामिल थे।

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