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    हाथियों की कब्रगाह बनता झारखंड : 25 साल में 256 हाथियों की मौत, 1400 से ज्यादा इंसान भी बने शिकार

    By Manoj kumar singhEdited By: Sanjeev Kumar
    Updated: Sun, 04 Jan 2026 01:31 PM (IST)

    झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष भयावह रूप ले रहा है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 2000-2025 के बीच 256 हाथियों की मौत हुई, जिनम ...और पढ़ें

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    फाइल फोटो।

    जागरण संवादाता, जमशेदपुर। झारखंड में हाथियों और इंसानों के बीच टकराव लगातार भयावह रूप लेता जा रहा है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के ताजा सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं।  
     
    रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2000 से 2025 के बीच राज्य में 256 हाथियों की मौत हुई है। इनमें 172 मौतें करंट, जहर, विस्फोट और ट्रेन की चपेट में आने से हुईं, जबकि 84 मौतें प्राकृतिक कारणों से दर्ज की गईं। 

     

    इसी अवधि में हाथियों के हमलों में 1400 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 600 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष अब एक बड़ी सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है। 

    चाईबासा में एक दिन में तीन मौतें, भय के साए में गांव 

    हाथियों के उग्र होने का ताजा उदाहरण शुक्रवार को पश्चिम सिंहभूम जिले के चाईबासा में देखने को मिला, जहां अलग-अलग इलाकों में हाथियों के हमले से तीन लोगों की मौत हो गई।

    टोंटो प्रखंड के बांडीझारी गांव में 35 वर्षीय मंगल सिंह हेंब्रम को जंगली हाथी ने कुचल दिया। इसके बाद बिरसिंहहातु गांव में 55 वर्षीय उर्दूप बहंदा और सदर प्रखंड के रोरो गांव में 57 वर्षीय विष्णु सुंडी की भी हाथी के हमले में जान चली गई।

    इसी घटना में बिरसिंहहातु गांव की दो महिलाएं मानी कुंटिया और सुखमति बहंदा गंभीर रूप से घायल हो गईं, जिन्हें सदर अस्पताल चाईबासा में भर्ती कराया गया है। उनकी हालत चिंताजनक बनी हुई है। 

    हाथियों की मौत की कुछ प्रमुख घटनाएं 

    बीते महीनों में हाथियों की मौत की कई घटनाएं सामने आई हैं। 5 जून 2025 को सरायकेला के नीमडीह में खेत से हाथी का शव मिला। 
     
    2 मई को चाईबासा रेंज के सेरंगसिया में आठ वर्षीय हाथी की मौत हुई। 6 जुलाई को सारंडा जंगल में विस्फोट से घायल हाथी ने इलाज के दौरान दम तोड़ा।

     

    14 नवंबर को पश्चिम सिंहभूम के स्कूलसाई टोला में दो मादा हाथियों के शव मिले, जबकि 25 नवंबर को कुदाहातू के पास नर हाथी मृत पाया गया। इसी तरह दिसंबर में भी चाईबासा और नीमडीह क्षेत्र में हाथियों की मौत की घटनाएं दर्ज की गईं। 

    क्यों बढ़ रहा है मानव-हाथी संघर्ष? 

    विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में अतिक्रमण, खनन, रेलवे लाइन, हाई-टेंशन तार, पारंपरिक हाथी गलियारों का नष्ट होना और तेजी से फैलती बस्तियां इसकी बड़ी वजह हैं। भोजन और सुरक्षित रास्तों की कमी के कारण हाथी गांवों और खेतों की ओर बढ़ रहे हैं। 

    समाधान क्या हो सकता है? 

    पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) वाइल्ड लाइफ लाल रत्नाकर सिंह के अनुसार इस संकट से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि हाथी प्रभावित क्षेत्रों में बिजली के तारों की ऊंचाई बढ़ाई जाए, कम वोल्टेज वाली सौर बाड़ को बढ़ावा दिया जाए और सेंसर आधारित चेतावनी प्रणाली विकसित की जाए।

    रेल मार्गों पर हाथी गलियारों के लिए अंडरपास या ओवरब्रिज बनाए जाएं और संवेदनशील क्षेत्रों में ट्रेनों की गति सीमित की जाए। किसानों को समय पर मुआवजा देना और हाथियों के पारंपरिक रास्तों को अतिक्रमण से मुक्त करना सबसे अहम है। 

    झारखंड में हाथियों के साथ ही आम जनता की मौत बड़ी समस्या सामने आ रही है। इस समस्या का समाधान के लिए वह एक उच्चस्तरीय टीम बना रहे हैं। यह टीम बंगाल सरकार व वन विभाग के अधिकारियों से बातचीत कर हाथियों के बंद पड़े उसके प्राकृतिक रास्तों को खोलने पर वार्ता करेगी।वह जल्द ही इस पर ठोस काम करेंगे।

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    - संजीव कुमार, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, झारखंड