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मौत के बाद भी बेटी से अटूट नाता: Rupi soren के श्राद्ध में मायके से भेजा जाएगा खस्सी, चावल और कपड़ा- आंखें नम कर देगी यह रीति

Published: Mon, 12 Oct 2026 07:39 PM (IST)

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन के श्राद्ध कर्म की तैयारियां चल रही हैं, जिसमें उनके मायके चांडिल के धातकीडीह गांव से पारंपरिक सामग्री भेजी जाएगी।

निधन से पूर्व अपने मायके चांडिल प्रखंड के धातकीडीह गांव पहुंचीं थीं मुख्‍यमंत्री हेमंत सोरेन की दिवंगत मां रूपी सोरेन। (फाइल फाेटो)

निधन से पूर्व अपने मायके चांडिल प्रखंड के धातकीडीह गांव पहुंचीं थीं मुख्‍यमंत्री हेमंत सोरेन की दिवंगत मां रूपी सोरेन। (फाइल फाेटो)

HighLights

  1. मायके से भेजी जाएगी पारंपरिक सामग्री, कपड़े और भोज।

  2. यह आदिवासी परंपरा बेटी-मायके के अटूट रिश्ते का प्रतीक।

दिलीप कुमार, चांडिल। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पत्नी और वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन के निधन के बाद उनके श्राद्ध कर्म को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। 
 
इस बीच उनके मायके चांडिल प्रखंड के धातकीडीह गांव में पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाने की विशेष तैयारी की जा रही है। आदिवासी परंपरा के अनुसार, मायके पक्ष की ओर से दिवंगत रूपी सोरेन के परिवार के सदस्यों के लिए कपड़ों के साथ-साथ श्राद्ध कर्म और भोज में उपयोग होने वाली तमाम आवश्यक सामग्री भेजी जाएगी। 
 
इस परंपरा का निर्वहन करने के लिए मायके के लोग आगामी 17 अक्टूबर को धातकीडीह से रामगढ़ जिले के नेमरा के लिए रवाना होंगे।
 
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मामा और रूपी सोरेन के भाई गुरुचरण किस्कू ने जानकारी दी कि उनकी दिवंगत दीदी के श्राद्ध कर्म में परंपरा के मुताबिक मायके की ओर से सामग्री भेजी जा रही है। 
 
इसमें परिवार के सभी सदस्यों के लिए नए कपड़े, श्राद्ध कर्म और भोज के लिए खस्सी (बकरा), चावल, चूड़ा, मुरमुरा (मुढ़ी), विभिन्न प्रकार के मसाले, प्लेट, दोना, साल के कच्चे पत्ते, पूजा-अर्चना के लिए पारंपरिक हड़िया, बीड़ी और माचिस सहित अन्य जरूरी सामान शामिल होंगे।
 
इसके अलावा, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सभी चाचाओं के पारिवारिक सदस्यों के लिए भी विशेष रूप से कपड़े पहुंचाए जाएंगे। आदिवासी परंपरा के अनुसार, श्राद्ध कर्म के दौरान मुख्यमंत्री और उनके परिवार के सभी सदस्यों को मामा घर से लाए गए वस्त्र ही पहनने होते हैं।
 
माझी पारगाना महाल के श्यामल मार्डी ने इस परंपरा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि संताल समाज में यह केवल एक रस्म भर नहीं है, बल्कि यह बेटी के साथ मायके के आजीवन भावनात्मक और पारिवारिक संबंधों का जीवंत प्रतीक है। 
 
विवाह के बाद बेटी भले ही दूसरे परिवार का हिस्सा बन जाती है, लेकिन मायके से उसका नाता कभी समाप्त नहीं होता। मृत्यु के उपरांत भी मायके की इस तरह की भागीदारी यह दर्शाती है कि बेटी के जाने के बाद भी उसका ससुराल पक्ष के साथ मायके का नाता अटूट रूप से बना रहता है।
 
गुरुचरण किस्कू ने बताया कि रूपी सोरेन का अपने मायके धादकीडीह से हमेशा से आत्मीय जुड़ाव रहा है। वह सोहराय जैसे पर्वों पर अपने पूरे परिवार के साथ यहां पहुंचती थीं। 
 
उनके आकस्मिक निधन से मायके के लोग शोक में डूबे हैं। अब श्राद्ध कर्म के अवसर पर मायके के लोग परंपरा का पूरी निष्ठा के साथ पालन करने के लिए नेमरा पहुंचेंगे।

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