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    Durga Puja 2022: रातू किला में दुर्गा पूजा को लेकर भव्य तैयारी; जानें, लोगों के लिए कब खुलेगा राज महल

    By Sanjay KumarEdited By:
    Updated: Wed, 21 Sep 2022 09:33 AM (IST)

    Durga Puja 2022 रांची में दुर्गा पूजा का इतिहास करीब दो हजार साल पुराना है। साल 1900 में रातू गढ़ बनने के बाद यहां भी मां दुर्गा की भव्य पूजा शुरू हुई ...और पढ़ें

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    Durga Puja 2022: रातू किला में दुर्गा पूजा को लेकर भव्य तैयारी।

    रांची/रातू, जासं। Durga Puja 2022 दुर्गा पूजा की भव्यता की चर्चा होते ही हमारे मस्तिष्क में कोलकाता का दृश्य उभरता है। भव्य पंडाल, बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं और चकाचौंध कर देने वाला साज-सज्जा। पहले बड़ी संख्या में लोग शारदीय नवरात्र में कोलकाता घूमने जाते थे। कुछ ऐसा ही नजारा अब रांची में दिखता है। शहर में करीब एक सौ से ज्यादा पंडाल बनते हैं जिसमें एक दर्जन बड़ा पंडाल बनता है। यहां की भव्यता भी कोलकाता से कमतर नहीं होता। दूर-दूर से लोग रांची का दुर्गा पूजा देखने आते हैं। शारदीय नवरात्र में पूजा-उपासना के साथ-साथ मां को प्रसन्न करने के लिए बलि की भी काफी पुरानी मान्यता है। बलि प्रथा लोगों की आस्था से जुड़ी है। अधिकतर जगहों पर जहां बकरे की बलि देकर मां को प्रसन्न किया जाता है।

    वहीं, रातू स्थित राजा रातू महल में भैंसे की बलि देने की प्रथा है। यह प्रथा सदियों से चली आ रही है। इस प्रथा की शुरुआत नागवंश के पहले राजा फणी मुकुट राय ने की थी। आज भी यह परंपरा कायम है। नवरात्र ही वह मौका होता है जब राज दरबार आमलोगों के लिए खोला जाता है। नवरात्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालु रातू किला की पूजा देखने आते हैं। माता के दर्शन के साथ राज महल की खूबसूरती का भी दीदार करते हैं।

    सबसे पहले रातू किला में ही हुई थी नवरात्र पूजा

    ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के वंशज लाल प्रवीर नाथ शाहदेव के अनुसार रांची में दुर्गा पूजा का इतिहास करीब दो हजार साल पुराना है। बड़े बुजुर्ग बताते थे कि दक्षिणी छोटानागपुर में दुर्गा पूजा की शुरुआत नागवंशीय महाराज फनी मुकुट राय के समय हुई। महाराज फनी मुकुट राय की शादी पंचकोट पुरुलिया के राजकुमारी के साथ हुई थी। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा धूमधाम से मनायी जाती है। कहा जाता है कि ससुराल में दुर्गा पूजा मनाते देख महाराज के मन में भी माता के प्रति भक्ति जागृत हुई। इसके बाद उन्होंने अपने महल में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना शुरू की।

    साल 1900 में रातू गढ़ बनने के बाद यहां भी मां दुर्गा की भव्य पूजा शुरू हुई जो आज भी जारी है। प्रत्येक साल दुर्गा पूजा एवं काली पूजा के मौका पर रातू किला को आम लोगों के लिए खोल दिया जाता था। महाराज आमजन के साथ मिलजुल का दुर्गोत्सव मनाते थे। आज भी यह परंपरा कायम है।

    सोने का मां दुर्गा की मुकुट, चांदी के दो शेर बढ़ता है शोभा

    राजमहल में स्थापित मां दुर्गा का मुकुट सोने का है। जबकि चांदी के दो शेर उनकी शोभा को और बढ़ा देता है। राज दरबार के प्रबंधक दामोदर नाथ मिश्र के अनुसार षष्ठी से दशमी तक रातू राज महल का दरवाजा आम लोगों के लिए मां का दर्शन हेतु खोल दिया जाता है। दशमी के दिन ही मूर्ति का विसर्जन कर दिया जाता है ।

    भैंसा को महिषासुर का रूप मान दी जाती है बलि

    किला प्रबंधक दामोदर मिश्रा ने बताया कि महिषासुर एक असुर व भैंसा का रूप था। मां दुर्गा शक्ति की प्रतीक है, उन्होंने अपने भक्तों की रक्षा के लिए अवतरित होकर महिषासुर का संहार किया था। बलि प्रथा लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है। नवरात्र के महानवमी के दिन रातू किला में भैंसे की बलि दी जाती है।

    पूरा राजदरबार आयोजन की तैयारी में जूटा

    राजकुमारी मावधी मंजरी देवी का कहना है कि रातू किला में नवरात्र पूरे विधि-विधान से होता है। उत्सव के साथ-साथ नियम निष्ठा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। दो साल कोरोना संक्रमण के कारण पूजा सादगी से हुई। इस बार राज्य सरकार के गाइडलाइन के अनुसार पूजा भव्य रूप से मनाया जाएगा। पंचमी से दशमी तक रातू किला में मेला जैसा नजारा होगा। आयोजन की तैयारी में पूरा राजदरबार जुटा हुआ है।