जमशेदपुर की रगों में दौड़ रहा दूषित पानी का धीमा जहर, बढ़ रही कैंसर और हार्ट अटैक जैसी बीमारियां
जमशेदपुर और पूर्वी सिंहभूम में पानी का प्रदूषण एक गंभीर समस्या है। ड्यूक यूनिवर्सिटी के अध्ययन से पता चला है कि भूजल में यूरेनियम और भारी धातुएं तय मा ...और पढ़ें

प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल की गई तस्वीर। (जागरण)
जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। स्वच्छता सर्वेक्षण में अपनी पीठ थपथपाने वाले जमशेदपुर शहर और उससे सटे पूर्वी सिंहभूम के ग्रामीण इलाकों की जमीनी हकीकत बेहद डरावनी है।
इंदौर में दूषित पानी पीने से हुई मौतों ने देश को झकझोर दिया है, लेकिन इस्पात नगरी में यह खतरा किसी एक दिन की घटना नहीं, बल्कि दशकों से चल रही एक धीमी प्रक्रिया है।
वैज्ञानिक भाषा में कहें तो हम पानी नहीं, बल्कि रसायनों का एक ऐसा विषाक्त काकटेल पी रहे हैं जो हमारे डीएनए तक को क्षतिग्रस्त कर रहा है।
ड्यूक यूनिवर्सिटी और केंद्रीय भूमि जल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के संयुक्त अध्ययन ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि पूर्वी सिंहभूम के भूगर्भ जल में यूरेनियम जैसे रेडियोएक्टिव तत्वों की मौजूदगी तय मानकों से कहीं अधिक है, जो गुर्दे की विफलता और कैंसर का बड़ा कारण बन रहा है।
रेडियोएक्टिव जहर और भारी धातुओं का कहर
जमशेदपुर केवल इस्पात का शहर नहीं है, बल्कि यह यूरेनियम खनन क्षेत्र के मुहाने पर भी बसा है। ड्यूक यूनिवर्सिटी के शोध में पाया गया है कि जादूगोड़ा, मुसाबनी और डुमरिया जैसे क्षेत्रों के एक्विफर यानी जलभृत में यूरेनियम की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्धारित मानक 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से अधिक है।
खनन क्षेत्रों के टेलिंग पोंड्स से रिसने वाला रेडियोएक्टिव कचरा जमीन के नीचे के पानी में मिल चुका है। यह पानी देखने में साफ और स्वाद में सामान्य लगता है, लेकिन शरीर के अंदर जाकर यह कोशिकाओं को गला रहा है।
इसके अलावा, अदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र की हजारों फैक्ट्रियों से निकलने वाला रासायनिक अपशिष्ट सीधे जमीन और नदियों में जा रहा है, जिससे भूजल में लेड, क्रोमियम और निकल जैसी भारी धातुओं की सांद्रता बढ़ गई है। सामान्य वाटर फिल्टर इन भारी कणों को रोकने में पूरी तरह अक्षम हैं।
स्वर्णरेखा और खरकई: जीवनदायिनी या मृत्युदायिनी
शहर की प्यास बुझाने वाली स्वर्णरेखा और खरकई नदियां अब औद्योगिक विसर्जन का केंद्र बन चुकी हैं। झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट बताती है कि डोबो और मानगो ब्रिज के पास नदी के पानी में टोटल कोलीफार्म बैक्टीरिया की मात्रा खतरे के निशान से ऊपर है, जो यह दर्शाता है कि नदी का पानी आचमन योग्य भी नहीं बचा है।
वहीं, सोनारी स्थित डंपिंग यार्ड (लैंडफिल साइट्स) ने अपने आसपास के पांच किलोमीटर के दायरे में भूजल को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है।
कचरे के पहाड़ों से बारिश के दिनों में निकलने वाला जहरीला काला तरल पदार्थ, जिसे विज्ञान की भाषा में लीचेट कहते हैं, जमीन के भीतर रिसकर पीने के पानी के स्रोतों में मिल रहा है। यही कारण है कि इन इलाकों में त्वचा रोग और पेट के संक्रमण आम बात हो गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में फ्लोराइड और आयरन की मार
शहर से इतर ग्रामीण पूर्वी सिंहभूम की स्थिति और भी भयावह है। चाकुलिया और बहरागोड़ा के कई इलाकों में पानी में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई है।
इसका सेवन करने से बच्चों और बुजुर्गों में स्केलेटल फ्लोरोसिस की बीमारी हो रही है, जिससे दांत पीले पड़ रहे हैं और हड्डियां टेढ़ी होकर विकलांगता का कारण बन रही हैं। वहीं, पोटका और पटमदा जैसे प्रखंडों में आयरन की अधिकता पाचन तंत्र को बुरी तरह प्रभावित कर रही है।

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