सोहराय पर अब कौन गाएगा वो मीठे लोकगीत: रूपी सोरेन के निधन से धतकीडीह का हर बुजुर्ग आंखें नम कर बैठा
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन के निधन से उनके पैतृक गांव धतकीडीह समेत पूरे चांडिल क्षेत्र में गहरा ...और पढ़ें

ग्रामीणों का कहना है कि रूपी सोरेन का जाना केवल सोरेन परिवार की ही नहीं, बल्कि पूरे धतकीडीह गांव की अपूरणीय क्षति है।
HighLights
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन का निधन।
पैतृक गांव धतकीडीह में गहरा शोक, ग्रामीण भावुक।
सोहराय पर्व पर लोकगीत और पीठा बनाने की यादें।
जाटी, चांडिल/नीमडीह। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन के निधन की खबर से चांडिल प्रखंड स्थित उनके पैतृक गांव धतकीडीह (धातकीडीह) समेत पूरे क्षेत्र में गहरा शोक व्याप्त है।
सरायकेला-खरसावां जिले का यह छोटा सा गांव, जो मुख्यमंत्री का ननिहाल भी है, आज पुरानी यादों और भावनाओं का केंद्र बना हुआ है।
जिस खपरैल के जीर्ण-शीर्ण मकान से कभी रूपी सोरेन की शादी हुई थी, वहां की पगडंडियां और गलियां अब उनकी बचपन की स्मृतियों को अपने भीतर समेटे खड़ी हैं।
धतकीडीह की बेटी के जाने से भावुक हुए ग्रामीण
निधन की खबर मिलते ही गांव के लोग पुराने दिनों को याद कर भावुक हो उठे। ग्रामीणों का कहना है कि रूपी सोरेन का जाना केवल सोरेन परिवार की ही नहीं, बल्कि पूरे धतकीडीह गांव की अपूरणीय क्षति है।
गांव ने अपनी उस बेटी को खो दिया, जिसकी जीवन-यात्रा ने आगे चलकर झारखंड के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार की नींव को मजबूत किया। जिस आंगन में खेलकर वे बड़ी हुईं और जहां से उनकी विदाई हुई थी, वहां अब केवल उदासी और सन्नाटा है।
मार्च महीने में मायके का आखिरी सफर
किसे पता था कि इसी वर्ष मार्च माह में मायके आया उनका रूपी सोरेन का सफर जीवन का आखिरी पड़ाव बन जाएगा। मार्च में वे अपने भाई गुरुचरण किस्कू के बेटे संतोष कुमार किस्कू और बहू स्नेहा सोरेन के विवाह समारोह में शामिल होने धतकीडीह आई थीं।
उस समय उनके साथ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, विधायक कल्पना सोरेन और परिवार के अन्य सदस्य भी उपस्थित थे। घर-आंगन में विवाह की खुशियां थीं।
रूपी सोरेन ने नवदंपती को सुखमय जीवन का आशीर्वाद दिया था। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि वह मुलाकात अपनों के साथ अंतिम स्मृतियों का अध्याय बनकर रह जाएगी।
सोहराय पर्व पर पीठा बनाना और लोकगीत गाना अब सिर्फ यादें
धातकीडीह गांव से सोरेन परिवार का संबंध सिर्फ रिश्तेदारी तक सीमित नहीं था, बल्कि यह परंपरा और अटूट आत्मीयता से जुड़ा था। दिशोम गुरु शिबू सोरेन, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और परिवार के सदस्य अक्सर सोहराय पर्व मनाने गांव पहुंचते थे।
मायका पहुंचने पर रूपी सोरेन खुद अपने हाथों से पारंपरिक पीठा बनाती थीं, परिजनों व ग्रामीणों के साथ मिलकर सोहराय के लोकगीत गाती थीं और खुशियां बांटती थीं।
परिवार के आते ही पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल बन जाता था। ग्रामीण आज उन पलों को याद कर बेहद गमगीन हैं कि अपनों के साथ त्यौहार मनाने आने वाली रूपी सोरेन अब कभी वापस नहीं आएंगी।
अंतिम दर्शन के लिए रांची रवाना हुए परिजन और ग्रामीण
निधन की सूचना मिलते ही धतकीडीह और आसपास के गांवों में शोक की लहर दौड़ गई। मायके से बड़ी संख्या में रिश्तेदार और ग्रामीण उनके अंतिम दर्शन के लिए रांची के लिए रवाना हो गए।
बुधवार दोपहर तक अधिकांश परिजन रांची पहुंच चुके थे। गांव में हर ओर केवल सन्नाटा और मायूसी का माहौल है, लेकिन धतकीडीह का वह आंगन और उसकी यादें हमेशा जीवंत रहेंगी।
